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विज्ञान पर मान्यताएं भारी- सूर्य ग्रहण में 60 फीसदी महिलाओं ने नहीं कराया प्रसव
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क्रिटिकल कंडीशन होने के बाद भी डॉक्टरों को करनी पड़ी माथापच्ची, तब हुई सिजेरियन डिलीवरी
बरेली। 21वीं सदी में इंसान चांद तक पहुंच रहा है। खुद पीएम मोदी ग्रहण प्रचलित धारणाओं की हकीकत बताने के लिए ग्रहण देखने को डटे रहे, इसके बावजूद लोग पुरानी मान्यताओं पर कायम हैं। गुरुवार को 50 सालों बाद हुए पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान महिला अस्पतालों में विज्ञान पर मान्यताएं भारी पड़ीं। जो महिला अस्पताल मरीजों की गहमागहमी से भरे रहते हैं, वहां बुधवार की रात नौ बजे से गुरुवार की दोपहर 12 बजे तक सन्नाटा रहा। गभर्वती महिलाओं ने खुद डॉक्टरों की खुशामद कर प्रसव टाल दिए तो दूसरी ओर, ओपीडी में भी गिनी चुनीं महिलाएं पहुंचीं।
महिलाओं को मानना था कि सूर्य ग्रहण के दौरान प्रसव हुआ तो इसका असर उनके बच्चे पर पड़ सकता है। डॉक्टरों ने इसे अंधविश्वास बताकर उन्हें समझाने की कोशिश भी लेकिन वे नहीं मानीं। प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर होने वाले प्रसव की अपेक्षा करीब 60 फीसदी कम प्रसव हुए। हालांकि, गंभीर स्थिति होने पर डॉक्टरों ने कुछ लोगों को समझाकर सिजेरियन प्रसव कराए। बुधवार रात करीब सवा आठ बजे सूतक काल शुरू हो गया था। पुरानी मान्यता के अनुसार सूतक से ग्रहण काल के खत्म होने तक जन्मीं संतान पर विपरीत असर पड़ता है। लिहाजा, परिजन से ज्यादा गर्भवती ही प्रसव कराने से मना करती रहीं। परिजनों ने भी उनका साथ दिया। डॉक्टरों के हाथ पांव जोड़े कि जितनी देर हो सके प्रसव टाल दें।
महिला अस्पताल में ऑपरेशन से हुए चार प्रसव
जिला महिला अस्पताल में आमतौर पर 8 से 10 प्रसव होते हैं। लेकिन सूर्य ग्रहण के चलते इनकी संख्या आधी रह गई। बेहद क्रिटिकल कंडीशन वाली गर्भवतियों का प्रसव कराना पड़ा। सीएमएस डॉ. अलका ने बताया कि आमतौर पर ओपीडी में भी सामान्य दिनों की अपेक्षा महिलाओं की तादाद कम रही। हालांकि, नॉर्मल प्रसव दोपहर बारह बजे के बाद ही कराए गए।
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दोपहर बारह बजे के बाद खुले मंदिरों के पट
बुधवार की रात करीब आठ बजे सूतक लगने के साथ ही बंद हुए देवी देवताओं के मंदिरों के पट गुरुवार की दोपहर बारह बजे के बाद खोले गए। मंदिर खोलकर देवी देवताओं को गंगाजल से स्नान कराया गया और फिर पूजा अर्चन शुरू हुआ। इससे पहले सुबह प्रतिदिन दर्शन करने वाले मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं को बाहर से ही भगवान के दर्शन कर लौटना पड़ा। कई घरों में भी दोपहर बारह बजे के बाद खाना पकाया गया।
कोहरे ने लगाया पहरा.. नहीं देख पाए सूर्य ग्रहण
सूरज पर कोहरे का पहरा था, लेकिन बच्चों को भी सूर्य ग्रहण का ‘रिंग ऑफ फायर’ देखना था। स्कूली छात्र-छात्राओं को सूर्य ग्रहण दिखाकर मान्यताओं और रुढ़ियों की हकीकत बताने के लिए जिला विज्ञान क्लब की ओर से काष्ठ कला केंद्र आईटीआई पर सूर्यग्रहण अवलोकन एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था। विज्ञान क्लब की ओर से सोलर चश्मे भी मंगीए गए। इस दौरान सीडीओ सत्येंद्र कुमार भी बच्चों के साथ मौजूद रहे, लेकिन सूरज पर बादलों का पहरा रहा। मौजूद अफसर और बच्चे चश्मा लगाए आसमान निहारते रहे, लेकिन रिंग आफ फायर नहीं दिखा। हालांकि, इसके बाद सीडीओ ने मौजूद सभी को सूर्य और चंद्रग्रहण समेत रिंग ऑफ फायर की विस्तार से जानकारी दी।
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बरेली। 21वीं सदी में इंसान चांद तक पहुंच रहा है। खुद पीएम मोदी ग्रहण प्रचलित धारणाओं की हकीकत बताने के लिए ग्रहण देखने को डटे रहे, इसके बावजूद लोग पुरानी मान्यताओं पर कायम हैं। गुरुवार को 50 सालों बाद हुए पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान महिला अस्पतालों में विज्ञान पर मान्यताएं भारी पड़ीं। जो महिला अस्पताल मरीजों की गहमागहमी से भरे रहते हैं, वहां बुधवार की रात नौ बजे से गुरुवार की दोपहर 12 बजे तक सन्नाटा रहा। गभर्वती महिलाओं ने खुद डॉक्टरों की खुशामद कर प्रसव टाल दिए तो दूसरी ओर, ओपीडी में भी गिनी चुनीं महिलाएं पहुंचीं।
महिलाओं को मानना था कि सूर्य ग्रहण के दौरान प्रसव हुआ तो इसका असर उनके बच्चे पर पड़ सकता है। डॉक्टरों ने इसे अंधविश्वास बताकर उन्हें समझाने की कोशिश भी लेकिन वे नहीं मानीं। प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर होने वाले प्रसव की अपेक्षा करीब 60 फीसदी कम प्रसव हुए। हालांकि, गंभीर स्थिति होने पर डॉक्टरों ने कुछ लोगों को समझाकर सिजेरियन प्रसव कराए। बुधवार रात करीब सवा आठ बजे सूतक काल शुरू हो गया था। पुरानी मान्यता के अनुसार सूतक से ग्रहण काल के खत्म होने तक जन्मीं संतान पर विपरीत असर पड़ता है। लिहाजा, परिजन से ज्यादा गर्भवती ही प्रसव कराने से मना करती रहीं। परिजनों ने भी उनका साथ दिया। डॉक्टरों के हाथ पांव जोड़े कि जितनी देर हो सके प्रसव टाल दें।
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महिला अस्पताल में ऑपरेशन से हुए चार प्रसव
जिला महिला अस्पताल में आमतौर पर 8 से 10 प्रसव होते हैं। लेकिन सूर्य ग्रहण के चलते इनकी संख्या आधी रह गई। बेहद क्रिटिकल कंडीशन वाली गर्भवतियों का प्रसव कराना पड़ा। सीएमएस डॉ. अलका ने बताया कि आमतौर पर ओपीडी में भी सामान्य दिनों की अपेक्षा महिलाओं की तादाद कम रही। हालांकि, नॉर्मल प्रसव दोपहर बारह बजे के बाद ही कराए गए।
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दोपहर बारह बजे के बाद खुले मंदिरों के पट
बुधवार की रात करीब आठ बजे सूतक लगने के साथ ही बंद हुए देवी देवताओं के मंदिरों के पट गुरुवार की दोपहर बारह बजे के बाद खोले गए। मंदिर खोलकर देवी देवताओं को गंगाजल से स्नान कराया गया और फिर पूजा अर्चन शुरू हुआ। इससे पहले सुबह प्रतिदिन दर्शन करने वाले मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं को बाहर से ही भगवान के दर्शन कर लौटना पड़ा। कई घरों में भी दोपहर बारह बजे के बाद खाना पकाया गया।
कोहरे ने लगाया पहरा.. नहीं देख पाए सूर्य ग्रहण
सूरज पर कोहरे का पहरा था, लेकिन बच्चों को भी सूर्य ग्रहण का ‘रिंग ऑफ फायर’ देखना था। स्कूली छात्र-छात्राओं को सूर्य ग्रहण दिखाकर मान्यताओं और रुढ़ियों की हकीकत बताने के लिए जिला विज्ञान क्लब की ओर से काष्ठ कला केंद्र आईटीआई पर सूर्यग्रहण अवलोकन एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था। विज्ञान क्लब की ओर से सोलर चश्मे भी मंगीए गए। इस दौरान सीडीओ सत्येंद्र कुमार भी बच्चों के साथ मौजूद रहे, लेकिन सूरज पर बादलों का पहरा रहा। मौजूद अफसर और बच्चे चश्मा लगाए आसमान निहारते रहे, लेकिन रिंग आफ फायर नहीं दिखा। हालांकि, इसके बाद सीडीओ ने मौजूद सभी को सूर्य और चंद्रग्रहण समेत रिंग ऑफ फायर की विस्तार से जानकारी दी।