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सीएम भी चालू नहीं करा पाए डेयरी
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Sun, 10 Apr 2016 01:29 AM IST
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्राथमिकता में शामिल बरेली की पराग डेयरी चार साल में भी उत्पादन शुरू नहीं कर पाई। इस डेयरी के विकास के लिए मुख्यमंत्री के निर्देश थे कि जितने रुपये की जरूरत हो उतने मिल जाएंगे लेकिन उत्पादन जरूर कराए। जिससे कि यहां के कर्मचारियों और दूध बेचने वालों को रोजगार मिलता रहे। अखिलेश यादव की सरकार के चार साल पूरे हो गए लेकिन उत्पादन के नाम पर सिर्फ दूध कलेक्शन सेंटर ही बना हुआ है। दलपतपुर की तरह यहां पर न तो पैक्ड मट्ठा मिल रहा हौ और न ही दूध। छैना की मिठाई, पेड़ा तथा खीर की बात तो अलग रही। इस डेयरी को चालू कराने के लिए अब तक चार करोड़ रुपये का खर्चा हो गया है। यह राशि कहां और किस मद में खर्च हुई है, कोई भी इसकी जानकारी देने को तैयार नहीं है।
2012 में अखिलेश यादव सपा के मुखिया की हैसियत से बरेली आए थे। उन दिनों सर्किट हाउस में दुग्ध संघ के अध्यक्ष लल्लू सिंह यादव के साथ कई दर्जन डेयरी कर्मचारी मिले थे। उन्होंने पराग डेयरी में तालाबंदी होने पर यहां के करीब दो सौ कर्मचारियों की रोजी रोटी का मुद्दा रखा था। उस समय तो उन्होंने कहा था कि बसपा की सरकार है, कुछ नहीं कर सकते। प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो इस डेयरी को जरूर चालू कराएंगे।
2013 में सपा की सरकार बनी और कर्मचारियों को पराग डेयरी के चालू होने की उम्मीद हुई। डेयरी के कर्मचारी उन दिनों दुग्ध संघ के अध्यक्ष लल्लू सिंह यादव के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लखनऊ में मिलेे । उन्होंने 2012 में बरेली के सर्किट हाउस में किए गए वादे के बारे में याद दिलाया। उसी समय मुख्यमंत्री ने डीएम को पराग डेयरी चालू करने के निर्देश दिए। इसी के बाद डीएम ने शुरू कराने की कवायद की और धनराशि रिलीज हुई लेकिन उत्पादन शुरु नहीं हुआ।
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पहले फेज में दूध को पैकिंग कर के बेचने का था। इसके लिए वायलर और चिलिंग प्लांट की मरम्मत। तथा पैकिंग का प्लांट लगना था लेकिन इनमें से कोई भी काम नहीं हुआ है। इसी वजह से चार साल में बरेली की पराग डेयरी से दूध की पैकिंग का काम शुरू नहीं हो सका है। अगले फेज में अन्य उत्पादनों में मट्ठा, खीर, छैना आदि बनाकर उत्पाद मार्केट में बेचे जाने थे। इनकी मशीन के लिए सात करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव था, जिसमें से चार करोड़ रुपये मिले। इस राशि से क्या-क्या हुआ, इस बारे में अधिकारी कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं। इतना जरूर है कि तीन हजार लीटर दूध खरीदकर दलपतपुर स्थित पराग डेयरी को भेजा जा रहा है। वहीं से तैयार होकर यह सामान बरेली के लोगों के लिए आ रहा है।
डेयरी के बंदी से अब तक का सफर
-10 फरवरी 2010 को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण लाक आउट
- 18 फरवरी 2013 को मुख्यमंत्री के निर्देश पर लॉक आउट समाप्त
-27 फरवरी 2013 को प्लांट शुरू कराने के लिए तकनीकी कमेटी बनाई गई
-03 मार्च 2013 को प्लांट के उपकरणों की मरम्मत को 61 लाख रुपये मांगे
-02 मई 2013 को डेयरी के विकास को सवा करोड़ रुपये मंजूर किए
-03 मई 2013 को दूध के लंबित 8.23 लाख का लंबित भुगतान किया गया
-21 मई को डेयरी संचालन के लिए 150 एमबीए का कनेक्शन लिया गया
‘डेयरी का प्रबंधन चालू नहीं होने दे रहा है। सिर्फ चार दर्जन कर्मचारी दुग्ध संग्रह में लगे हैं। प्रोसेसिंग का काम नहीं हो रहा है। शासन से चार करोड़ रुपये मिले हैं, इस राशि का दुरुपयोग हुआ है, जिसकी शिकायत मुख्यमंत्री से करेंगे।’ लल्लू सिंह यादव, अध्यक्ष, जिला दुग्ध संघ
‘डेयरी में पशु पालकों का करीब तीन हजार लीटर प्रतिदिन दूध लिया जा रहा है, जिसकी प्रोसेसिंग कराकर बाजार में बिक्री के लिए भेज रहे हैं।’ डीके वर्मा, महाप्रबंधक
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2012 में अखिलेश यादव सपा के मुखिया की हैसियत से बरेली आए थे। उन दिनों सर्किट हाउस में दुग्ध संघ के अध्यक्ष लल्लू सिंह यादव के साथ कई दर्जन डेयरी कर्मचारी मिले थे। उन्होंने पराग डेयरी में तालाबंदी होने पर यहां के करीब दो सौ कर्मचारियों की रोजी रोटी का मुद्दा रखा था। उस समय तो उन्होंने कहा था कि बसपा की सरकार है, कुछ नहीं कर सकते। प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो इस डेयरी को जरूर चालू कराएंगे।
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2013 में सपा की सरकार बनी और कर्मचारियों को पराग डेयरी के चालू होने की उम्मीद हुई। डेयरी के कर्मचारी उन दिनों दुग्ध संघ के अध्यक्ष लल्लू सिंह यादव के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लखनऊ में मिलेे । उन्होंने 2012 में बरेली के सर्किट हाउस में किए गए वादे के बारे में याद दिलाया। उसी समय मुख्यमंत्री ने डीएम को पराग डेयरी चालू करने के निर्देश दिए। इसी के बाद डीएम ने शुरू कराने की कवायद की और धनराशि रिलीज हुई लेकिन उत्पादन शुरु नहीं हुआ।
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पहले फेज में दूध को पैकिंग कर के बेचने का था। इसके लिए वायलर और चिलिंग प्लांट की मरम्मत। तथा पैकिंग का प्लांट लगना था लेकिन इनमें से कोई भी काम नहीं हुआ है। इसी वजह से चार साल में बरेली की पराग डेयरी से दूध की पैकिंग का काम शुरू नहीं हो सका है। अगले फेज में अन्य उत्पादनों में मट्ठा, खीर, छैना आदि बनाकर उत्पाद मार्केट में बेचे जाने थे। इनकी मशीन के लिए सात करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव था, जिसमें से चार करोड़ रुपये मिले। इस राशि से क्या-क्या हुआ, इस बारे में अधिकारी कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं। इतना जरूर है कि तीन हजार लीटर दूध खरीदकर दलपतपुर स्थित पराग डेयरी को भेजा जा रहा है। वहीं से तैयार होकर यह सामान बरेली के लोगों के लिए आ रहा है।
डेयरी के बंदी से अब तक का सफर
-10 फरवरी 2010 को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण लाक आउट
- 18 फरवरी 2013 को मुख्यमंत्री के निर्देश पर लॉक आउट समाप्त
-27 फरवरी 2013 को प्लांट शुरू कराने के लिए तकनीकी कमेटी बनाई गई
-03 मार्च 2013 को प्लांट के उपकरणों की मरम्मत को 61 लाख रुपये मांगे
-02 मई 2013 को डेयरी के विकास को सवा करोड़ रुपये मंजूर किए
-03 मई 2013 को दूध के लंबित 8.23 लाख का लंबित भुगतान किया गया
-21 मई को डेयरी संचालन के लिए 150 एमबीए का कनेक्शन लिया गया
‘डेयरी का प्रबंधन चालू नहीं होने दे रहा है। सिर्फ चार दर्जन कर्मचारी दुग्ध संग्रह में लगे हैं। प्रोसेसिंग का काम नहीं हो रहा है। शासन से चार करोड़ रुपये मिले हैं, इस राशि का दुरुपयोग हुआ है, जिसकी शिकायत मुख्यमंत्री से करेंगे।’ लल्लू सिंह यादव, अध्यक्ष, जिला दुग्ध संघ
‘डेयरी में पशु पालकों का करीब तीन हजार लीटर प्रतिदिन दूध लिया जा रहा है, जिसकी प्रोसेसिंग कराकर बाजार में बिक्री के लिए भेज रहे हैं।’ डीके वर्मा, महाप्रबंधक