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Bareilly News: फुटबॉल की पुरानी पहचान खो रहा बरेली कॉलेज
Sat, 06 Jun 2026 03:00 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sat, 06 Jun 2026 03:00 AM IST
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बरेली। बरेली कॉलेज जो कभी फुटबॉल का प्रमुख केंद्र था, अब इस खेल से दूर हो गया है। एक समय था जब यहां से राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी और रेफरी निकलते थे। आज कॉलेज में न तो खेल का माहौल बचा है और न ही नए खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं।
पूर्व खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों का मानना है कि कॉलेज में फुटबॉल की स्थिति लगभग समाप्त हो गई है। शाम तीन बजे के बाद कॉलेज का मैदान आसपास के युवाओं से गुलजार रहता था। कालीबाड़ी, सिटी, सुभाषनगर और स्टेशन जैसे क्षेत्रों से लोग फुटबॉल खेलने और देखने आते थे। मनोज कुमार शर्मा, जो 1994 में संतोष ट्रॉफी में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, ने इस पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिले में फुटबॉल के प्रति प्रेम कम होने का एक कारण कॉलेज का खेलों से दूरी बनाना है। मनोज ने बताया कि तब खिलाड़ियों को निशुल्क प्रवेश और मैदान मिलता था। गर्मियों की छुट्टी में जिला फुटबॉल लीग भी यहीं होती थी। उनका मानना है कि यदि फिर से खेलों के लिए माहौल बनाया जाए तो खिलाड़ी निश्चित रूप से निकलेंगे।
कॉलेज के लिए टीमें जुटाना भी मुश्किल
बरेली कॉलेज के पूर्व कर्मचारी और फुटबॉल प्रशिक्षक कमलेश पांडेय ने भी कॉलेज में खेल के माहौल को नाम मात्र बताया। उन्होंने बताया कि करीब तीन साल पहले तक भी कॉलेज की टीमें नॉर्थ जोन में जाती थीं। मुश्ताक अली जैसे बड़े नाम भी बरेली कॉलेज से ही निकले हैं। सुभाषनगर और आसपास के बच्चे यहां खेलने आते थे। हालांकि, अब कॉलेज के लिए टीमें जुटाना भी मुश्किल हो गया है, केवल क्रिकेट के खिलाड़ी मिल रहे हैं। कमलेश पांडेय ने अपनी नौकरी के दौरान राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में रेफरी की भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि कॉलेज को अपनी पुरानी खेल पहचान वापस लानी चाहिए। इससे न केवल कॉलेज बल्कि पूरे जिले में फुटबॉल के प्रति रुचि फिर से जागृत होगी।
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पूर्व खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों का मानना है कि कॉलेज में फुटबॉल की स्थिति लगभग समाप्त हो गई है। शाम तीन बजे के बाद कॉलेज का मैदान आसपास के युवाओं से गुलजार रहता था। कालीबाड़ी, सिटी, सुभाषनगर और स्टेशन जैसे क्षेत्रों से लोग फुटबॉल खेलने और देखने आते थे। मनोज कुमार शर्मा, जो 1994 में संतोष ट्रॉफी में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, ने इस पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिले में फुटबॉल के प्रति प्रेम कम होने का एक कारण कॉलेज का खेलों से दूरी बनाना है। मनोज ने बताया कि तब खिलाड़ियों को निशुल्क प्रवेश और मैदान मिलता था। गर्मियों की छुट्टी में जिला फुटबॉल लीग भी यहीं होती थी। उनका मानना है कि यदि फिर से खेलों के लिए माहौल बनाया जाए तो खिलाड़ी निश्चित रूप से निकलेंगे।
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कॉलेज के लिए टीमें जुटाना भी मुश्किल
बरेली कॉलेज के पूर्व कर्मचारी और फुटबॉल प्रशिक्षक कमलेश पांडेय ने भी कॉलेज में खेल के माहौल को नाम मात्र बताया। उन्होंने बताया कि करीब तीन साल पहले तक भी कॉलेज की टीमें नॉर्थ जोन में जाती थीं। मुश्ताक अली जैसे बड़े नाम भी बरेली कॉलेज से ही निकले हैं। सुभाषनगर और आसपास के बच्चे यहां खेलने आते थे। हालांकि, अब कॉलेज के लिए टीमें जुटाना भी मुश्किल हो गया है, केवल क्रिकेट के खिलाड़ी मिल रहे हैं। कमलेश पांडेय ने अपनी नौकरी के दौरान राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में रेफरी की भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि कॉलेज को अपनी पुरानी खेल पहचान वापस लानी चाहिए। इससे न केवल कॉलेज बल्कि पूरे जिले में फुटबॉल के प्रति रुचि फिर से जागृत होगी।
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