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आम आदमी का तीन माह बड़े बच्चे का एडमिशन नहीं, खास का कितना भी चलेगा

Tue, 12 Dec 2017 11:31 PM IST
Updated Tue, 12 Dec 2017 11:31 PM IST
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Admission of a common man to a three month old child, no matter how special
बरेली। - फोटो : बरेली।
 
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 केस- 1
पुराना शहर के रहने वाले कन्हैया लाल ने अपने पोते और नातिन का नर्सरी क्लास में एडमिशन कराने के लिए शहर के एक नामी स्कूल में ऑनलाइन आवेदन किया था। दोनों बच्चों की उम्र तीन साल से सिर्फ तीन महीने ज्यादा है। जब वह फार्म जमा करने पहुंचे तो स्कूल प्रबंधन ने इन बच्चों के एडमिशन फार्म यह कहते हुए जमा नहीं किया कि बच्चों की उम्र तीन साल से ज्यादा है, लिहाजा उनके एडमिशन नहीं हो सकते। उनका कहना है कि जबकि  कुछ प्रभावी लोगों के बच्चों के फार्म उम्र ज्यादा होने के बावजूद जमा कर लिए गए।

केस- 2
पुराना शहर के ही महेंद्र ने भी अपने पोते का नर्सरी में एडमिशन के लिए शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में आनलाइन आवेदन किया था। उनकी बहू फार्म की हार्ड कॉपी जमा करने जब स्कूल पहुंची तो उनका फार्म वापस लौटा दिया गया। बच्चे की उम्र तीन साल में कुछ ज्याद बैठ रही थी। यही बहाना बनाकर उनका फार्म लौटा दिया गया। उन्होंने काफी मिन्नतें की पर उनका फार्म जमा नहीं किया।
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कान्वेंट स्कूलों में बच्चों का एडमिशन कराना आम आदमी के लिए वैसे ही बड़ी समस्या है। इस बात तो इन स्कूलों में आम बच्चों के लिए उम्र की बंदिशें भी लगा दी गई हैं। अगर बच्चे की उम्र तीन साल से दो या तीन माह ज्यादा है तो समझो कान्वेंट स्कूलों को उसे रिजेक्ट करने का बहाना मिल गया। मगर ये बंदिशें रसूखदार लोगों के बच्चों के लिए नहीं हैं। दरअसल उम्र की बंदिशें ही खास लोगों के बच्चों को एडमिशन देने के लिए लगाई जा रही हैं। स्कूलों में इस बहाने सीटों को इसलिए खाली रखा जाता है ताकि तगड़ी सिफारिश वालों के लिए एडमिशन ओपन रखे जा सकें। इन दिनों कान्वेंट स्कूलों में नर्सरी प्रवेश की मारामारी शुरू हो गई है। मध्यम वर्ग के माता पिता स्कूल दर स्कूल बच्चे के प्रवेश के लिए भटकने को मजबूर हैं। उम्र का बहाना बनाकर उनको मायूसी ही मिलती है। कुछ तो मजबूरन कागजों पर बच्चों की उम्र तक कम कराने को मजबूर हो रहे हैं।
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हर साल होता है यह खेल 
कान्वेंट स्कूलों में उम्र का खेल कोई नया नहीं हैै। यह मुद्दा हर साल उठता है और काफी जोर भी पकड़ता है। दरअसल इन आम आदमी का हक मारकर सीटें खाली रखी जाती हैं। इनमें कुछ सीटें अधिकारियों के लिए रखी जाती हैं तो कुछ राजनेताओं के लिए। इनके कहने पर आप कभी भी और किसी भी स्कूल में प्रवेश चुटकियों में करा सकते हैं। कुछ स्कूल तो ऐसे हैं जो अपने यहां से निमंत्रण तक भेजते हैं कि अगर एडमिशन कराना हो तो याद करना। एडमिशन में प्राथमिकता भी बड़े लोगों के बच्चों को मिलती हैं। उसके बाद जो सीटें बचती हैं उनपर आम लोगों के बच्चों को प्रवेश मिलता हैं। उनमें भी यह उम्र की खांचा फिट करते हैं।

कैसे निर्धारित करते हैं उम्र  
स्कूलों में शैक्षिक सत्र से उम्र निर्धारित की जाती है। यानी 31 मार्च या एक अप्रैल को बच्चे की उम्र कितनी है, यह देखकर ही उनके प्रवेश किए जाते हैं। पिछले साल मिनी बाईपास स्थित एक बड़े स्कूल में तो एक अभिभावक ने ढाई साल की उम्र में ही बच्चे का प्रवेश नर्सरी में करा दिया था। मानसिक रूप से उतना विकसित न होने के कारण बच्चा ठीक से नहीं पढ़ पा रहा था। शिक्षक ने उसे प्रताड़ित करना शुरू किया तो बच्चा मानसिक तनाव में आने लगा। बाद में अभिभावक संघ के हस्तक्षेप के बाद मामला निपटा।

 बर्थ सर्टिफिकेट में उम्र बदलवा रहे अभिभावक
जन्मतिथि बदलवाने के लिए अब अभिभावक माथापच्ची करने लगे हैं। एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मजबूरी में उन्हें बर्थ सर्टिफिकेट में जन्मतिथि बदलवानी पड़ रही है। वकील से एफिडेविट बनवाया है। उनके बच्चे की उम्र तीन साल से चार माह ज्यादा हो रही है। पिछले साल उम्र कम होने से नर्सरी में प्रवेश नहीं मिल पाया था। इस बार उम्र ज्यादा बताकर प्रवेश लेने से मना कर दिया।

मासूमों को देना पड़ रहा इंटरव्यू
स्कूल संचालक भले ही इस बात से इंकार करते हों कि नर्सरी में प्रवेश के लिए बच्चों का इंटरव्यू नहीं लिया जाता है पर ऐसा है नहीं। कैंट स्थित एक बड़े स्कूल में ही पिछले साल बिहारीपुर के रहने वाले एक अभिभावक के बच्चे को इसलिए प्रवेश नहीं मिल पाया क्योंकि वह शिक्षकों के सवालों के जवाब नहीं दे पाया। कुछ स्कूल तो अभिभावकों तक का इंटरव्यू लेते हैं। बच्चे के प्रवेश में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए अभिभावक भी उन्हें रोबोट बना रहे हैं। वह चाहते हैं कि बच्चे के भीतर ज्यादा से ज्यादा इनपुट सेव कर दें और जब वह कमांड दें तो बच्चा उसे रिपीट कर दे। 



 
ऐसा नहीं है कि तीन साल के बच्चे को ही नर्सरी में प्रवेश देंगे। कुछ माह ज्यादा वाले बच्चों को भी कंसीडर करते हैं। मेरे सामने इस तरह का कोई मामला नहीं आया है।
- पारुश अरोड़ा, अध्यक्ष इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन 

पिछले साल भी तीन साल उम्र की बाध्यता वाले मामले सामने आए थे। इस बार भी कई पैरेंट्स शिकायत कर चुके हैं। उनके बच्चों के एडमिशन फार्म ही  जमा नहीं किए गए। बच्चे की उम्र दो-तीन माह ज्यादा है तो क्या उसे एडमिशन से वंचित कर देंगे।

- अंकुर सक्सेना, प्रदेश अध्यक्ष अभिभावक संघ


तीन साल या इससे कम उम्र के बच्चों को एजूकेशन के नजरिये से स्कूल भेजना और उनसे उसी तरह का कार्य कराना घातक साबित हो सकता है। छोटे बच्चे स्कूल फोबिया और एंग्जाइटी डिसार्डर के भी शिकार हो जाते हैं। छोटे बच्चों की मनोस्थिति बिल्कुल अलग होती है। होम वर्क करना है, नहीं तो पिटाई लगेगी, जैसी बातें बच्चे के मन में डर पैदा करती हैं। अच्चा इनसे बाहर ही नहीं निकल पाता। कई बच्चे तो स्कूल जाने से ही डरने लगते हैं। सरकार नियम भी है कि कम से कम पांच साल की उम्र पर ही बच्चे स्कूल भेजे जाएं। बहुत छोटे बच्चे हैं तो उनको प्ले स्कूल में डालिए। डॉ. आशीष सिंह, मनोचिकित्सक जिला अस्पताल
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