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75 साल पुरानी स्थिति में पर्यावरण सिर्फ एक महीने के लॉकडाउन में
Thu, 23 Apr 2020 02:06 AM IST
बरेली ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
Published by: बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 23 Apr 2020 02:06 AM IST
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बंद हुई इंसानी शरारत तो फिर जवां हुईं कुदरत, पर्यावरणविदों का अनुमान
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लॉकडाउन के दस दिन पूरे होने तक स्विटजरलैंड जैसी हो जाएगी कई देशों की आबोहवा
बरेली। यह आइना दिखाने वाली स्थिति है कि प्रकृति और पर्यावरण के हालात सुधरे तो हैं लेकिन कोशिशों से नहीं बल्कि मजबूरी में। कुदरत ने खुद ही इंसानों की शरारतों पर रोक लगाकर उन्हीं के लिए खुद को फिर निखारा है। लॉकडाउन शुरू होने से बाद अब तक पर्यावरण में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, उसे देखते हुए पर्यावरणविदों का दावा है कि अगले 10 दिन बाद जब लॉकडाउन खत्म होगा, तब तक कई शहरों की आबोहवा स्विटजरलैंड जैसी साफ और शुद्ध हो चुकी होगी।
लॉकडाउन में कारखानों और ट्रैफिक की वजह से पैदा होने वाले प्रदूषण के साथ आम लोगों की जिंदगी की रफ्तार घटी तो प्रकृति को खुद ब खुद फिर संवरने का मौका मिल गया। पर्यावरण के जानकार दावा कर रहे हैं कि महीने भर में ही प्रदेश का पर्यावरण कई यूरोपीय देशों की तरह साफ और शुद्ध हो गया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर डालें तो कई शहरों के आंकड़े साफ बता रहे हैं कि लॉकडाउन से पहले वहां प्रदूषण की वजह दमघोंटू हालात थे लेकिन 24 मार्च से 20 अप्रैल के बीच इन शहरों के हालात हर रोज बेहतर के साथ और बेहतर होते जा रहे हैं। यहां तक कि पर्यावरणविद यह तक दावा करने लगे हैं कि अगले 10 दिन तक लॉकडाउन में कई शहरों की हवा स्विट्जरलैंड का मुकाबला करने लगेगी।
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1.30 प्रतिशत बढ़ गई गंगा में ऑक्सीजन
केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक नदी के पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा का मानक 6.00 प्रति लीटर है। ऋषिकेश में लॉकडाउन से पहले 24 मार्च और लॉकडाउन के दौरान 18 अप्रैल को जो सैंपल लिए गए, उनमें बड़ा अंतर सामने आया है। पहले गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा 5.20 प्रति लीटर थी, जो अब बढ़कर 6.50 प्रति लीटर हो गई है।
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ऑक्सीजन बढ़ी यानी.. रसायन विज्ञान के प्रवक्ता राजीव कुमार सिंह ने बताया कि पानी साफ होने से गंगा में जल प्राणियों की संख्या में इजाफा होगा। गंगा में पानी को शुद्ध करने वाली महासीर, गोल्डन मछलियों की संख्या भी बढ़ेगी। पानी सिंचाई के लिए उपयुक्त होगा। स्नान करने वाले त्वचा रोगों से बचेंगे।
ओजोन लेयर ने भी कर लिया खुद को मजबूत
दुनिया के तमाम देशों में औद्योगिक गतिविधियां बंद होने से ओजोन परत में बहुत तेजी से सुधार आया है। एक शोध के मुताबिक ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली रासायनिक गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी होने से ऐसा संभव हुआ है। इसका असर अंटार्कटिका के ऊपर वायुमंडल में भी हुआ है और वायुमंडल में बनने वाला भंवर भी सही जगह पर आने लगा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बदलाव के बाद वर्षा चक्र में भी अच्छा परिवर्तन होने की उम्मीद है।
ओजोन लेयर यानी..
वायुमंडल की पहली परत क्षोभमंडल के ठीक ऊपर पाई जाने वाली ओजोन की होती है जो पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकती है। ये पराबैंगनी किरणें इंसानों की आंखों और त्वचा को बड़ा नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी वजह से कैंसर तक हो सकता है।
दूसरे विश्वयुद्ध के समय था
इतना स्वच्छ पर्यावरण
एक रिपोर्ट के मुताबिक सात-आठ दशक बाद पृथ्वी का वातावरण इतना साफ नजर आ रहा है। पर्यावरणविद डॉ. आलोक खरे के मुताबिक 75 साल पहले जब आबोहवा इतनी साफ हुई थी, तब भी दूसरे विश्वयुद्ध को उसका कारण माना गया था। लॉकडाउन की वजह से अब फिर इतने वक्त बाद धरती के हवा-पानी में इतनी शुद्धता देखने को मिली है।
जो सरकारें नहीं कर पाईं लॉकडाउन ने कर दिया
बरेली कॉलेज में बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक खरे कहते हैं कि कोरोना महामारी को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन से प्रकृति को अभूतपूर्व फायदा हुआ है। हवा और पानी को शुद्ध करने के लिए सरकारें सैकड़ों करोड़ का बजट खर्च करने के बावजूद जो काम तमाम सालों में नहीं कर पाईं, वह इस लॉकडाउन ने कर दिखाया है।
सपने जैसा बदलाव है गंगा में एक फीसदी ऑक्सीजन बढ़ना
रसायन विज्ञान के प्रवक्ता राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि उद्योगों के बंद होने से नदियों में प्रदूषण काफी घटा है। सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में शुमार गंगा और यमुना का पानी भी स्वच्छ हुआ है। ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगाजल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा एक प्रतिशत से ज्यादा बढ़ना स्वप्न सरीखा है। सरकारें यह काम शायद कभी नहीं कर पातीं।
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लॉकडाउन के दस दिन पूरे होने तक स्विटजरलैंड जैसी हो जाएगी कई देशों की आबोहवा बरेली। यह आइना दिखाने वाली स्थिति है कि प्रकृति और पर्यावरण के हालात सुधरे तो हैं लेकिन कोशिशों से नहीं बल्कि मजबूरी में। कुदरत ने खुद ही इंसानों की शरारतों पर रोक लगाकर उन्हीं के लिए खुद को फिर निखारा है। लॉकडाउन शुरू होने से बाद अब तक पर्यावरण में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, उसे देखते हुए पर्यावरणविदों का दावा है कि अगले 10 दिन बाद जब लॉकडाउन खत्म होगा, तब तक कई शहरों की आबोहवा स्विटजरलैंड जैसी साफ और शुद्ध हो चुकी होगी।
लॉकडाउन में कारखानों और ट्रैफिक की वजह से पैदा होने वाले प्रदूषण के साथ आम लोगों की जिंदगी की रफ्तार घटी तो प्रकृति को खुद ब खुद फिर संवरने का मौका मिल गया। पर्यावरण के जानकार दावा कर रहे हैं कि महीने भर में ही प्रदेश का पर्यावरण कई यूरोपीय देशों की तरह साफ और शुद्ध हो गया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर डालें तो कई शहरों के आंकड़े साफ बता रहे हैं कि लॉकडाउन से पहले वहां प्रदूषण की वजह दमघोंटू हालात थे लेकिन 24 मार्च से 20 अप्रैल के बीच इन शहरों के हालात हर रोज बेहतर के साथ और बेहतर होते जा रहे हैं। यहां तक कि पर्यावरणविद यह तक दावा करने लगे हैं कि अगले 10 दिन तक लॉकडाउन में कई शहरों की हवा स्विट्जरलैंड का मुकाबला करने लगेगी।
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1.30 प्रतिशत बढ़ गई गंगा में ऑक्सीजन
केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक नदी के पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा का मानक 6.00 प्रति लीटर है। ऋषिकेश में लॉकडाउन से पहले 24 मार्च और लॉकडाउन के दौरान 18 अप्रैल को जो सैंपल लिए गए, उनमें बड़ा अंतर सामने आया है। पहले गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा 5.20 प्रति लीटर थी, जो अब बढ़कर 6.50 प्रति लीटर हो गई है।
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ऑक्सीजन बढ़ी यानी.. रसायन विज्ञान के प्रवक्ता राजीव कुमार सिंह ने बताया कि पानी साफ होने से गंगा में जल प्राणियों की संख्या में इजाफा होगा। गंगा में पानी को शुद्ध करने वाली महासीर, गोल्डन मछलियों की संख्या भी बढ़ेगी। पानी सिंचाई के लिए उपयुक्त होगा। स्नान करने वाले त्वचा रोगों से बचेंगे।
ओजोन लेयर ने भी कर लिया खुद को मजबूत
दुनिया के तमाम देशों में औद्योगिक गतिविधियां बंद होने से ओजोन परत में बहुत तेजी से सुधार आया है। एक शोध के मुताबिक ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली रासायनिक गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी होने से ऐसा संभव हुआ है। इसका असर अंटार्कटिका के ऊपर वायुमंडल में भी हुआ है और वायुमंडल में बनने वाला भंवर भी सही जगह पर आने लगा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बदलाव के बाद वर्षा चक्र में भी अच्छा परिवर्तन होने की उम्मीद है।ओजोन लेयर यानी..
वायुमंडल की पहली परत क्षोभमंडल के ठीक ऊपर पाई जाने वाली ओजोन की होती है जो पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकती है। ये पराबैंगनी किरणें इंसानों की आंखों और त्वचा को बड़ा नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी वजह से कैंसर तक हो सकता है।दूसरे विश्वयुद्ध के समय था