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कोरोना ने आंखें खोलीं.. मिटी धुंध भया उजियारा
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lockdown
- फोटो : amar ujala
लॉकडाउन में सामान्य से भी कम हुआ प्रदूषण स्तर तो शहर से ही दिखने लगीं उत्तराखंड की पर्वत शृंखलाएं
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अंधाधुंध ट्रैफिक और निर्माण कार्य थमने से काबू में आया प्रदूषण अब फिर तीन सौ के करीब
बरेली। कोरोना के दौर में तीन महीने के लॉकडाउन ने लोगों की आंखें खोल दीं। ट्रैफिक के साथ अंधाधुंध रफ्तार से हो रहे निर्माण कार्य भी रुके तो वायुमंडल में छाई रहने वाली धुंध छंटनी शुरू हो गई। धीरे-धीरे इस हद तक पर्यावरण सुधरा कि देश के टॉप-10 प्रदूषित शहरों में छठें नंबर पर रिकॉर्ड हुए बरेली से उत्तराखंड की पर्वत शृंखलाएं साफ झलकने लगीं। पहली बार शहर के लोगों ने समझा कि जिसे वे विकास समझते हैं, प्रकारांतर से वह किस कदर उनकी जिंदगी में जहर घोल रहा है।
यह विडंबना ही है कि लॉकडाउन खत्म होते ही लोगों ने यह सबक भुला दिया। लॉकडाउन में सामान्य से काफी कम 40 एक्यूआई तक रिकॉर्ड हुआ प्रदूषण 31 मई को शुरू हुए अनलॉक-1 से अनलॉक-5 के बीच छह गुना बढ़ गया। प्रदूषण स्तर ढाई सौ तक पहुंचने के बाद दिवाली पर सरकार ने प्रदूषण के रोकथाम के लिए कड़े निर्देश जारी किए। शहर में सेटेलाइट, चौपुला, किला, बदायूं रोड लालफाटक और चौकी चौराहे को हॉटस्पॉट बना दिया गया। यहां वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित होनी थी लेकिन यह प्रतिबंध ज्यादा दिन नहीं चल पाया।
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अव्यवस्थित निर्माण कार्यों से उठ रहे धूल के गुबार, सड़कों पर हजारों खटारा गाड़ियां दौड़ने और खेतों में पराली और कूड़ा जलाने जैसे कारणों से अब प्रदूषण का स्तर फिर तीन सौ एक्यूआई तक पहुंच रहा है। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी सूची में बरेली फिर राज्य के 26 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में आठवें नंबर पर पहुंच गया। बरेली कॉलेज में बॉटनी विभाग के एमिरेट्स प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक मानकों के अनुसार निर्माण कराने और वाहनों की संख्या कम करने से ही प्रदूषण कम किया जा सकता है।
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जमाने बाद शहर लौटी गौरैया फिर गांवों की ओर
प्रदूषण कम होने के बाद शहर से करीब 12 साल पहले लुप्त हो चुकी गौरैया फिर वापस लौट आई। फुदकी और परपल सनबर्ड जैसी चिड़ियां भी दिखनी शुरू हो गईं। बर्ड वॉचर काजलदास के मुताबिक करीब 25 साल पहले अंधाधुंध विकास कार्य शुरू होने से गौरैया ने शहर को छोड़ना शुरू कर दिया था। लॉकडाउन में शहर प्रदूषण मुक्त होने पर ये चिड़ियां लौट आईं। बर्ड वॉचर सचिन गौड़ के मुताबिक अब फिर करीब चार महीने से गौरैया शहर में दिखनी बंद हो गई हैं। ब्यूरो
वातावरण में ऑक्सीजन स्तर बढ़ा तो कम हुईं बीमारियां
कोरोना के दौर में डॉक्टरों ने तो मरीजों के इलाज से हाथ खींचा ही, दूसरा पहलू यह भी था कि लोगों की इलाज की जरूरत भी कम हो गई। संक्रमण से फैलने वाली बीमारियां काफी हद तक कम हो गईं। विशेषज्ञों ने प्रदूषणमुक्त वातावरण को ही इसकी वजह माना। लॉकडाउन में दवाखाने खुले हुए थे लेकिन उनकी सेल भी 75 फीसदी तक घट गई। केमिस्ट एसोसिएशन के दुर्गेश खटवानी के मुताबिक लॉकडाउन के दो सप्ताह बाद तक दवाओं की सर्वाधिक सेल हुई लेकिन 75 फीसदी तक गिर गई। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. सुदीप सरन के मुताबिक वातावरण में बढ़ी ऑक्सीजन ने लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ा दी। स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ने का भी असर हुआ।
लॉकडाउन में सामान्य ढंग से हुए 80 फीसदी प्रसव
कोरोना के दौर में अस्पतालों के दरवाजे मरीजों के लिए बंद हो जाने के बाद गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए पारंपरिक साधनों पर निर्भर हो गईं। इस दौरान ज्यादातर प्रसव सरकारी अस्पतालों में हुए या फिर लोगों ने दाइयों की मदद ली। हालांकि अब फिर सिजेरियन डिलीवरी का ग्राफ पुराने स्तर पर पहुंच गया है। स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक अप्रैल, मई और जून में 80 फीसदी प्रसव सामान्य हुए थे। हालांकि इस बीच कोरोना के डर से निजी अस्पतालों में डिलीवरी न कराए जाने से कई गर्भवती महिलाओं की सांसें भी थम गईं।
कारोबार-शिक्षा में तलाशे गए कई विकल्प
लॉक डाउन के दौरान रोजगार के अलावा कारोबार और शिक्षा सर्वाधिक प्रभावित हुई लेकिन नए प्रयोग करने वालों ने इसका भी तोड़ ढूंढ निकाला। घरेलू सामान की होम डिलीवरी शुरू हुई। मॉल की तर्ज पर छोटे किराना स्टोरों से भी होम डिलीवरी का सिलसिला शुरू हुआ तो अब तक थमा नहीं है। इसके साथ ऑनलाइन पढ़ाई भी विकल्प बन गई। कोरोना प्रभावित साल में सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और रिकॉर्डिंग के जरिए छात्रों का कोर्स पूरा हुआ। ग्रामीण इलाकों में एक मोबाइल तमाम छात्रों की पढ़ाई कराने का साधन बना। आलमपुर जाफराबाद की कक्षा पांच की एक छात्रा ने ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान प्रदेश में सर्वाधिक 25 लाख शब्द पढ़कर रिकॉर्ड बनाया जो दूसरों के लिए मिसाल बन गया।
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अंधाधुंध ट्रैफिक और निर्माण कार्य थमने से काबू में आया प्रदूषण अब फिर तीन सौ के करीब बरेली। कोरोना के दौर में तीन महीने के लॉकडाउन ने लोगों की आंखें खोल दीं। ट्रैफिक के साथ अंधाधुंध रफ्तार से हो रहे निर्माण कार्य भी रुके तो वायुमंडल में छाई रहने वाली धुंध छंटनी शुरू हो गई। धीरे-धीरे इस हद तक पर्यावरण सुधरा कि देश के टॉप-10 प्रदूषित शहरों में छठें नंबर पर रिकॉर्ड हुए बरेली से उत्तराखंड की पर्वत शृंखलाएं साफ झलकने लगीं। पहली बार शहर के लोगों ने समझा कि जिसे वे विकास समझते हैं, प्रकारांतर से वह किस कदर उनकी जिंदगी में जहर घोल रहा है।
यह विडंबना ही है कि लॉकडाउन खत्म होते ही लोगों ने यह सबक भुला दिया। लॉकडाउन में सामान्य से काफी कम 40 एक्यूआई तक रिकॉर्ड हुआ प्रदूषण 31 मई को शुरू हुए अनलॉक-1 से अनलॉक-5 के बीच छह गुना बढ़ गया। प्रदूषण स्तर ढाई सौ तक पहुंचने के बाद दिवाली पर सरकार ने प्रदूषण के रोकथाम के लिए कड़े निर्देश जारी किए। शहर में सेटेलाइट, चौपुला, किला, बदायूं रोड लालफाटक और चौकी चौराहे को हॉटस्पॉट बना दिया गया। यहां वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित होनी थी लेकिन यह प्रतिबंध ज्यादा दिन नहीं चल पाया।
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अव्यवस्थित निर्माण कार्यों से उठ रहे धूल के गुबार, सड़कों पर हजारों खटारा गाड़ियां दौड़ने और खेतों में पराली और कूड़ा जलाने जैसे कारणों से अब प्रदूषण का स्तर फिर तीन सौ एक्यूआई तक पहुंच रहा है। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी सूची में बरेली फिर राज्य के 26 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में आठवें नंबर पर पहुंच गया। बरेली कॉलेज में बॉटनी विभाग के एमिरेट्स प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक मानकों के अनुसार निर्माण कराने और वाहनों की संख्या कम करने से ही प्रदूषण कम किया जा सकता है।
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