बरेलीः 15 फीसद बढ़ीं कच्चे माल की कीमतें.. अब दवाएं भी होंगी महंगी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अगले महीने से पड़ना शुरू होगा असर, कुछ दवाएं अभी से हुईं महंगी
विज्ञापन
चीन से आयात प्रभावित होने के बाद एपीआई पर शुरू हुई मुनाफाखोरी
बरेली। चीन के साथ चल रही तनातनी की वजह से देश में दवाओं का कच्चा माल महंगा होना शुरू हो गया है। दवा कारोबारी इसके बाद आम दवाओं के साथ गंभीर रोगों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं की कीमत आने वाले महीनों में 15 से 20 फीसदी तक बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि चीन पर निर्भरता खत्म कर अगर जल्द ही देश में ही दवाओं के लिए कच्चे माल का उत्पादन शुरू न किया गया तो आने वाले समय में यह संकट और भी बड़ा हो सकता है।
दवा कारोबारियों के मुताबिक दवाओं की कीमतों पर फैसला लेने वाली संस्था नेशनल फर्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एनपीपीएल ने कुछ दिनों पहले ही दिसंबर तक हेपेरिन नाम की दवा के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। हार्ट अटैक या स्ट्रोक के मरीजों को दी जाने वाली यह पहली दवा है जिसकी कीमत देश में चल रही कोरोना आपदा के बीच बढ़ी है। कोविड के इलाज के प्रोटोकॉल के अनुसार गंभीर मरीजों को इसका इंजेक्शन देना पड़ता है। इस दवा की कीमत बढ़ने का कारण चीन से आने वाले कच्चे माल में रुकावट को बताया गया है। इसी तरह हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के एपीआई की कीमत भी बढ़ गई है। पैरासिटामॉल का एपीआई जो 250 रुपये का था, वह अब 350 रुपये किलो मिल रहा है। दरअसल दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भारत में चीन से ही आयात होता था। पहले तो कोरोना संकट की वजह से कच्चा माल के आयात पर असर पड़ा और अब सीमा विवाद के कारण एपीआई की सप्लाई में कमी आई है। मांग की तुलना में आपूर्ति कम होने की वजह से कच्चे माल के दाम ऊपर जाने लगे हैं और इसका असर दवा की खुदरा कीमतों पर भी पड़ रहा है।
विज्ञापन
70 फीसदी दवाओं के लिए भारत में चीन से आता है एपीआई
हर दवा में दो घटक होते हैं, एक एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट यानी एपीआई और दूसरा एक्साइपिएंट। एपीआई का काम बीमारी को खत्म करना होता है जबकि एक्साइपिएंट एपीआई में मौजूद तत्व को शरीर के भीतर ले जाने का काम करता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार फॉर्म्यूलेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थ को एपीआई कहते हैं। जानकारों के मुताबिक चीन में बड़े पैमाने पर एपीआई का उत्पादन करता है और उसने इसकी कीमत भी काफी कम रखी है। इसी वजह से चीन से एपीआई मंगाना सस्ता पड़ता है। वैसे तो भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी फार्मा इंडस्ट्री है लेकिन सिर्फ तैयार दवाओं की। दवाओं के कच्चे माल के लिए भारत पूरी तरह चीन पर निर्भर है और इसी कारण कच्चे माल के आयात पर असर पड़ने के बाद दवाओं की कीमत प्रभावित होनी शुरू हो गई हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मुश्किल दौर में आयातकों ने एपीआई पर मुनाफाखोरी शुरू कर बढ़ाए दाम
जानकारों के मुताबिक पिछले दिनों कोरोना की वजह से दवाओं के कच्चे माल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई थी। चीन से दवाओं के लिए एपीआई आयात करने वाले बड़े आयातक गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली में हैं। बताया जा रहा है कि आपदा के दौरान मुनाफा कमाने के लिए आयातकों पहले से मंगाए गए कच्चे माल पर भी जमाखोरी शुरू कर दी। इस बीच दवा निर्माता कंपनियाें के बंद रहने से मार्केट में स्टॉक में मौजूद दवाएं भी खप गईं। अनलॉक होने के बाद दवाओं का उत्पादन शुरू हुआ तो कच्चे माल की समस्या आने लगी। अब प्रमुख आयातक पहले से स्टॉक किए गए कच्चे माल को ही 15 से 20 फीसदी ज्यादा कीमत पर कंपनियों को बेच रहे हैं। लाजमी है कि महंगा कच्चा माल लेने वाली कंपनियां भी अब दवाओं की कीमत बढ़ाएंगी।
ये दवाएं हो सकती हैं महंगी
पैरॉसिटामाल, एंटीबॉयोटिक, डायबिटीज, ह्रदय रोग, कैंसर और थॉयराइड की दवा
सरकार को बरेली के आसपास फार्मा एपीआई मैन्युफैक्चरिंग के लिए हब बनाना चाहिए। इससे बरेली के लोगों को रोजगार मिलेगा और दवाओं के लिए एपीआई की उपलब्धतता भी बढ़ेगी। देश आत्मनिर्भर भी बनेगा। - रंजीत जौहरी, संगठन मंत्री बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन
दवाओं की फिलहाल कोई कमी नहीं है। दवा की कीमतें बढ़ने में अभी देर है, इस बीच केंद्र सरकार कुछ न कुछ इंतजाम जरूर कर लेगी। अगर चीन से कच्चा माल न मिलने से दवाएं महंगी भी होती हैं तब भी हम उसकी उपलब्धता जरूर रखेंगे। - सतीश सेठ, सचिव बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन
केंद्र सरकार से केमिस्ट एसोसिएशन की मांग है कि आयातकों के बिल चेक किए जाएं। सब कुछ सही मिलने पर ही उन्हें दवाओं के एपीआई को बेचने की अनुमति दी जाए। महंगा है तो महंगा और सस्ता है तो सस्ता। - दुर्गेश खटवानी, महानगर अध्यक्ष बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन
चीन से आयात प्रभावित होने के बाद एपीआई पर शुरू हुई मुनाफाखोरी बरेली। चीन के साथ चल रही तनातनी की वजह से देश में दवाओं का कच्चा माल महंगा होना शुरू हो गया है। दवा कारोबारी इसके बाद आम दवाओं के साथ गंभीर रोगों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं की कीमत आने वाले महीनों में 15 से 20 फीसदी तक बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि चीन पर निर्भरता खत्म कर अगर जल्द ही देश में ही दवाओं के लिए कच्चे माल का उत्पादन शुरू न किया गया तो आने वाले समय में यह संकट और भी बड़ा हो सकता है।
दवा कारोबारियों के मुताबिक दवाओं की कीमतों पर फैसला लेने वाली संस्था नेशनल फर्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एनपीपीएल ने कुछ दिनों पहले ही दिसंबर तक हेपेरिन नाम की दवा के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। हार्ट अटैक या स्ट्रोक के मरीजों को दी जाने वाली यह पहली दवा है जिसकी कीमत देश में चल रही कोरोना आपदा के बीच बढ़ी है। कोविड के इलाज के प्रोटोकॉल के अनुसार गंभीर मरीजों को इसका इंजेक्शन देना पड़ता है। इस दवा की कीमत बढ़ने का कारण चीन से आने वाले कच्चे माल में रुकावट को बताया गया है। इसी तरह हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के एपीआई की कीमत भी बढ़ गई है। पैरासिटामॉल का एपीआई जो 250 रुपये का था, वह अब 350 रुपये किलो मिल रहा है। दरअसल दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भारत में चीन से ही आयात होता था। पहले तो कोरोना संकट की वजह से कच्चा माल के आयात पर असर पड़ा और अब सीमा विवाद के कारण एपीआई की सप्लाई में कमी आई है। मांग की तुलना में आपूर्ति कम होने की वजह से कच्चे माल के दाम ऊपर जाने लगे हैं और इसका असर दवा की खुदरा कीमतों पर भी पड़ रहा है।
70 फीसदी दवाओं के लिए भारत में चीन से आता है एपीआई
हर दवा में दो घटक होते हैं, एक एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट यानी एपीआई और दूसरा एक्साइपिएंट। एपीआई का काम बीमारी को खत्म करना होता है जबकि एक्साइपिएंट एपीआई में मौजूद तत्व को शरीर के भीतर ले जाने का काम करता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार फॉर्म्यूलेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थ को एपीआई कहते हैं। जानकारों के मुताबिक चीन में बड़े पैमाने पर एपीआई का उत्पादन करता है और उसने इसकी कीमत भी काफी कम रखी है। इसी वजह से चीन से एपीआई मंगाना सस्ता पड़ता है। वैसे तो भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी फार्मा इंडस्ट्री है लेकिन सिर्फ तैयार दवाओं की। दवाओं के कच्चे माल के लिए भारत पूरी तरह चीन पर निर्भर है और इसी कारण कच्चे माल के आयात पर असर पड़ने के बाद दवाओं की कीमत प्रभावित होनी शुरू हो गई हैं।मुश्किल दौर में आयातकों ने एपीआई पर मुनाफाखोरी शुरू कर बढ़ाए दाम
जानकारों के मुताबिक पिछले दिनों कोरोना की वजह से दवाओं के कच्चे माल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई थी। चीन से दवाओं के लिए एपीआई आयात करने वाले बड़े आयातक गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली में हैं। बताया जा रहा है कि आपदा के दौरान मुनाफा कमाने के लिए आयातकों पहले से मंगाए गए कच्चे माल पर भी जमाखोरी शुरू कर दी। इस बीच दवा निर्माता कंपनियाें के बंद रहने से मार्केट में स्टॉक में मौजूद दवाएं भी खप गईं। अनलॉक होने के बाद दवाओं का उत्पादन शुरू हुआ तो कच्चे माल की समस्या आने लगी। अब प्रमुख आयातक पहले से स्टॉक किए गए कच्चे माल को ही 15 से 20 फीसदी ज्यादा कीमत पर कंपनियों को बेच रहे हैं। लाजमी है कि महंगा कच्चा माल लेने वाली कंपनियां भी अब दवाओं की कीमत बढ़ाएंगी।ये दवाएं हो सकती हैं महंगी
पैरॉसिटामाल, एंटीबॉयोटिक, डायबिटीज, ह्रदय रोग, कैंसर और थॉयराइड की दवासरकार को बरेली के आसपास फार्मा एपीआई मैन्युफैक्चरिंग के लिए हब बनाना चाहिए। इससे बरेली के लोगों को रोजगार मिलेगा और दवाओं के लिए एपीआई की उपलब्धतता भी बढ़ेगी। देश आत्मनिर्भर भी बनेगा। - रंजीत जौहरी, संगठन मंत्री बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन
दवाओं की फिलहाल कोई कमी नहीं है। दवा की कीमतें बढ़ने में अभी देर है, इस बीच केंद्र सरकार कुछ न कुछ इंतजाम जरूर कर लेगी। अगर चीन से कच्चा माल न मिलने से दवाएं महंगी भी होती हैं तब भी हम उसकी उपलब्धता जरूर रखेंगे। - सतीश सेठ, सचिव बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन
केंद्र सरकार से केमिस्ट एसोसिएशन की मांग है कि आयातकों के बिल चेक किए जाएं। सब कुछ सही मिलने पर ही उन्हें दवाओं के एपीआई को बेचने की अनुमति दी जाए। महंगा है तो महंगा और सस्ता है तो सस्ता। - दुर्गेश खटवानी, महानगर अध्यक्ष बरेली मंडल केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन