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सीजेएम ने तत्कालीन एडीएम के खिलाफ दिया परिवाद दायर करने का आदेश
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नवाबगंज जमीन घोटाले में नया मोड़
छह माह से लापता चकबंदी अहलमद कोर्ट में हुआ हाजिर, एडीएम पर लगाए गंभीर आरोप
वर्तमान में विशेष सचिव खाद्य के पद पर तैनात है बरेली में एडीएम रहे ओपी वर्मा
बरेली। नवाबगंज जमीन घोटाले में निलंबित और छह महीने से लापता अहलमद रमोद सक्सेना ने अचानक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में हाजिर होकर पूरा मामला ही पलट दिया। उसने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन एडीएम ओपी वर्मा ने उसे इस मामले में उसे न केवल फंसाया बल्कि आरोपियों का साथ देकर उससे मारपीट भी कराई। कोर्ट ने निलंबित अहलमद के बयानों को गंभीरता से लेते हुए परिवाद दर्ज कर मामले की स्वत: जांच करने की बात कही है। ओपी वर्मा वर्तमान में विशेष सचिव खाद्य एवं रसद के पद पर तैनात हैं।
कोर्ट में शपत्रपत्र के साथ दिए बयान में रमोद सक्सेना ने कहा कि वर्ष 2006 से न्यायालय बंदोबस्त में पीठासीन अधिकारी रमाकांत शुक्ला अपना एक फैसला उसके ऊपर मढ़ने लगे। विरोध किया तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, लेकिन जांच में वह दोषमुक्त हो गया, जबकि पीठासीन अधिकारी की गलती साबित हुई। इसके बाद रमाकांत शुक्ला ने ही मोहम्मद तारिक बनाम मुजम्मिल हुसैन के मामले में चकबंदी अधिकारी के 23 मई, 2000 के आदेश को पलट दिया और 24 जुलाई, 2017 को नया आदेश पारित कर दिया। बाद में संबंधित पुनर्स्थापना प्रार्थनापत्र को लेकर 20 अक्तूबर, 2016 को विपरीत आदेश तारिक के पक्ष में पारित कर दिया, जबकि तारिक की मृत्यु वर्ष 2006 में ही हो चुकी थी। यह आदेश न्यायालय उपसंचालक बरेली को 28 नवंबर, 2018 को भेजा गया। इस पर अपर जिलाधिकारी/न्यायालय पीओ ओपी वर्मा के भी हस्ताक्षर थे। तारिक के पक्ष में आगे भी पत्राचार हुआ, इसमें भी ओपी वर्मा के दस्तखत मौजूद रहे। यह मामला तब खुला जब विपक्षी मुजम्मिल हुसैन ने डीएम को प्रार्थना पत्र दिया, जिसमें तारिक की मृत्यु के बाद उनके हक में गलत और फर्जी तरीके से आदेश पारित करने की शिकायत की। रमोद ने अपने बयान में आगे कहा कि मामला उछला तो एडीएम ने खुद को बचाने के लिए उसका नाम इस घपले में शामिल करने का प्रयास किया। इसी के तहत 24 जनवरी, 2019 को शाम पांच बजे अपर जिलाधिकारी ने उसे अपने बरेली ऑफिस बुलाया। वहां उसके साथ मारपीट की गई और जबरन फर्जी बयान पर उसके हस्ताक्षर करा लिए। इस फर्जी कार्रवाई को कोतवाली भेज दिया और फिर 25 जनवरी, 2019 को बिना न्यायालय में पेश किए उसे जिला कारागार भेज दिया गया।
थाने में दर्ज ही नहीं था कोई मुकदमा
रमोद ने कोर्ट में कहा कि इस घटना के संबंध में थाने में कोई अभियोग पंजीकृत नहीं है। थाने से इस बाबत कोर्ट में आख्या भी उपलब्ध करा दी गई है। इस तरह उसके विरुद्घ फर्जी कार्रवाई करने, गाली गलौज और मारपीट करने का कार्य किया गया। कोर्ट से उसने घटना से संबंधित सभी तथ्य उपलब्ध कराने की बात कही। इस पर सीजेएम ने मामले को कोर्ट में परिवाद के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया।
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छह माह से लापता चकबंदी अहलमद कोर्ट में हुआ हाजिर, एडीएम पर लगाए गंभीर आरोप
वर्तमान में विशेष सचिव खाद्य के पद पर तैनात है बरेली में एडीएम रहे ओपी वर्मा
बरेली। नवाबगंज जमीन घोटाले में निलंबित और छह महीने से लापता अहलमद रमोद सक्सेना ने अचानक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में हाजिर होकर पूरा मामला ही पलट दिया। उसने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन एडीएम ओपी वर्मा ने उसे इस मामले में उसे न केवल फंसाया बल्कि आरोपियों का साथ देकर उससे मारपीट भी कराई। कोर्ट ने निलंबित अहलमद के बयानों को गंभीरता से लेते हुए परिवाद दर्ज कर मामले की स्वत: जांच करने की बात कही है। ओपी वर्मा वर्तमान में विशेष सचिव खाद्य एवं रसद के पद पर तैनात हैं।
कोर्ट में शपत्रपत्र के साथ दिए बयान में रमोद सक्सेना ने कहा कि वर्ष 2006 से न्यायालय बंदोबस्त में पीठासीन अधिकारी रमाकांत शुक्ला अपना एक फैसला उसके ऊपर मढ़ने लगे। विरोध किया तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, लेकिन जांच में वह दोषमुक्त हो गया, जबकि पीठासीन अधिकारी की गलती साबित हुई। इसके बाद रमाकांत शुक्ला ने ही मोहम्मद तारिक बनाम मुजम्मिल हुसैन के मामले में चकबंदी अधिकारी के 23 मई, 2000 के आदेश को पलट दिया और 24 जुलाई, 2017 को नया आदेश पारित कर दिया। बाद में संबंधित पुनर्स्थापना प्रार्थनापत्र को लेकर 20 अक्तूबर, 2016 को विपरीत आदेश तारिक के पक्ष में पारित कर दिया, जबकि तारिक की मृत्यु वर्ष 2006 में ही हो चुकी थी। यह आदेश न्यायालय उपसंचालक बरेली को 28 नवंबर, 2018 को भेजा गया। इस पर अपर जिलाधिकारी/न्यायालय पीओ ओपी वर्मा के भी हस्ताक्षर थे। तारिक के पक्ष में आगे भी पत्राचार हुआ, इसमें भी ओपी वर्मा के दस्तखत मौजूद रहे। यह मामला तब खुला जब विपक्षी मुजम्मिल हुसैन ने डीएम को प्रार्थना पत्र दिया, जिसमें तारिक की मृत्यु के बाद उनके हक में गलत और फर्जी तरीके से आदेश पारित करने की शिकायत की। रमोद ने अपने बयान में आगे कहा कि मामला उछला तो एडीएम ने खुद को बचाने के लिए उसका नाम इस घपले में शामिल करने का प्रयास किया। इसी के तहत 24 जनवरी, 2019 को शाम पांच बजे अपर जिलाधिकारी ने उसे अपने बरेली ऑफिस बुलाया। वहां उसके साथ मारपीट की गई और जबरन फर्जी बयान पर उसके हस्ताक्षर करा लिए। इस फर्जी कार्रवाई को कोतवाली भेज दिया और फिर 25 जनवरी, 2019 को बिना न्यायालय में पेश किए उसे जिला कारागार भेज दिया गया।
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थाने में दर्ज ही नहीं था कोई मुकदमा
रमोद ने कोर्ट में कहा कि इस घटना के संबंध में थाने में कोई अभियोग पंजीकृत नहीं है। थाने से इस बाबत कोर्ट में आख्या भी उपलब्ध करा दी गई है। इस तरह उसके विरुद्घ फर्जी कार्रवाई करने, गाली गलौज और मारपीट करने का कार्य किया गया। कोर्ट से उसने घटना से संबंधित सभी तथ्य उपलब्ध कराने की बात कही। इस पर सीजेएम ने मामले को कोर्ट में परिवाद के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया।
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