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मुफ्ती आजम को उलेमा ने भी माना अपना पेशवा

Tue, 08 Jan 2013 05:30 AM IST
Bareilly
Bareilly Updated Tue, 08 Jan 2013 05:30 AM IST
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बरेली। मुफ्ती आजम हिन्द अपने वक्त की एक बड़ी अजीम शख्सियत थे। उनको उस वक्त के उलेमा और मशाईख ने अपना पेशवा माना। उनके इल्म अमल को देखते हुए मजहबी उलेमा ने उन्हे मुफ्ती आजम हिन्द माना। वहीं उन्हें मुततकी-ए आजम हिन्द भी कहा गया।
हुजूर मुफ्ती-ए आलम हिन्द का नाम हजरत मुस्तफा रजा खां नूरी था। उन्होंने दीने इस्लाम की खिदमात बिल्कुल उसी रूप में की, जिस तरह उनके वालिद-ए गिरामी शेखुल इस्लाम आला हजरत इमाम अहमद रजा खां कादरी ने की थी। मुफ्ती आजम ने दर्से गांव में भी तदरीसी खिदमात अंजाम दी। इसके अलावा हिन्द के तमाम गोशों और विदेशों में जाकर बड़ी-बड़ी मजहबी कांफ्रेंसों में शिरकत की। वहां कुरानों हदीस का पैगाम लोगों तक पहुंचाया। इन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शरियते मुस्तफा के मुताबिक गुजारी। उनके मजहबे इस्लाम में महान शख्सियत होने के कारण खुद आला हजरत ने उन पर फक्र किया।
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उनके अलावा सदरुसशरिया मुफ्ती बुरहानउल हक जबलपुरी, मुफ्ती नईमउद्दीन मुरादाबादी जैसे वक्त के अजीम रहनुमाओं ने भी मुफ्ती आजम हिन्द के इल्म-वो-फजल के तारियो तौसीफ बयान किए। मुफ्ती आजम हिन्द की अजमते शान इस बात से भी मालूम होती है कि महरहरा के नूरी मियां ने आपकी विलादत (पैदाइश) की बिशारत इमाम अहमद रजा कादरी को दी और कहा था कि यह बच्चा अपने वक्त में इल्मो फन का आफताब बनकर पूरे आलम को अपनी रौशन किरनों से मुनव्वर करेगा।
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खुलासा यह है कि मुफ्ती आजम हिन्द ने अपनी पूरी जिंदगी मजहब और मिल्लत के तहफ्फुज-वो बका के लिए वक्फ कर दी थी। जब तक जिंदा रहे मजहबे इस्लाम का पैगाम लोगों के दरमियान पहुंचाते रहे। वक्त पड़ा तो मुफ्ती आजम हिन्द ने शरियत का पैगाम सुनाने में हुकूमत-ए वक्त का भी ख्याल नहीं किया बल्कि हक्कानियत पर आधारित पैगाम पूरे जमाने को सुनाया।

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हिला दी थी हुकुमत
मुफ्ती आजम हिन्द की मुजाहिदाना और इस्लामी जुर्रत मन्दाना शख्सियत इतिहास के इस सच्चे अध्याय से बखूबी मालूम होती है।
बात इंदिरा गांधी के वक्त की है जब वह प्रधानमंत्री थीं। उनके वक्त में नसबंदी कार्यक्रम चलाया गया। उस वक्त नाम निहाल कई उलेमाओं ने हुकूमत के खौफ से नसबंदी को जायज करार दे दिया था। तब मामला मुफ्ती आजम के सामने पेश किया गया। बताते हैं कि मजीद हुकूमत-ए वक्त ने मुफ्ती आजम से मुकम्मल दबदबे के साथ इसके जवाब के लिए कहा था। तो उन्होंने हुकूमत को जवाब दिया था। फतवा नहीं बदला करता, बल्कि हुकूमत बदल जाती है। इसके नतीजे में हुकूमत का तख्त बदल गया था।

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फोटो
खूब बिक रहे हैं कम्बल
बरेली। इस बार पड़ रही ठंड को देखते हुए उर्स के मेले में कंबलों का पूरा बाजार सज गया है। खासकर राजकीय इंटर कालेज मैदान पर दर्जनों दुकानें लगी हुई हैं। इसमें बिलारी, रामपुर, बाराबंकी आदि के दुकानदारों ने स्टाल लगाए हैं।

शाकिर हुसैन ने बताया कि यह माल वह पंजाब से लाए हैं। यह आमतौर पर सिंथेटिक कंबल है। कुछ हैंडलूम के भी कंबल मौजूद हैं। सिंथेटिक की डिमांड ज्यादा है। यहां पर 150 से लेकर 500 रुपये तक रेट के कम्बल हैं।
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