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सड़कें बनवाने पर अटका हिसाब तो शासन को क्या दें जवाब
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शासन के सत्यापन प्रमाणपत्र मांगने पर फंसे नगर निगम के अफसर, नहीं भेजी जा सकी रिपोर्ट
पार्षद कहते हैं करप्शन में अटक गया है सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान
बरेली। अफसरशाही शासन की प्राथमिकताओं पर कितनी जिम्मेदारी से काम कर रही है, शहरी सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान भी उसकी एक बानगी है। अब शासन से गड्ढामुक्त की गई सड़कों का हिसाब मांगे जाने के बाद खुलासा हुआ है कि मई 2018 में जारी हुए शासन के इस आदेश का नगर निगम के अफसरों ने संज्ञान ही नहीं लिया। यानी डेढ़ साल से ज्यादा वक्त होने के बाद भी शहर की सड़कों को गड्ढामुक्त करना तो दूर, उनके टेंडर कराने तक में दिलचस्पी नहीं ली गई। पब्लिक ने भी इस बीच जमकर हाय-तौबा की लेकिन उसका भी कोई असर नहीं पड़ा।
अगर पूरे शहर का हाल एक साथ बयान किया जाए तो कह सकते हैं कि शहर की एक भी सड़क गड्ढामुक्त नहीं है। वीआईपी इलाकों के साथ मुख्य सड़कों के भी हालात बुरे हैं तो आम इलाकों में तो तमाम सड़कें चलने लायक भी नहीं रह गई हैं। श्यामगंज से सेटेलाइट अड्डे की ओर जाने वाली सड़क के गड्ढे देखकर तो पिछले दिनों बरेली आए प्रमुख सचिव नवनीत सहगल तक असहज हो गए थे। इसके अलावा डेलापीर रोड का भी भारी ट्रैफिक चलने के बावजूद बुरा हाल है। शासन ने 23 दिसंबर को पत्र जारी कर 26 दिसंबर तक सड़कों को गड्ढामुक्त किए जाने का प्रमाणपत्र मांगा था, लेकिन यह प्रमाणपत्र शासन को नहीं भेजा जा सका है। नगर निगम के अफसरों के सामने दिक्कत यह है कि गलत रिपोर्ट भेजने पर शासन किसी अफसर को भेजकर सत्यापन भी करा सकता है, लिहाजा इस मुश्किल से बचने के लिए दूसरे रास्ते तलाश किए जा रहे हैं।
नगर निगम के खाते में 6 सौ करोड़ फिर भी नहीं
मिलता पेमेंट, काम ही नहीं ले रहे ठेकेदार
ऐसा नहीं है कि सड़कों को बनवाने के लिए नगर निगम ने टेंडर न निकाले हों लेकिन मुश्किल यह है कि अब ठेकेदार ही टेंडर लेने नहीं आ रहे हैं। ठेकेदार इसके पीछे यह वजह बताते हैं कि अफसर उनसे इतना ज्यादा कमीशन मांगने लगे हैं जो अपनी गर्दन नपवाने का जोखिम उठाकर देना मुमकिन ही नहीं है। कई ठेकेदारों का यह भी कहना है कि नगर निगम उनके पुराने कामों का ही पेमेंट अटकाए बैठा है, लिहाजा वे इस स्थिति में ही नहीं रह गए हैं कि और पैसा फंसाकर नगर निगम के काम लें। ठेकेदार कहते हैं कि नगर निगम के खजाने में छह सौ करोड़ से ज्यादा रकम पड़ी है लेकिन अफसर उनकी सुनते नहीं और बाबू इधर से उधर दौड़ाते रहते हैं।
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यह भी खेल.. 15 हजार का काम लाखों में
नगर निगम के एक अधिकारी ने अपना नाम न छापने की गुजारिश करते हुए बताया कि सड़कों को गड्ढामुक्त करने के लिए 15-15 हजार लागत के टेंडरों को पहले लाखों में निकाला गया। ठेकेदारों ने मिट्टी और गिट्टी डालकर गड्ढों को भर दिया जो बरसात में मिट्टी बह जाने से फिर जैसे के तैसे हो गए। यही वजह है कि शहर के अधिकतर इलाकों में अचानक एक बार फिर हजारों गड्ढे दिखाई देने लगे हैं। पोल खुलने का डर है कि नगर निगम अधिकारी शासन को चाहकर भी रिपोर्ट नहीं भेज पा रहे हैं क्योंकि रिपोर्ट का वेरिफिकेशन कराते ही सारा गोलमाल सामने आ जाएगा।
सड़कों की बात पूछो तो भड़कते हैं पार्षद
ठेके ही नहीं हो रहे, सड़कें कैसे बनें
गड्ढे तो छोड़िए, निगम सड़क का निर्माण तक नहीं करा पा रहा है। पिछले दिनों संजय नगर में श्मशान से त्रिमूर्ति मोड़ तक टूटी सड़क के लिए टेंडर निकाला गया जो नहीं हो सका। दूसरी बार भी कोई टेंडर लेने नहीं आया। नगर निगम अफसरों की शर्तों की वजह से कोई ठेकेदार ठेका लेने को तैयार नहीं है। सड़कों के गड्ढामुक्त करने की बात भूल ही जाइए। - वीरेंद्र कुमार, पार्षद वार्ड 14
सड़क में गड्ढे नहीं, गड्ढों में सड़क ढूंढें
नगर निगम की सड़कों में गड्ढे मत ढूंढिए, गडढों में सड़क तलाश करिए। यहां तो मंत्रियों के आदेश तक दरकिनार कर दिए जाते हैं। पिछले दिनों हरुनगला पहुंचे प्रभारी मंत्री श्रीकांत शर्मा ने वहां नालियों और सड़कों को ठीक करने के आदेश दिए थे। अफसरों ने नालियों की मरम्मत के लिए वहां ईंटें डालने का दावा किया जिन्हें अब उठा लिया गया है। ऐसे हैं निगम के अफसर।- नरेश शर्मा, पार्षद वार्ड 17
ठेकेदारों को पहले भुगतान तो कराइए
पिछले दिनों नगर निगम ने सिकलापुर में एक सड़क बनाने को टेंडर निकाला। टेंडर सीसी रोड का निकाला गया लेकिन इसमें मैटेरियल हार्ड मिक्स लिख दिया गया तो ठेकेदार पीछे हट गए। टेंडर में इस तरह की खामी और ठेकेदारों का समय से भुगतान न होने से टेंडर अंटके पड़े हैं। जब टेंडर ही नहीं हो रहे तो सड़कें न बन पाएंगी न गड्ढामुक्त हो पाएंगी। - विनोद सैनी. पार्षद वार्ड 64
चमकी सड़कें चमकाएंगे अफसर
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहर की चमचमाती सड़कों का चयन किया गया है। ज्यादातर वार्डों को स्मार्ट सिटी से बाहर कर दिया गया है जबकि 70 प्रतिशत वार्डों की सड़कों की स्थिति काफी बदतर है। इनका टेंडर तक लेने को कोई तैयार नहीं। न निगम अधिकारी टेंडर के लिए कोई पहल कर रहे हैं। ऐसे में गड्ढामुक्त सड़कों की उम्मीद करना ही हास्यास्पद है। - हरिओम कश्यप, पार्षद वार्ड 40
हम बनवाते हैं, जलकल विभाग खोद देता है सड़कें
सड़कों को ठीक करने को लेकर लगातार टेंडर निकाले जा रहे हैं। कुछ सड़कें ऐसी हैं जिनके बनने के बाद नगर निगम का ही जलकल विभाग और जल निगम पाइप लाइनें डालने के लिए खुदाई कर देता है। इससे उन पर फिर गड्ढे हो गए हैं। जल्द इन गड्ढों को भर दिया जाएगा। शासन को रिपोर्ट भेजना एक रूटीन प्रक्रिया है। वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए में रिपोर्ट जल्द भेज दी जाएगी।
मनोज गुप्ता, एई, निर्माण विभाग नगर निगम
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पार्षद कहते हैं करप्शन में अटक गया है सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान
बरेली। अफसरशाही शासन की प्राथमिकताओं पर कितनी जिम्मेदारी से काम कर रही है, शहरी सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान भी उसकी एक बानगी है। अब शासन से गड्ढामुक्त की गई सड़कों का हिसाब मांगे जाने के बाद खुलासा हुआ है कि मई 2018 में जारी हुए शासन के इस आदेश का नगर निगम के अफसरों ने संज्ञान ही नहीं लिया। यानी डेढ़ साल से ज्यादा वक्त होने के बाद भी शहर की सड़कों को गड्ढामुक्त करना तो दूर, उनके टेंडर कराने तक में दिलचस्पी नहीं ली गई। पब्लिक ने भी इस बीच जमकर हाय-तौबा की लेकिन उसका भी कोई असर नहीं पड़ा।
अगर पूरे शहर का हाल एक साथ बयान किया जाए तो कह सकते हैं कि शहर की एक भी सड़क गड्ढामुक्त नहीं है। वीआईपी इलाकों के साथ मुख्य सड़कों के भी हालात बुरे हैं तो आम इलाकों में तो तमाम सड़कें चलने लायक भी नहीं रह गई हैं। श्यामगंज से सेटेलाइट अड्डे की ओर जाने वाली सड़क के गड्ढे देखकर तो पिछले दिनों बरेली आए प्रमुख सचिव नवनीत सहगल तक असहज हो गए थे। इसके अलावा डेलापीर रोड का भी भारी ट्रैफिक चलने के बावजूद बुरा हाल है। शासन ने 23 दिसंबर को पत्र जारी कर 26 दिसंबर तक सड़कों को गड्ढामुक्त किए जाने का प्रमाणपत्र मांगा था, लेकिन यह प्रमाणपत्र शासन को नहीं भेजा जा सका है। नगर निगम के अफसरों के सामने दिक्कत यह है कि गलत रिपोर्ट भेजने पर शासन किसी अफसर को भेजकर सत्यापन भी करा सकता है, लिहाजा इस मुश्किल से बचने के लिए दूसरे रास्ते तलाश किए जा रहे हैं।
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नगर निगम के खाते में 6 सौ करोड़ फिर भी नहीं
मिलता पेमेंट, काम ही नहीं ले रहे ठेकेदार
ऐसा नहीं है कि सड़कों को बनवाने के लिए नगर निगम ने टेंडर न निकाले हों लेकिन मुश्किल यह है कि अब ठेकेदार ही टेंडर लेने नहीं आ रहे हैं। ठेकेदार इसके पीछे यह वजह बताते हैं कि अफसर उनसे इतना ज्यादा कमीशन मांगने लगे हैं जो अपनी गर्दन नपवाने का जोखिम उठाकर देना मुमकिन ही नहीं है। कई ठेकेदारों का यह भी कहना है कि नगर निगम उनके पुराने कामों का ही पेमेंट अटकाए बैठा है, लिहाजा वे इस स्थिति में ही नहीं रह गए हैं कि और पैसा फंसाकर नगर निगम के काम लें। ठेकेदार कहते हैं कि नगर निगम के खजाने में छह सौ करोड़ से ज्यादा रकम पड़ी है लेकिन अफसर उनकी सुनते नहीं और बाबू इधर से उधर दौड़ाते रहते हैं।
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नगर निगम के एक अधिकारी ने अपना नाम न छापने की गुजारिश करते हुए बताया कि सड़कों को गड्ढामुक्त करने के लिए 15-15 हजार लागत के टेंडरों को पहले लाखों में निकाला गया। ठेकेदारों ने मिट्टी और गिट्टी डालकर गड्ढों को भर दिया जो बरसात में मिट्टी बह जाने से फिर जैसे के तैसे हो गए। यही वजह है कि शहर के अधिकतर इलाकों में अचानक एक बार फिर हजारों गड्ढे दिखाई देने लगे हैं। पोल खुलने का डर है कि नगर निगम अधिकारी शासन को चाहकर भी रिपोर्ट नहीं भेज पा रहे हैं क्योंकि रिपोर्ट का वेरिफिकेशन कराते ही सारा गोलमाल सामने आ जाएगा।
सड़कों की बात पूछो तो भड़कते हैं पार्षद
ठेके ही नहीं हो रहे, सड़कें कैसे बनें
गड्ढे तो छोड़िए, निगम सड़क का निर्माण तक नहीं करा पा रहा है। पिछले दिनों संजय नगर में श्मशान से त्रिमूर्ति मोड़ तक टूटी सड़क के लिए टेंडर निकाला गया जो नहीं हो सका। दूसरी बार भी कोई टेंडर लेने नहीं आया। नगर निगम अफसरों की शर्तों की वजह से कोई ठेकेदार ठेका लेने को तैयार नहीं है। सड़कों के गड्ढामुक्त करने की बात भूल ही जाइए। - वीरेंद्र कुमार, पार्षद वार्ड 14
सड़क में गड्ढे नहीं, गड्ढों में सड़क ढूंढें
नगर निगम की सड़कों में गड्ढे मत ढूंढिए, गडढों में सड़क तलाश करिए। यहां तो मंत्रियों के आदेश तक दरकिनार कर दिए जाते हैं। पिछले दिनों हरुनगला पहुंचे प्रभारी मंत्री श्रीकांत शर्मा ने वहां नालियों और सड़कों को ठीक करने के आदेश दिए थे। अफसरों ने नालियों की मरम्मत के लिए वहां ईंटें डालने का दावा किया जिन्हें अब उठा लिया गया है। ऐसे हैं निगम के अफसर।- नरेश शर्मा, पार्षद वार्ड 17
ठेकेदारों को पहले भुगतान तो कराइए
पिछले दिनों नगर निगम ने सिकलापुर में एक सड़क बनाने को टेंडर निकाला। टेंडर सीसी रोड का निकाला गया लेकिन इसमें मैटेरियल हार्ड मिक्स लिख दिया गया तो ठेकेदार पीछे हट गए। टेंडर में इस तरह की खामी और ठेकेदारों का समय से भुगतान न होने से टेंडर अंटके पड़े हैं। जब टेंडर ही नहीं हो रहे तो सड़कें न बन पाएंगी न गड्ढामुक्त हो पाएंगी। - विनोद सैनी. पार्षद वार्ड 64
चमकी सड़कें चमकाएंगे अफसर
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहर की चमचमाती सड़कों का चयन किया गया है। ज्यादातर वार्डों को स्मार्ट सिटी से बाहर कर दिया गया है जबकि 70 प्रतिशत वार्डों की सड़कों की स्थिति काफी बदतर है। इनका टेंडर तक लेने को कोई तैयार नहीं। न निगम अधिकारी टेंडर के लिए कोई पहल कर रहे हैं। ऐसे में गड्ढामुक्त सड़कों की उम्मीद करना ही हास्यास्पद है। - हरिओम कश्यप, पार्षद वार्ड 40
हम बनवाते हैं, जलकल विभाग खोद देता है सड़कें
सड़कों को ठीक करने को लेकर लगातार टेंडर निकाले जा रहे हैं। कुछ सड़कें ऐसी हैं जिनके बनने के बाद नगर निगम का ही जलकल विभाग और जल निगम पाइप लाइनें डालने के लिए खुदाई कर देता है। इससे उन पर फिर गड्ढे हो गए हैं। जल्द इन गड्ढों को भर दिया जाएगा। शासन को रिपोर्ट भेजना एक रूटीन प्रक्रिया है। वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए में रिपोर्ट जल्द भेज दी जाएगी।
मनोज गुप्ता, एई, निर्माण विभाग नगर निगम