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धार्मिक ग्रंथों को समझते तो नहीं होता कोरोना का संक्रमण
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
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सदियों पहले धर्म ग्रंथों में संक्रमण से निपटनेे के सुझाए गए हैं उपाय, आधुनिकता ने किया संक्रमित
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बरेली। धर्म ग्रंथों में सदियों पहले ही संक्रमण से निपटने के उपाए सुझाए गए हैं, मगर उन्हें समझने से ज्यादा लोगों का ध्यान मखौल उड़ाने पर रहा। पश्चिमी देशों की सभ्यता और संस्कृति का अंधानुकरण किए जाने के चलते आज देश महामारी की चपेट में है। यह कहना है शहर के वरिष्ठ चिकित्सकों, बुद्धिजीवियों का। उन्होंने दावा कि अगर लोग अपने-अपने धर्म में बताए स्वस्थ और स्वच्छ रहने के तरीकों को दिनचर्या में शामिल करें तो कोरोना वायरस से संक्रमित होने की आशंका बेहद कम हो जाएगी।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एके चौहान के मुताबिक, इस्लाम, हिंदू, जैन और क्रिश्चियन सभी धर्मों में बगैर एक दूजे का संपर्क किए अभिवादन किए जाने की बात कही है। इसका मकसद लोगों को सुरक्षित रखने का था। ताकि दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से उसके शरीर पर जीवाणु का संक्रमण न हो सके। इसके अलावा घर में प्रवेश करने के दौरान जूते, चप्पल बाहर निकालकर आना, सुबह और शाम स्नान करना, दूसरे के बचे खुचे भोजन को न खाना और अंतिम संस्कार के तरीके भी लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए थे। उनका कहना है कि युवा पीढ़ी और उनके माता-पिता भी इनका पालन नहीं कर रहे।
वरिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. विकास वर्मा ने कहा कि लोग संस्कारों को गलत समझते हैं, जबकि इन्हीं संस्क ारों को अब वैज्ञानिक स्वीकृत मिल चुकी है। कहा, साफ-सफाई के लिए, अभिवादन के लिए, धार्मिक क्रिया कलापों (हवन, पूजन, मंत्रोच्चारण) के लिए जो भी दिनचर्या धर्मग्रंथों में बताई गई है, लोग अब उसे भूलते जा रहे हैं। हाथ-पांव धोकर घर में प्रवेश करने की भी प्रक्रिया का मकसद था कि लोगों में अगर कोई बैक्टीरिया या वायरस का संक्रमण हुआ है तो वह घर के बाहर ही साफ कर लिया जाए। ताकि परिवार के लोग सुरक्षित रहें। कहा, धर्म इतनी वैज्ञानिक विधियों से भरे हुए हैं, जिसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। बशर्ते लोग उसे मानें।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एके चौहान के मुताबिक, इस्लाम, हिंदू, जैन और क्रिश्चियन सभी धर्मों में बगैर एक दूजे का संपर्क किए अभिवादन किए जाने की बात कही है। इसका मकसद लोगों को सुरक्षित रखने का था। ताकि दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से उसके शरीर पर जीवाणु का संक्रमण न हो सके। इसके अलावा घर में प्रवेश करने के दौरान जूते, चप्पल बाहर निकालकर आना, सुबह और शाम स्नान करना, दूसरे के बचे खुचे भोजन को न खाना और अंतिम संस्कार के तरीके भी लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए थे। उनका कहना है कि युवा पीढ़ी और उनके माता-पिता भी इनका पालन नहीं कर रहे।
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वरिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. विकास वर्मा ने कहा कि लोग संस्कारों को गलत समझते हैं, जबकि इन्हीं संस्क ारों को अब वैज्ञानिक स्वीकृत मिल चुकी है। कहा, साफ-सफाई के लिए, अभिवादन के लिए, धार्मिक क्रिया कलापों (हवन, पूजन, मंत्रोच्चारण) के लिए जो भी दिनचर्या धर्मग्रंथों में बताई गई है, लोग अब उसे भूलते जा रहे हैं। हाथ-पांव धोकर घर में प्रवेश करने की भी प्रक्रिया का मकसद था कि लोगों में अगर कोई बैक्टीरिया या वायरस का संक्रमण हुआ है तो वह घर के बाहर ही साफ कर लिया जाए। ताकि परिवार के लोग सुरक्षित रहें। कहा, धर्म इतनी वैज्ञानिक विधियों से भरे हुए हैं, जिसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। बशर्ते लोग उसे मानें।
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