{"_id":"5d4888ef8ebc3e6cae4efd48","slug":"artical-370-bareilly-news-bly3713253172","type":"story","status":"publish","title_hn":"घरों में आग लगाकर कहते थे.. बहन-बेटियां यहीं छोड़ दो और कश्मीर से भाग जाओ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घरों में आग लगाकर कहते थे.. बहन-बेटियां यहीं छोड़ दो और कश्मीर से भाग जाओ
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बरेली। कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होते ही कश्मीरी पंडितों के 30 साल पुराने जख्म फिर ताजा हो गए। जहन में वे यादें कुलबुलाने लगीं जब हर दिन किसी कश्मीरी पंडित का घर जला देने या फिर उनकी बहन-बेटियों के साथ बलात्कार की खबरें मिलती थीं। दहशत का माहौल चरम सीमा पर था, वे हर दिन उम्मीद करते थे कि केंद्र सरकार उन्हें इस माहौल से मुक्ति दिलाने के लिए कोई कदम उठाएगी और वे बेघर होने से बच जाएंगे लेकिन काफी इंतजार के बाद भी ऐसा नहीं हुआ। तमाम लोगों को रातोंरात घर छोड़ देना पड़ा। करीब 30-35 साल बाद अब उन्हें अपने जख्मों पर मरहम लगने जैसा एहसास हुआ है।
आधी रात को अपना घर छोड़कर चले आए थे बरेली
अब रामवाटिका में रह रहे डॉ. दर्पण कुंजरू का घर श्रीनगर में था। अस्सी के दशक के आखिर में कश्मीर में माहौल बिगड़ना शुरू हुआ और कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए पोस्टर दीवार पर लगने शुरू हो गए। कश्मीरी पंडितों के साथ सेना और पाकिस्तानी विस्थापितों को भी मारा जा रहा था। महिलाओं के साथ बेरहमी से रेप हो रहे थे। हालात बिगड़ते ही गए तो 1990 में उनके पिता चंद्रमोहन कुंजरू ने अपने परिवार को बचाने के लिए कश्मीर छोड़ देने का फैसला लिया। डॉ. दर्पण कुंजरू बताते हैं कि उनका पूरा परिवार आधी रात को अपना घर छोड़कर बरेली चला आया था। उनके पिता परिवहन निगम में नौकरी करते थे। हालात देखकर उन्होंने ट्रांसफर लेना ही बेहतर समझा। घर छोड़ने के कुछ ही दिन बाद सूचना मिली कि उनका घर लूट लिया गया है। डॉ. कुंजरू कहते हैं कि उस दौरान अगर केंद्र सरकार अगर कश्मीर में 10 हजार जवान भी तैनात कर देती तो शायद वह और उनकी तरह हजारों कश्मीरी पंडित बेघर नहीं होते।
घर पर चिपकाते थे पोस्टर- भाग जाओ या बहन-बेटियों से रेप को तैयार रहो
महानगर में रहने वाले आईवीआरआई के टेक्नीशियन एसके काव का भी घर श्रीनगर में था। श्रीनगर में ही 164 बीघा खेतिहर जमीन भी थी। कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए जब अराजकता भरी मुहिम शुरू हुई, उस दौरान वह श्रीनगर के आईवीआरआई स्टेशन पर कार्यरत थे। काफी समय डर के माहौल में रहने के बाद कश्मीर में हालात जब बेकाबू हो गए तो उन्होंने बरेली आईवीआरई में ट्रांसफर करा लिया। एसके काव बताते हैं कि 1990 में कश्मीर से निकल जाने का फरमान जारी होने से पहले ही कश्मीरी पंडितों के खिलाफ आतंक चरम पर पहुंच गया था। कश्मीरी मुसलमान खंभों और घरों की दीवारों पर धमकी भरे पोस्टर चिपका देते थे। इसमें उनके लिए धमकी होती थी कि अगर उन्होंने घर खाली करके कश्मीर नहीं छोड़ा तो अपने साथ मारकाट और बेटी-बहनों के साथ बलात्कार के लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे। उस दौर में मस्जिदों में भी नमाज के बजाय कश्मीरी पंडितों को बेघर करने की साजिशें रची जाती थीं। उनका पड़ोसी उनकी 11 करोड़ की जमीन को 50 लाख में बेचने को कह रहा था। अब उन्हें उम्मीद है कि वह अपनी जमीन सही कीमत में बेच पाएंगे।
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आज तक यह अफसोस, केंद्र सरकार ने मदद के लिए नहीं बढ़ाया हाथ
आईवीआरआई में प्रिंसिपल साइंटिस्ट उपेंद्र रैना अब कई सालों से सनसिटी विस्तार में रह रहे हैं लेकिन कभी उनका घर कश्मीर के बडगाम जिले के मागाम में था। रैना कहते हैं कि 1984-85 के आसपास कश्मीर में जब उन लोगों के खिलाफ आतंक और वहशीपन की शुरुआत हुई तो काफी समय तक कश्मीरी पंडित यह उम्मीद बांधे रहे कि उस समय की केंद्र सरकार उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगी लेकिन आखिरकार यह उम्मीद टूट गई। उधर राज्य सरकार खुलकर कश्मीरी मुसलमानों का साथ दे रही थी, केंद्र सरकार के खामोश होने से कश्मीर में आतंक बढ़ता जा रहा था। कश्मीरी पंडितों को जब काफी गुहार लगाने के बाद भी मदद नहीं मिली और मारकाट के साथ महिलाओं से बलात्कार के मामले बढ़ते चले गए तो कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह भी श्रीनगर के आईवीआरआई स्टेशन में कार्यरत थे, वहां से उन्होंने बरेली के लिए ट्रांसफर ले लिया। जैसे ही घर छोड़ा कश्मीरी मुसलमानों ने घर में आग लगा दी।
घर पर आकर कहते थे इस्लाम कुबूल करो या घर छोड़कर भाग जाओ
आईवीआरआई में बतौर टेक्निकल ऑफिसर तैनात कुलदीप कुमार भट्ट का कश्मीर में रामचौक से 20 किलोमीटर दूर गोधरवल में घर था। भट्ट बताते हैं कि उस दौर में कश्मीरी मुसलमान मस्जिदों और चौराहों पर बैठकें कर हर दिन नया फरमान सुनाते थे। कहते थे कि कश्मीर में रहना है तो इस्लाम कुबूल करो या यहां से भाग जाओ। अगर शर्त नहीं मानी तो जो भी तुम्हारे साथ होगा उसके तुम ही जिम्मेदार होगे। ये सिर्फ उनकी चेतावनी नहीं थी, वाकई लोगों की हत्या के साथ औरतों से बलात्कार की घटनाएं चरम पर थीं। कश्मीरी पंडितों के घरों में आग लगा दी जाती थी। उनका अनुमान है कि कश्मीरी पंडितों के करीब 60 फीसद घरों को जला दिया गया और 40 फीसद घर तोड़फोड़ कर खंडहर बना दिए गए। कश्मीरी मुसलमान ‘निजाम-ए-मुस्तफा’ का राज होने की नारेबाजी करते थे। अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद ऐसा लग रहा है कि जैसे देश की आजादी के बाद अब उन्हें दोबारा आजादी मिली है। उम्मीद है कि अब घाटी में तनाव का माहौल खत्म होगा और शांति और विकास की शुरुआत होगी।
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आधी रात को अपना घर छोड़कर चले आए थे बरेली
अब रामवाटिका में रह रहे डॉ. दर्पण कुंजरू का घर श्रीनगर में था। अस्सी के दशक के आखिर में कश्मीर में माहौल बिगड़ना शुरू हुआ और कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए पोस्टर दीवार पर लगने शुरू हो गए। कश्मीरी पंडितों के साथ सेना और पाकिस्तानी विस्थापितों को भी मारा जा रहा था। महिलाओं के साथ बेरहमी से रेप हो रहे थे। हालात बिगड़ते ही गए तो 1990 में उनके पिता चंद्रमोहन कुंजरू ने अपने परिवार को बचाने के लिए कश्मीर छोड़ देने का फैसला लिया। डॉ. दर्पण कुंजरू बताते हैं कि उनका पूरा परिवार आधी रात को अपना घर छोड़कर बरेली चला आया था। उनके पिता परिवहन निगम में नौकरी करते थे। हालात देखकर उन्होंने ट्रांसफर लेना ही बेहतर समझा। घर छोड़ने के कुछ ही दिन बाद सूचना मिली कि उनका घर लूट लिया गया है। डॉ. कुंजरू कहते हैं कि उस दौरान अगर केंद्र सरकार अगर कश्मीर में 10 हजार जवान भी तैनात कर देती तो शायद वह और उनकी तरह हजारों कश्मीरी पंडित बेघर नहीं होते।
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घर पर चिपकाते थे पोस्टर- भाग जाओ या बहन-बेटियों से रेप को तैयार रहो
महानगर में रहने वाले आईवीआरआई के टेक्नीशियन एसके काव का भी घर श्रीनगर में था। श्रीनगर में ही 164 बीघा खेतिहर जमीन भी थी। कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए जब अराजकता भरी मुहिम शुरू हुई, उस दौरान वह श्रीनगर के आईवीआरआई स्टेशन पर कार्यरत थे। काफी समय डर के माहौल में रहने के बाद कश्मीर में हालात जब बेकाबू हो गए तो उन्होंने बरेली आईवीआरई में ट्रांसफर करा लिया। एसके काव बताते हैं कि 1990 में कश्मीर से निकल जाने का फरमान जारी होने से पहले ही कश्मीरी पंडितों के खिलाफ आतंक चरम पर पहुंच गया था। कश्मीरी मुसलमान खंभों और घरों की दीवारों पर धमकी भरे पोस्टर चिपका देते थे। इसमें उनके लिए धमकी होती थी कि अगर उन्होंने घर खाली करके कश्मीर नहीं छोड़ा तो अपने साथ मारकाट और बेटी-बहनों के साथ बलात्कार के लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे। उस दौर में मस्जिदों में भी नमाज के बजाय कश्मीरी पंडितों को बेघर करने की साजिशें रची जाती थीं। उनका पड़ोसी उनकी 11 करोड़ की जमीन को 50 लाख में बेचने को कह रहा था। अब उन्हें उम्मीद है कि वह अपनी जमीन सही कीमत में बेच पाएंगे।
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आज तक यह अफसोस, केंद्र सरकार ने मदद के लिए नहीं बढ़ाया हाथ
आईवीआरआई में प्रिंसिपल साइंटिस्ट उपेंद्र रैना अब कई सालों से सनसिटी विस्तार में रह रहे हैं लेकिन कभी उनका घर कश्मीर के बडगाम जिले के मागाम में था। रैना कहते हैं कि 1984-85 के आसपास कश्मीर में जब उन लोगों के खिलाफ आतंक और वहशीपन की शुरुआत हुई तो काफी समय तक कश्मीरी पंडित यह उम्मीद बांधे रहे कि उस समय की केंद्र सरकार उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगी लेकिन आखिरकार यह उम्मीद टूट गई। उधर राज्य सरकार खुलकर कश्मीरी मुसलमानों का साथ दे रही थी, केंद्र सरकार के खामोश होने से कश्मीर में आतंक बढ़ता जा रहा था। कश्मीरी पंडितों को जब काफी गुहार लगाने के बाद भी मदद नहीं मिली और मारकाट के साथ महिलाओं से बलात्कार के मामले बढ़ते चले गए तो कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह भी श्रीनगर के आईवीआरआई स्टेशन में कार्यरत थे, वहां से उन्होंने बरेली के लिए ट्रांसफर ले लिया। जैसे ही घर छोड़ा कश्मीरी मुसलमानों ने घर में आग लगा दी।
घर पर आकर कहते थे इस्लाम कुबूल करो या घर छोड़कर भाग जाओ
आईवीआरआई में बतौर टेक्निकल ऑफिसर तैनात कुलदीप कुमार भट्ट का कश्मीर में रामचौक से 20 किलोमीटर दूर गोधरवल में घर था। भट्ट बताते हैं कि उस दौर में कश्मीरी मुसलमान मस्जिदों और चौराहों पर बैठकें कर हर दिन नया फरमान सुनाते थे। कहते थे कि कश्मीर में रहना है तो इस्लाम कुबूल करो या यहां से भाग जाओ। अगर शर्त नहीं मानी तो जो भी तुम्हारे साथ होगा उसके तुम ही जिम्मेदार होगे। ये सिर्फ उनकी चेतावनी नहीं थी, वाकई लोगों की हत्या के साथ औरतों से बलात्कार की घटनाएं चरम पर थीं। कश्मीरी पंडितों के घरों में आग लगा दी जाती थी। उनका अनुमान है कि कश्मीरी पंडितों के करीब 60 फीसद घरों को जला दिया गया और 40 फीसद घर तोड़फोड़ कर खंडहर बना दिए गए। कश्मीरी मुसलमान ‘निजाम-ए-मुस्तफा’ का राज होने की नारेबाजी करते थे। अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद ऐसा लग रहा है कि जैसे देश की आजादी के बाद अब उन्हें दोबारा आजादी मिली है। उम्मीद है कि अब घाटी में तनाव का माहौल खत्म होगा और शांति और विकास की शुरुआत होगी।