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कट रही मरीजों की जेब, मालामाल हो रहे दवा दुकानदार
बरेली।
Updated Sun, 29 Oct 2017 01:43 AM IST
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अगर यह कहा जाए कि शहर के अस्पतालों में मरीजों को खुलेआम लूटा जा रहा है तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अस्पतालों में सर्जरी कराने से पहले डॉक्टर की ओर से जरूरी सामान की जो लंबी-चौड़ी लिस्ट थमाई जाती है, उसकी खरीदारी अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही करने पर अच्छा-खासा चूना लगना तय है। अस्पतालों के मेडिकल स्टोर और थोक बाजार में सर्जिकल सामान के रेट में 10 से 15 गुना तक का अंतर है। जिस आईवी सेट की कीमत थोक बाजार में सिर्फ नौ रुपये है, वह अस्पताल के मेडिकल स्टोर से 115 रुपये से कम में नहीं मिलता। इसी तरह यूरो बैग जिसकी थोक बाजार में कीमत मात्र 16 रुपये है, उसे अस्पताल के मेडिकल स्टोर वाले 150 रुपये में देते हैं।
मरीजों और उनके तीमारदारों की मजबूरी यह है कि अगर वह अस्पताल के बाहर से कोई सामान लाना चाहें तो भी नहीं ला सकते। प्राइवेट अस्पतालाें का कॉकस इतना मजबूत है कि मरीजों को दवा तो क्या, छोटा-मोटा जरूरी सामान भी बाहर से नहीं लाने दिया जाता है। ऐसी कोई कोशिश करने पर मरीज और उसके तीमारदारों को इतना परेशान कर दिया जाता है कि उन्हें मजबूरन अस्पताल के मेडिकल स्टोर की ही राह पकड़नी पड़ती है। ऐसे में दो-चार रुपये जैसी मामूली कीमत वाली चीजों के भी सैकड़ों रुपये चुकाना लोगों की मजबूरी बन जाती है। सर्जिकल आइटम के थोक विक्रेता बताते हैं कि शहर में सर्जिकल आइटम का प्रति माह करीब दो करोड़ रुपये का तक कारोबार है, लेकिन 90 फीसदी कारोबार प्राइवेट अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों से ही होता है। खुदरा तौर पर थोक बाजार सेे सामान नहीं बेचते। वे इस बात से कोई मतलब नहीं रखते कि अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों पर कितनी कीमत में सामान बिक रहा है।
कंपनियां भी कर रही हैं लूट में मदद
सर्जिकल सामान का उत्पादन करने वाली कंपनियां भी अपना कारोबार बढ़ाने के लिए मरीजों को लुटवाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। उदाहरण के तौर पर आईवी सेट बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी रॉमसन के एक नग की कीमत मात्र नौ रुपये है लेकिन इस पर अधिकतम खुदरा मूल्य 115 रुपये प्रिंट है। यानी यह मेडिकल स्टोर मालिक की मर्जी पर निर्भर है कि वह रॉमसन कंपनी के आईवी सेट के कितने रुपये वसूल करे। यह खेल इसलिए हो रहा है क्योंकि सर्जिकल आइटम के दाम एनपीपीए यानी राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण में शामिल नहीं हैं, लिहाजा इन पर कोई शिकंजा नहीं है। कंपनियां अपने प्रोडक्ट पर अधिक से अधिक रेट प्रिंट करती हैं ताकि दुकानदार ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए उन्हीं का प्रोडक्ट बेचें। मसलन अगर नौ रुपये वाले आईवी सेट का प्रिंट रेट कोई कंपनी सिर्फ 30 रुपये छापती है तो उसका आईवी सेट कोई नहीं खरीदेगा क्योंकि दुकानदार कम मुनाफे में उसे बेचना ही नहीं चाहेंगे।
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ये है अंधाधुंध कमाई का गणित
जिले में पंजीकृत अस्पतालाें की संख्या करीब 292 हैं। जानकारों के मुताबिक सर्जरी के लिए अस्पताल में भर्ती होने वाले हर मरीज को औसतन पांच हजार रुपये तक का सामान खरीदना पड़ता है। अगर यह मान लिया जाए कि एक अस्पताल में एक दिन में औसतन 10 मरीज भर्ती होते हैं तो ऐसे में शहर के 292 अस्पतालों में सर्जरी आइटम की बिक्री का आंकड़ा करीब 1.46 करोड़ रुपये होता है।
ऐसे चलता है कारोबार
थोक कारोबारियाें को कंपनियों से जो आइटम मात्र छह से नौ रुपये में मिलते हैं, उसे वे खुदरा दुकानदाराें को दो से तीन रुपये के मार्जिन पर बेचते हैं, लेकिन आइटम पर प्रिंट रेट दस गुना अधिक होने के चलते खुदरा दुकानदार सीधे मरीजों को इसे प्रिंट रेट पर बेचकर दस फीसदी अधिक मुनाफा कमाते हैं। शहर में सर्जिकल सामान का थोक कारोबार करने वाली 22 दुुकानें हैं। यहां का सारा कारोबार निजी अस्पतालों के दवा दुकानदारों के साथ ही होता है।
जानिए कितना ठगे जा रहे हैं आप
आइटम खुदरा रेट प्रिंट रेट
आईवी सेट 9 115
यूरो बैग 16 150
ग्लब्स 11 66
सिरिंज 2 एमएल 1.40 6.50
सिरिंज 5 एमएल 1.60 10
फोलिअस कैथ 25 150
आईवी कैथ 7 105
टांके के धागे 75 150
सर्वाइकल कॉलर 60 225
घुटने के कैप 50 225
आर्म स्लाइंग 50 195
कॉटन 500 ग्राम 110 260
पेपर टेप (एक इंच) 45 95
कोट
थोक मार्केट में सर्जिकल आइटम खरीदने वाले मरीज या तीमारदार नहीं हैं। सिर्फ फुटकर दवा दुकानदार ही सर्जिकल आइटम खरीदते हैं और प्रिंट रेट के हिसाब से बेचते हैं, जबकि थोक में इनके दाम काफी कम हैं।
- सतीश सेठी, सचिव, न्यू ड्रगिस्ट केमिस्ट एसोसिएशन
हमारे यहां फुटकर में कोई सामान खरीदने नहीं आता है, क्योंकि मरीज और तीमारदार एक या दो आईवी सेट ही मांगते हैं, इनकी कीमत 10 से 20 रुपये ही है। अस्पतालों के दवा दुकानदार ही थोक में सामान ले जाते हैं और वही फुटकर में बेचते हैं।
- राकेश, सर्जिकल आइटम के थोक विक्रेता
देश में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजमेंट न होने के कारण एक ही बाजार में कई तरह की चीजें आती हैं। कुछ महंगी हैं तो कुछ सस्ती, इनकी क्वालिटी में भी काफी अंतर है। ऐसे ही सर्जिकल आइटम भी हैं। अस्पतालाें में भर्ती मरीज कहीं से भी दवा और आइटम ले सकते हैं। उन्हें किसी मेडिकल स्टोर से सामान लेने को कोई बाध्य नहीं किया जा सकता। अस्पतालों में मेडिकल स्टोर सिर्फ सहूलियत के लिए होते हैं।
डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी, अध्यक्ष, आईएमए
मरीजों और उनके तीमारदारों की मजबूरी यह है कि अगर वह अस्पताल के बाहर से कोई सामान लाना चाहें तो भी नहीं ला सकते। प्राइवेट अस्पतालाें का कॉकस इतना मजबूत है कि मरीजों को दवा तो क्या, छोटा-मोटा जरूरी सामान भी बाहर से नहीं लाने दिया जाता है। ऐसी कोई कोशिश करने पर मरीज और उसके तीमारदारों को इतना परेशान कर दिया जाता है कि उन्हें मजबूरन अस्पताल के मेडिकल स्टोर की ही राह पकड़नी पड़ती है। ऐसे में दो-चार रुपये जैसी मामूली कीमत वाली चीजों के भी सैकड़ों रुपये चुकाना लोगों की मजबूरी बन जाती है। सर्जिकल आइटम के थोक विक्रेता बताते हैं कि शहर में सर्जिकल आइटम का प्रति माह करीब दो करोड़ रुपये का तक कारोबार है, लेकिन 90 फीसदी कारोबार प्राइवेट अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों से ही होता है। खुदरा तौर पर थोक बाजार सेे सामान नहीं बेचते। वे इस बात से कोई मतलब नहीं रखते कि अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों पर कितनी कीमत में सामान बिक रहा है।
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कंपनियां भी कर रही हैं लूट में मदद
सर्जिकल सामान का उत्पादन करने वाली कंपनियां भी अपना कारोबार बढ़ाने के लिए मरीजों को लुटवाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। उदाहरण के तौर पर आईवी सेट बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी रॉमसन के एक नग की कीमत मात्र नौ रुपये है लेकिन इस पर अधिकतम खुदरा मूल्य 115 रुपये प्रिंट है। यानी यह मेडिकल स्टोर मालिक की मर्जी पर निर्भर है कि वह रॉमसन कंपनी के आईवी सेट के कितने रुपये वसूल करे। यह खेल इसलिए हो रहा है क्योंकि सर्जिकल आइटम के दाम एनपीपीए यानी राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण में शामिल नहीं हैं, लिहाजा इन पर कोई शिकंजा नहीं है। कंपनियां अपने प्रोडक्ट पर अधिक से अधिक रेट प्रिंट करती हैं ताकि दुकानदार ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए उन्हीं का प्रोडक्ट बेचें। मसलन अगर नौ रुपये वाले आईवी सेट का प्रिंट रेट कोई कंपनी सिर्फ 30 रुपये छापती है तो उसका आईवी सेट कोई नहीं खरीदेगा क्योंकि दुकानदार कम मुनाफे में उसे बेचना ही नहीं चाहेंगे।
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ये है अंधाधुंध कमाई का गणित
जिले में पंजीकृत अस्पतालाें की संख्या करीब 292 हैं। जानकारों के मुताबिक सर्जरी के लिए अस्पताल में भर्ती होने वाले हर मरीज को औसतन पांच हजार रुपये तक का सामान खरीदना पड़ता है। अगर यह मान लिया जाए कि एक अस्पताल में एक दिन में औसतन 10 मरीज भर्ती होते हैं तो ऐसे में शहर के 292 अस्पतालों में सर्जरी आइटम की बिक्री का आंकड़ा करीब 1.46 करोड़ रुपये होता है।
ऐसे चलता है कारोबार
थोक कारोबारियाें को कंपनियों से जो आइटम मात्र छह से नौ रुपये में मिलते हैं, उसे वे खुदरा दुकानदाराें को दो से तीन रुपये के मार्जिन पर बेचते हैं, लेकिन आइटम पर प्रिंट रेट दस गुना अधिक होने के चलते खुदरा दुकानदार सीधे मरीजों को इसे प्रिंट रेट पर बेचकर दस फीसदी अधिक मुनाफा कमाते हैं। शहर में सर्जिकल सामान का थोक कारोबार करने वाली 22 दुुकानें हैं। यहां का सारा कारोबार निजी अस्पतालों के दवा दुकानदारों के साथ ही होता है।
जानिए कितना ठगे जा रहे हैं आप
आइटम खुदरा रेट प्रिंट रेट
आईवी सेट 9 115
यूरो बैग 16 150
ग्लब्स 11 66
सिरिंज 2 एमएल 1.40 6.50
सिरिंज 5 एमएल 1.60 10
फोलिअस कैथ 25 150
आईवी कैथ 7 105
टांके के धागे 75 150
सर्वाइकल कॉलर 60 225
घुटने के कैप 50 225
आर्म स्लाइंग 50 195
कॉटन 500 ग्राम 110 260
पेपर टेप (एक इंच) 45 95
कोट
थोक मार्केट में सर्जिकल आइटम खरीदने वाले मरीज या तीमारदार नहीं हैं। सिर्फ फुटकर दवा दुकानदार ही सर्जिकल आइटम खरीदते हैं और प्रिंट रेट के हिसाब से बेचते हैं, जबकि थोक में इनके दाम काफी कम हैं।
- सतीश सेठी, सचिव, न्यू ड्रगिस्ट केमिस्ट एसोसिएशन
हमारे यहां फुटकर में कोई सामान खरीदने नहीं आता है, क्योंकि मरीज और तीमारदार एक या दो आईवी सेट ही मांगते हैं, इनकी कीमत 10 से 20 रुपये ही है। अस्पतालों के दवा दुकानदार ही थोक में सामान ले जाते हैं और वही फुटकर में बेचते हैं।
- राकेश, सर्जिकल आइटम के थोक विक्रेता
देश में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजमेंट न होने के कारण एक ही बाजार में कई तरह की चीजें आती हैं। कुछ महंगी हैं तो कुछ सस्ती, इनकी क्वालिटी में भी काफी अंतर है। ऐसे ही सर्जिकल आइटम भी हैं। अस्पतालाें में भर्ती मरीज कहीं से भी दवा और आइटम ले सकते हैं। उन्हें किसी मेडिकल स्टोर से सामान लेने को कोई बाध्य नहीं किया जा सकता। अस्पतालों में मेडिकल स्टोर सिर्फ सहूलियत के लिए होते हैं।
डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी, अध्यक्ष, आईएमए