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संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं 119 साल के महंत सिद्धेश्वर गिरी

Sat, 07 Sep 2019 02:05 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 07 Sep 2019 02:05 AM IST
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संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं 119 साल के महंत सिद्धेश्वर गिरी - फोटो : अमर उजाला, बरेली

पीलीभीत के बिलसंडा के गौरी शंकर महादेव मंदिर में हैं महंत

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बरेली। कहते हैं कि लंबी आयु के लिए सात्विक भोजन खाओ, ब्रह्मचर्य का पालन करो और लंबा चलो। हालांकि यह हर किसी पर नहीं कुछ बिरलों पर ही फिट बैठती है। इन्हीं में से एक नाम है महंत सिद्धेश्वर गिरी, जो अपनी उम्र 119 होने का दावा कर रहे हैं।
सिद्धेश्वर गिरी पीलीभीत के बिलसंडा में गौरी शंकर महादेव मंदिर में महंत हैं। उनकी दिनचर्या सुबह दो बजे से ही शुरू हो जाती है। दैनिक कार्यों से निवृत्त होेने बाद मंदिर के कपाट ब्रह्म मुहूर्त में ही खुलवा देते हैं। इसके बाद भक्तों का मंदिर परिसर में आनाजाना शुरू हो जाता। इस दौरान वह भक्तों की पीड़ा के उपाय भी सुझाते हैं। ऐसा वह सालों से करते आ रहे हैं।
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करीब तीन माह पहले पैर फिसल जाने के कारण उनके कमर और पैर में फ्रैक्चर आ गया था, जिसका इलाज शहर में डॉ. ब्रजेश्वर सिंह कर रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में महंत का उत्साह देखकर डॉ. ब्रजेश्वर की पूरी टीम उत्साहित है। मंदिर परिसर में उनकी देखरेख की जिम्मेदारी रामसिंह वर्मा, नन्हे वर्मा, देवकी मुनीम, हरि वर्मा आदि उठा रहे हैं।
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केवल पांच घंटे ही सोते हैं

सुबह नौ बजे के करीब हल्के नाश्ते के बाद पूर्वाह्न 11 बजे भोजन करके शाम चार बजे तक के लिए मौन धारण कर लेते हैं। शाम करीब पांच बजे से भक्तों की आवाजाही फिर से शुरू हो जाती है। रात करीब आठ बजे हल्के भोजन के बाद नौ बजे सोने चले जाते हैं।

पंच दशनाम जूना अखाड़ा के रह चुके हैं सचिव

महंत सिद्धेश्वर गिरी बताते हैं इन्हीं दिनों भादों में 1901 में उनका जन्म हुआ था। लगभग 14 साल की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य धारण किया। इसके बाद कभी अपने घर की ओर रुख नहीं किया। माता-पिता के पूछने पर सिर्फ इतना ही कहा, मां तो मां होती है, फिर वो चाहे देवी मां ही क्यों न हों। बताते हैं कि उन्होंने पहली बार महंत पद की जिम्मेदारी बिहार के जलपुरा में स्थित एक मठ से संभाली। यहां वह करीब 35 साल रहे। 1950 के आसपास वह पंच दशनाम जूना अखाड़ा, वाराणसी आ गए। यहां उन्होंने लंबा वक्त बिताया। यहीं 1974-80 में अखाड़ा के सचिव भी रहे। इसके बाद वह टिक्सी महादेव, इटावा के स्थानाधिपति (महंत) बनाए गए। वहां कुछ समय बिताने के बाद करीब 35 सालों से बिलसंडा के मंदिर में हैं।
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