फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   death

जाने माने साहित्यकार ‘वीरेन दा’ नहीं रहे

Tue, 29 Sep 2015 01:29 AM IST
बरेली
बरेली Updated Tue, 29 Sep 2015 01:29 AM IST
विज्ञापन
बरेली। जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार वीरेन डंगवाल नहीं रहे। देश भर में अपने हजारों चाहने वालों से सोमवार को तड़के उन्होंने हमेशा के लिए विदा ले ली। लंबे समय से दिल्ली में रहकर कैंसर का इलाज करा रहे वीरेन डंगवाल पिछले रविवार को ही अपनी कर्मभूमि बरेली लौटे थे। इसके अगले ही दिन हालत बिगड़ जाने पर उन्हें एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था जहां सोमवार को सुबह करीब चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। शाम चार बजे सिटी श्मशान भूमि पर शहर के तमाम गणमान्य लोगों और दिल्ली, लखनऊ, नैनीताल, देहरादून आदि शहरों से पहुंचे उनके प्रशंसकों के बीच उनके छोटे बेटे प्रफुल्ल ने उन्हें मुखाग्नि दी।
विज्ञापन

हिंदी कविता के आधुनिक कवियों में शुमार और साहित्य जगत में ‘वीरेन दा’ के नाम से पहचाने जाने वाले वीरेन डंगवाल को सन् 2007 की शुरुआत में पहली बार गले का कैंसर हुआ था। अद्भुत जीवट के शख्स वीरेन डंगवाल उसे मात देकर कुछ ही समय बाद फिर साहित्य और पत्रकारिता जगत में लौट आए थे। इस बीच दिल्ली के रॉकलैंड अस्पताल में इलाज के दौरान भी उन्होंने ‘रॉकलैंड डायरी’ के नाम से कई कविताएं लिखीं। 2012 की शुरुआत में ही दोबारा कैंसर उभर आने पर उन्हें इलाज के लिए दोबारा दिल्ली जाना पड़ा, जहां से पिछले रविवार को ही वह बरेली लौटे थे।
विज्ञापन

पांच अगस्त 1947 को कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) में जन्मे वीरेन डंगवाल ने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही हिंदी में एमए और डी फिल करने वाले वीरेन डंगवाल 1971 में बरेली कॉलेज बरेली से जुड़े और हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। जार्ज फर्नांडीज की पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ से लेखन शुरू करने के बाद 1978 में इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार ‘अमृत प्रभात’ में ‘घूमना आइना’ शीर्षक से स्तंभ लेखन शुरू किया। यह स्तंभ काफी मशहूर हुआ। वह इस बीच पीटीआई, टाइम्स ऑफ इंडिया और पायनियर में भी लिखते रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन

वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह 43 साल की उम्र में ‘इसी दुनिया में’ आया जिसकी कविता ‘राम सिंह, हवा, समोसा, इतने भला न बन जाना’ काफी चर्चित रही। इस संकलन को 1992 में रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार और 1993 में श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार से नवाजा गया। दूसरा संकलन ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ सन् 2002 में आया। इस संकलन की कविता ‘हमारा समाज’, ‘आएंगे उजले दिन जरूर आएंगे’ और ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ खास मानी गईं। इसी साल उन्हें ‘शमशेर सम्मान’ भी दिया गया। तीसरा संग्रह ‘स्याही ताल’ आया जिसमें ‘कानपुर’, ‘कटरी की रुक्मनी’, ‘ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं’ आदि चर्चित कविताएं शामिल हैं और तमाम आंदोलनों में अब भी गाई जाती हैं। कविता संग्रह ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के लिए उन्हें 2004 का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। उनकी कविताएं मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी, मलयालम और उड़िया में भी छपीं। विश्व कविता में उन्होंने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव, होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाज़िम हिकमत के अपनी विशिष्ट शैली में दुर्लभ अनुवाद भी किए। अंतिम समय में वीरेन डंगवाल की पत्नी रीटा डंगवाल और दोनों बेटे प्रशांत डंगवाल और प्रफुल्ल डंगवाल हर पल उनके साथ रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed