{"_id":"5a1f21074f1c1bca678beab2","slug":"and-alone-in-hundred","type":"story","status":"publish","title_hn":"और ‘सौ’ में भी अकेले..","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
और ‘सौ’ में भी अकेले..
बरेली।
Updated Thu, 30 Nov 2017 02:35 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा से मेयर प्रत्याशी का टिकट लेकर दमदारी दिखाने वाले धाकड़ प्रत्याशी उमेश गौतम को अनुभवी सपाई दिग्गज डॉक्टर आईएस तोमर से ही नहीं, कई और ताकतों से भी चुानव भर जूझना पड़ा। पहले तो टिकट बंटवारे से खफा दावेदारों ने आधे से अधिक समय आपसी खींचतान और पार्टी की अंदरूनी उखाड़-पछाड़ में बिता दिया, फिर यकायक उनकी ताकत से आतंकित हुए कुछ दिग्गजों ने तगड़ी परीक्षा ली। बाकी कसर टिकट कटने से बागी हुए 28 दावेदारों ने विरोधियों से मिलकर पूरी कर डाली। इन हालात से बेअसर और बेफिक्र भाजपाई सोच वाला एक बड़ा तबका मतदाता सूची की गड़बड़ियों के चलते चाहकर भी भाजपा का साथ नहीं दे सका। हमेशा की तरह मुस्लिम इलाकों में सुबह से ही जमकर मतदान होता दिखाई दिया तो भाजपाई गढ़ों में दोपहर तक सन्नाटा दिखा। जो वोटर अपनी खुद की निष्ठा और पुराने जुड़ाव के चलते घरों से निकले, उन्हें नाकारा सिस्टम की लापरवाही के चलते गड़बड़ाई सूचियों ने मतदान करने ही नहीं दिया। अफसरों के मतदान प्रतिशत बढ़ाने के अभियान वाले दोहरे चरित्र से गुस्साए मतदाताओं ने कहीं सड़क पर लेटकर तो कहीं उग्रता से विरोध जाहिर किया। मगर जनपद में 53 और शहर में 45 फीसदी मतदान ने भाजपा की बढ़त पर सवालिया निशान तो लगा ही दिया है। अपने जुनून और जुझारूपन से शहर की एक बड़ी हस्ती बने उमेश गौतम को इस मेयर चुनाव में खासकर भाजपाई राजनीति का बड़ा सबक मिला होगा। जो जैसा दिखा और बोल रहा था, उसी को सही मानकर चुनाव मैदान में कूदे गौतम को आधी लड़ाई लड़ने तक कड़वी सच्चाई का एहसास तो हुआ ही होगा, मगर बोलते तो मझधार में ही फंस जाते। उधर बात-बात पर विरोध और नाराजगी जता रहा ‘भाजपाई तंत्र’ बुधवार को मतदान के दौरान मतदाताओं को भी ढूंढे नहीं मिल रहा था। भाजपाई वोटर अपनी शिकायतें लिए भटकते दिखे, मगर सूचियों में उनके नाम तक तलाश करवाने वाले कार्यकर्ता नहीं मिले। पार्षद समर्थकों की बदौलत थोड़ी-बहुत सुनवाई हुई, मगर मतदाताओं की शिकायतें हैं कि मेयर प्रत्याशी के ‘रोड शो’ में एकजुटता दिखाने वाले सारे नेता कहां रहे। अधिकतर दिग्गजों-नेताओं की कोशिश अपने परिवार के साथ फोटो खिंचवाने की रही। कुछ एक दिग्गज तो वोट डालने के बाद शहर से बाहर चले गए। संगठन के दिग्गजों, विधायकों की खास सक्रियता भी मतदाताओं को नहीं दिखी। रोड शो में औपचारिकता दिखाने वाली रीति आज मतदान के दौरान भी दिखाई पड़ी। भाजपा प्रत्याशी उमेश गौतम के साथ पूरे चुनाव भर और मतदान के दौरान भी पूर्व मेयर प्रत्याशी गुलशन आनंद और महानगर अध्यक्ष उमेश कठेरिया ही अपने कुछेक समर्थकों के साथ घूमते मिले। वरिष्ठ भाजपाई ‘चाणक्यों’ ने भी जो कुछ पूरे चुनाव और मतदान के दौरान देखा, उसके बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि उमेश ने अपने दम पर पूरा चुनाव लड़ा। यानी पूरी भाजपा उनके अपने निजी ग्रुप तक सिमट गई। वे निर्दल लड़ते तो भी इतनी ही जीदारी से लड़ते। अनुभवी दिग्गजों और संगठन के नेताओं का साथ यदि वास्तव में उमेश गौतम को मिलता तो तस्वीर कुछ और ही होती। पुराने अनुभवी नेताओं का तर्क है कि यदि दिग्गज वाकई साथ देते तो मतदाता सूचियां पहले ही दुरुस्त करा दी गई होतीं। उनकी प्लानिंग से लेकर पर्चियां घर-घर पहुंचाने तक का काम संगठन खुद पुख्ता करता। जबकि तमाम मतदाताओं ने चीखकर बूथ पर कहा कि पर्चियां पड़ोसी को पकड़ा गए और सूची में नाम नहीं मिल रहे। यानी संगठन की बरसों की परंपरा का निर्वाह तक नहीं किया गया। भाजपाई वोटरों को घर-घर जाकर बूथ तक ले जाने वाले कार्यकर्ता या तो सभासदों तक सीमित दिखे या फिर सभासदी किसी को लड़वाते तो मेयर किसी किसी दूसरे वाले को जितवाने की गुजारिश करते नजर आए। डॉक्टरं और उनके समर्थकों के अंदाज भी निराले रहे। एक डॉक्टर नेता बूथ पर वोट डालते तो दिखे मगर समर्थकों की भीड़ बुलाकर वोट पड़वाने के बजाय ‘मुस्कराकर’ हिलते-डुलते ही रहे। टिकट कटने से खफा रहे संघ की पैठ वाले एक डॉक्टर भी दिखावे में जुटे दिखे। संघ से जुड़े कारोबारी दावेदार और गौतम की सेना के ‘नायक’ बताने वाले दावेदार भी चुनाव भर आंख-मिचौली खेलते रहे। संस्थान-कारोबार चलाने वाले दावेदार तो नजर ही नहीं आए। सीएम योगी आदित्यनाथ की अपील कितनी असरदार रही, यह तो ‘रोड शो’ में ही दिखाई दे गया था, मतदान के दौरान सबकुछ पूरे शहर के मतदाताओं ने खुली आंखों से देखा और भोगा भी।
विज्ञापन