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Bareilly News: उम्र के 85 पड़ाव पार... दीदी बांट रहीं ज्ञान का उपहार, शिक्षा के प्रति समर्पित किया पूरा जीवन

Thu, 10 Jul 2025 12:59 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: मुकेश कुमार Updated Thu, 10 Jul 2025 12:59 PM IST
सार

बरेली में 85 वर्षीय शिक्षाविद् डॉ. सरोज मार्कंडेय ने अपना पूरी जीवन शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया। लोग उन्हें दीदी के नाम से पुकारते हैं। उनकी कहानी महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है। 

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Educationist Dr. Saroj Markandey is spreading the light of education in Bareilly
शिक्षाविद् डॉ. सरोज मार्कंडेय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मन में कुछ करने की इच्छा हो तो उम्र बाधा नहीं बनती है। बरेली के सिविल लाइंस निवासी शिक्षाविद् डॉ. सरोज मार्कंडेय उम्र के 85वें पड़ाव पर भी अपने अनुभव से ज्ञान का उजियारा फैला रही हैं। उन्होंने अपना पूरी जीवन ही शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया। लोग उन्हें दीदी के नाम से पुकारते हैं।

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पीलीभीत में 10 जुलाई 1939 को दीदी का जन्म हुआ तो उस दौर में महिला शिक्षा का चलन कम था। दीदी ने इस मिथक को तोड़ते हुए हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सात वर्ष बाद जिले का कोई विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में पास हुआ तो खूब बधाइयां मिलीं। 
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दीदी ने बरेली से हिंदी व अंग्रेजी में एमए और डबल पीएचडी की। शिक्षा के प्रति लगाव की वजह से अविवाहित रहीं। पिता रामनाथ मार्कंडेय रेलवे में नौकरी करते थे। माता ज्ञान देवी गृहिणी थीं। दीदी आठ-भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं। उन्होंने 16 विद्यार्थियों को हिंदी में पीएचडी कराई। इनके पसंदीदा कवि निराला और लेखक जय शंकर प्रसाद हैं।
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कमजोर विद्यार्थियों की बनीं मददगार
दीदी ने नौकरी के दौरान कई छात्राओं की आर्थिक मदद भी की। बताया कि एक बार कोटद्वार की एक मुस्लिम लड़की की पढ़ाई आर्थिक तंगी की वजह से रुक गई। उन्होंने मदद कर उसकी बीए सेकेंड ईयर की पढ़ाई पूरी कराई। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन से भी वह छात्राओं की मदद करती रहती हैं।

दीदी का कार्यकाल
  • 1961-1965 तक कन्या महाविद्यालय भूड़, बरेली।
  • 1965-1969 तक साहू राम स्वरूप महाविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में लेक्चरर।
  • 1969-2000 तक सौभाग्यवती बाई दानी महिला महाविद्यालय धामपुर बिजनौर में संस्थापक प्रिंसिपल। 
  • 2001-2007 तक श्री धन नारायण दानी महाविद्यालय में प्रिंसिपल।

एक आना किराये की किताब से की थी पढ़ाई
उन्होंने बताया कि जब देश आजाद हुआ तो किताबों की किल्लत थी। उच्च शिक्षा के लिए बरेली आईं तो किताबें उपलब्ध नहीं थीं। रोजाना एक आना किराये पर किताब लेकर आतीं और शाम तक पढ़कर दुकानदार को लौटा देती थीं। दीदी अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की सचिव रहीं। ‘निराला साहित्य में युगीन समस्याएं’ नाम से पुस्तक लिखी। अतीत की परछाइयां, प्रेरणा के दीप, नेह के सरासिज पुस्तकों का संपादन किया।

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