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फ्लैश बैक: नवाब रामपुर के फरमान पर तय होती थी प्रत्याशी की जीत-हार, पढ़िए यहां का चुनावी इतिहास

Wed, 13 Mar 2024 01:35 PM IST
मुकेश कुमार राकेश मथुरिया, संवाद न्यूज एजेंसी, आंवला
राकेश मथुरिया, संवाद न्यूज एजेंसी, आंवला Published by: मुकेश कुमार Updated Wed, 13 Mar 2024 01:35 PM IST
सार

वर्ष 1962 में आंवला लोकसभा सीट के गठन से पहले तहसील का अधिकतर हिस्सा रामपुर संसदीय क्षेत्र में आता था। तब रामपुर नवाब के फरमान पर जीत-हार के फैसले हुआ करते थे।

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election results decided on the orders of Nawab Rampur in aonla
रामपुर के नवाब इसी सैलून से आते थे आंवला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वर्ष 1962 में आंवला लोकसभा सीट के गठन से पहले तहसील का अधिकतर हिस्सा रामपुर संसदीय क्षेत्र में आता था। तब रामपुर नवाब के फरमान पर जीत-हार के फैसले हुआ करते थे। उनके दामाद कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते थे। मतदान से कुछ दिन पहले ही नवाब रामपुर आंवला आ जाते थे। चुनिंदा लोगों को बुलाकर फरमान जारी कर देते थे और उस पर ही चुनाव का रुख तय होता था।

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आजादी के बाद के हुए दो चुनावों में यही हाल रहा। तब के चुनाव प्रचार में ज्यादा शोर नहीं मचता था। उम्मीदवारों के बीच मुकाबला भी बस नाम मात्र का होता था। वर्ष 1952 व 1957 के लोकसभा चुनाव में नवाब के दामाद सैयद अहमद मेहंदी विजयी रहे थे। 
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1962 में हुए परिसीमन में आंवला क्षेत्र रामपुर संसदीय सीट से अलग हो गया। आंवला, फरीदपुर, दातागंज, सन्हा, बिनावर विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर एक नई संसदीय सीट बनी। इस सीट पर सर्वाधिक वोट आंवला क्षेत्र के होने के कारण इसका नाम आंवला लोकसभा सीट पड़ा। 

विधानसभा क्षेत्र के परिसीमन के बाद सन्हा का नाम बदलकर बिथरी विधानसभा हो गया। बाद में हुए परिसीमन में बिनावर बदायूं लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बनी, जबकि बदायूं जिले की शेखूपुर विधानसभा को आंवला लोकसभा क्षेत्र में शामिल कर लिया गया।

परिवार के साथ विशेष सैलून से आते थे
चुनाव के दौरान नवाब साहब अपने विशेष सैलून से रामपुर से आंवला आते थे। मालगोदाम के शेड में उनका सैलून खड़ा रहता था। आंवला कस्बे में उनके ठहरने की कोई उचित व्यवस्था नहीं हो पाती थी, लिहाजा वह परिवार सहित तीन दिनों तक सैलून में ही रहते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि उस समय इलाके के कुछ खास रसूखदार लोगों को बुलाकर बता दिया जाता था कि नवाब साहब के दामाद कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। सबको उन्हीं के पक्ष में मतदान करना है। 

नवाब साहब को गुफरान अहमद के मकान से मकबरे तक जाने के लिए कालीन का इंतजाम न होने पर टूल (लाल कपड़ा) बिछाया जाता था। इस कपड़े का इंतजाम कस्बे के दुकानदार खुद ही करते थे। नवाब परिवार के लोग अपने पूर्वजों के मकबरे तक जरूर जाते थे।

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