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कार सेवा में कुर्सी ‘छिनवाई’.. रामलला ने अगली बार और तगड़ी जीत दिलाई
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जिन नेताओं ने गिरफ्तारी देने को कहा, उन्हीं ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर छिनवा दी थी कुर्सी
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राजकुमार अग्रवाल
तत्कालीन मेयर
बरेली। पहली बार शहर का मेयर बनने का इतिहास बनाने वाले राजकुमार अग्रवाल रामजन्मभूमि आंदोलन में हिस्सा लेते हुए एक अजब राजनीति का शिकार हो गए थे। शहर के उस दौर के दो प्रभावशाली नेताओं के कहने पर उन्होंने प्रोटोकाल तोड़कर गिरफ्तारी दी थी लेकिन इन्हीं नेताओं ने उनके जेल जाने के बाद नगर निगम में अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें मेयर पद से हटवा दिया था। पूर्व मेयर कहते हैं कि यह रामलला की ही कृपा थी कि दोबारा चुनाव हुआ तो उन्हें और तगड़ी जीत हासिल हुई और वह दोबारा मेयर की कुर्सी पर काबिज हो गए।
अयोध्या प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अमर उजाला से पूर्व मेयर की बातचीत हुई तो उन्होंने सबसे पहले यही वाकया साझा किया। बोले, सियासत में एक-दूसरे की टांग खिंचाई करने और टंगड़ी मारने का सिलसिला चलता रहता है, यह तो वह जानते थे लेकिन रामजन्मभूमि आंदोलन में उनके साथ जो हुआ उसे आज तक नहीं भूल पाए। उन्होंने बताया कि वह रामजन्म भूमि आंदोलन में काफी सक्रिय रहे थे। पहले तो संघ के कुछ नेताओं ने उन्हें इस आंदोलन पीछे करने की कोशिश की और इसमें सफल नहीं हुए तो उन पर गिरफ्तारी देने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रोटोकाल के खिलाफ कारसेवकोें का नेतृत्व करते हुए गिरफ्तारी दे दी। पटेल चौक पर गिरफ्तारी देते हुए उनके साथ 14 सभासदों समेत 58 लोग थे।
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शहर के पहले मेयर ने बताया कि गिरफ्तारी के दो दिन बाद ही इन्हीं नेताओं ने नगर निगम में उनके खिलाफ अविश्वास लाने की भूमिका बना दी। पार्टी के कुछ और लोग भी पीछे से भूमिका निभा रहे थे। उनका मेयर पद छिन गया। कुछ दिनों बाद नेतृत्व को इस साजिश का पता लगा तो उन्हें फिर प्रत्याशी बनाया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का इसमें खास सहयोग रहा। इस चुनाव में उन्हें काफी ज्यादा मतों से जीत मिली। राजकुमार अग्रवाल कहते हैं कि यह रामजी की कृपा है कि वह आज ऐतिहासिक फैसले के साक्षी भी बने हैं लेकिन रामजन्म भूमि आंदोलन की आड़ में राजनीति करने वाले ये नेता अब भाजपा की मुख्य धारा से अलग हो चुके हैं।
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