UP News: दहेज उत्पीड़न की आड़ में कानून का दुरुपयोग, बरेली में कोर्ट ने महिला पर लगाया जुर्माना
बरेली में पारिवारिक न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून का गलत इस्तेमाल करने पर महिला पर एक लाख रुपये जुर्माना लगाया है। फैसला सुनाते वक्त न्यायालय ने अतुल सुभाष की आत्महत्या के मामले का भी जिक्र किया।
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बरेली में ससुराल वालों को मानसिक रूप से परेशान करने और दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून का गलत इस्तेमाल करने पर पारिवारिक न्यायालय ने महिला पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। 15 साल पुरानी शादी को रद्द करते हुए एक माह के भीतर धनराशि का भुगतान वादी को करने का आदेश दिया है। फैसला सुनाते वक्त अपर न्यायाधीश ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने शुक्रवार को अतुल सुभाष की आत्महत्या के चर्चित मामले का जिक्र करते हुए तल्ख टिप्पणी भी की है।
शहर के रामपुर गार्डन की रहने वाली युवती का विवाह दिल्ली के प्रीत विहार निवासी युवक से 23 अप्रैल 2012 को हुआ था। युवक दिल्ली की एक कंपनी में जोनल मैनेजर है। महिला उच्च शिक्षित होने के साथ ही लखीमपुर खीरी जिले में सरकारी शिक्षिका के रूप में तैनात है। वह एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स ऑफ इंडिया की प्रमाणित सलाहकार भी है।
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युवक के अनुसार, शादी के बाद से ही पत्नी ने उसकी सीमित आय के लिए उसे नीचा दिखाना शुरू कर दिया। हनीमून में गोवा के बजाय विदेश जाने के लिए उसने कई बार उसे लज्जित किया। वर्ष 2014-15 में पति के विरुद्ध पत्नी ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट किए। इसके बाद युवक ने वर्ष 2017 में दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका लगाई।
महिला ने कहा था- न चैन से रहूंगा न रहने दूंगी
महिला को नोटिस मिला तो उसने बरेली में ही पति व ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया। इस पर युवक ने वर्ष 2017 में इलाहबाद हाईकोर्ट से स्टे ले लिया। इस दौरान महिला ने पति से कहा कि न चैन से रहूंगी, न ही रहने दूंगी। 20 सितंबर 2021 को यह प्रकरण पारिवारिक न्यायालय के सामने आया।
सम्मान का अभाव हो तो वह शिक्षा अधूरी
अदालत ने यह भी कहा कि आधुनिकता के नकारात्मक प्रभाव के चलते नगरीय मध्यमवर्गीय परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पारिवारिक मूल्यों पर वरीयता दी जा रही है। टिप्पणी में कहा गया कि उच्च शिक्षा के बावजूद यदि पारिवारिक संस्कारों तो वह शिक्षा अधूरी है।
दहेज उत्पीड़न कानून का गलत इस्तेमाल करने के मामले में फैसला सुनाते वक्त कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस प्रकरण में महिला ने ऐसी शर्त रखी कि जब पति अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देगा, तब वह उसके साथ रहेगी। ऐसी इच्छा रखने वाली युवतियों को कोई हक नहीं है कि वह किसी माता-पिता के इकलौते सहारे को उनसे छीनें। ऐसी युवतियों को अपने वरीयता कॉलम में स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा वर अपेक्षित है जो माता-पिता, भाई-बहन की संबद्धता या दायित्व से मुक्त हो।
इस प्रकरण में कोर्ट ने महिला पर उदाहरणात्मक व्यय अधिरोपित कर लगाया है। यह रकम वादी को दिलाई जाएगी, ताकि भविष्य में पवित्र न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का निवारण संभव हो सके। कोर्ट ने फैसले में उल्लेख किया है कि महिला अपने पति व ससुराल वालों से क्रूरतापूर्ण व्यवहार करती है। वर्ष 2014 से उन्हें दोषी सिद्ध करने में लगी है, मगर उसके पास कोई ठोस सुबूत नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा कि आधुनिकता से प्रभावित नगरीय क्षेत्र के उच्च व मध्यम वर्ग में किसी भी सभ्यता व संस्कार की बजाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को वरीयता दी जाती है। यह प्रकरण भी मध्यमवर्गीय परिवेश का ही प्रतिनिधित्व करता है। कोर्ट ने कहा कि महिला के पिता ने उसे उच्च शिक्षा तो दिलाई, लेकिन पारिवारिक मूल्यों और संयुक्त परिवार के भाव को नहीं समझा सके। महिला के पिता का परिवार भी इसी स्थिति में रहा होगा। उच्च शिक्षा के बावजूद पारिवारिक मूल्यों के प्रति सम्मान का अभाव वैसा ही है, जैसे समुद्र में अथाह जल हो, लेकिन पीने योग्य न हो। भोजन दिखने में आकर्षक हो, लेकिन उसमें कोई स्वाद न हो।