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सेवक जी के रचना संसार को मिलेगा पुनर्जीवन
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Tue, 28 Jun 2016 12:44 AM IST
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चंदा मामा दूर के..., दूर देश से आई तितली... जैसे चर्चित बाल गीत आज भी प्रचलित हैं लेकिन नई पीढ़ी इन गीतों के लेखक निरंकार देव सेवक के नाम से लगभग अनजान है। जनमानस को सेवक जी के बाल साहित्य से जोड़ने के लिए सोनभद्र के कवि जितेंद्र जौहर ने अनूठा प्रयास शुरू किया है। उनका कहना है कि सेवक रचनावली के नाम से सभी रचनाओं को संकलित किया जाएगा जिससे नई पीढ़ी इस साहित्य को पढ़ सके।
निरंकार देव सेवक ने तमाम अप्रकाशित रचनाओं के इतर लगभग 55 पुस्तकें लिखीं हैं। इनके जरिए सेवक रचनावली के विविध खंड जितेंद्र जौहर तैयार करेंगे। इसी सिलसिले में वह बरेली आए हैं। यहां कुछ दिन रुककर वह सेवक जी की पुत्रवधू पूनम सेवक से उनके जिला जेल स्थित आवास पर प्रकाशित, अप्रकाशित सामग्री जुटाई। उन्होंने बताया कि रचनावली के जरिए वह सेवक जी की रचनाधर्मिता को आज के साहित्य में शामिल कराना चाहते हैं। वजह यह है कि सेवक जी का साहित्य वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरा होने की वजह से आज के दौर में भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि सेवक जी की रचनाओं के अध्ययन में पाया है कि वह केवल बाल साहित्यकार के रूप में नहीं हैं बल्कि उनका प्रौढ़ साहित्य भी कमतर नहीं है। 1942-43 में लिखी उनकी ‘चिंगारी’ ने उस दौर में हलचल मचाई थी, जिस दौर में प्रगतिशील साहित्य ने चलना भी नहीं सीखा था। वह उनके प्रौढ़ साहित्य की उपेक्षा के कारणों की तलाश भी कर रहे हैं। जौहर का मानना है कि सेवक जी उस विचारधारा को जीते भी थे, जिसको अपने सृजन में अभिव्यक्त करते थे। सेवक रचनावली दिसंबर तक प्रकाशित होकर आ सकती है। कवि जितेंद्र जौहर हिंदी, उर्दू और फारसी भाषाओं में मुक्तक गढ़ने के लिए खास पहचान रखते हैं। उनकी लिखीं तमाम समसामयिक रचनाएं चर्चा का विषय रही हैं।
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निरंकार देव सेवक ने तमाम अप्रकाशित रचनाओं के इतर लगभग 55 पुस्तकें लिखीं हैं। इनके जरिए सेवक रचनावली के विविध खंड जितेंद्र जौहर तैयार करेंगे। इसी सिलसिले में वह बरेली आए हैं। यहां कुछ दिन रुककर वह सेवक जी की पुत्रवधू पूनम सेवक से उनके जिला जेल स्थित आवास पर प्रकाशित, अप्रकाशित सामग्री जुटाई। उन्होंने बताया कि रचनावली के जरिए वह सेवक जी की रचनाधर्मिता को आज के साहित्य में शामिल कराना चाहते हैं। वजह यह है कि सेवक जी का साहित्य वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरा होने की वजह से आज के दौर में भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि सेवक जी की रचनाओं के अध्ययन में पाया है कि वह केवल बाल साहित्यकार के रूप में नहीं हैं बल्कि उनका प्रौढ़ साहित्य भी कमतर नहीं है। 1942-43 में लिखी उनकी ‘चिंगारी’ ने उस दौर में हलचल मचाई थी, जिस दौर में प्रगतिशील साहित्य ने चलना भी नहीं सीखा था। वह उनके प्रौढ़ साहित्य की उपेक्षा के कारणों की तलाश भी कर रहे हैं। जौहर का मानना है कि सेवक जी उस विचारधारा को जीते भी थे, जिसको अपने सृजन में अभिव्यक्त करते थे। सेवक रचनावली दिसंबर तक प्रकाशित होकर आ सकती है। कवि जितेंद्र जौहर हिंदी, उर्दू और फारसी भाषाओं में मुक्तक गढ़ने के लिए खास पहचान रखते हैं। उनकी लिखीं तमाम समसामयिक रचनाएं चर्चा का विषय रही हैं।
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