{"_id":"5c97e4d8bdec22140b209bea","slug":"51553458392-bareilly-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"टुल्ला: सपा-बसपा गठबंधन ने बदले समीकरण, भाजपा के सामने","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
टुल्ला: सपा-बसपा गठबंधन ने बदले समीकरण, भाजपा के सामने
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बरेली। बरेली संसदीय क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार संतोष गंगवार के तीन लाख से ज्यादा सजातीय मतदाता हैं। इसके अलावा एक लाख ब्राह्मण, सवा लाख वैश्य, ,एक लाख लोध, एक लाख कायस्थ और डेढ़ लाख मौर्य मतदाता उन्हें वोट बैंक के लिहाज से अच्छा-खासा संपन्न बनाते हैं। संतोष इसके दम पर सात बार सांसद चुने जा चुके हैं, हालांकि 2009 के चुनाव में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने उन्हें हराकर राजनीति के विश्लेषकों को चकित कर दिया था। माना जाता है कि तब सपा से लड़े भगवत सरन गंगवार ने कुर्मी वोटों का बंटवारा कर भाजपा का बंटाधार करा दिया था। भाजपा के लिए इस बार भी सावधानी का क्षेत्र यही होगा कि उसके वोटबैंक का किसी हालत में बंटवारा न हो पाए।
वर्ष 2009 से पहले पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबिदा अहमद कांग्रेस के टिकट पर 1984 में चुनाव जीती थीं। इस बार फिर संतोष गंगवार के सामने कांग्रेस से प्रवीण सिंह ऐरन एक बार फिर ताल ठोंक रहे हैं। 2009 में ऐरन ने वैश्यों के अलावा भाजपा के दूसरे वोटबैंक में भी अच्छी-खासी सेंध लगाई थी। सपा-बसपा गठबंधन से अभी प्रत्याशी नहीं आया है। गठबंधन का प्रत्याशी उतरने के बाद ही यह तय होगा कि बरेली सीट पर चुनाव के क्या समीकरण बनेंगे। इस बार के चुनाव में खास बात यह होगी कि सपा और बसपा से अलग-अलग प्रत्याशी नहीं होगा। बरेली लोकसभा सीट पर मुस्लिम, कुर्मी, वैश्य, दलित, लोध, ब्राह्मण, मौर्य, कश्यप, लोध और कायस्थ मतदाता निर्णायक संख्या में हैं। मुस्लिम, दलित के अलावा अन्य छुटपुट जातियों के मतदाता जिस तरफ झुकेंगे। चुनाव में उसका पलड़ा भारी रहेगा। भाजपा प्रत्याशी की मजबूती यह है कि बरेली लोकसभा सीटों में आने वाली सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा काबिज है। शहर सीट से डा. अरुण कुमार, कैँट से राजेश अग्रवाल, भोजीपुरा से बहोरनलाल मौर्य, मीरगंज से डॉ. डीसी वर्मा और नवाबगंज से केसर सिंह गंगवार भाजपा के विधायक हैं। मगर, लोकसभा और विधानसभा सीटों पर जीत के समीकरण हर बार अलग होते हैं। इसलिए भाजपा को इस बार कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी से कड़ा मुकाबला करना होगा।
छह बार वैश्य, सात बार कुर्मी और
तीन बार मुस्लिम प्रत्याशी जीते
बरेली सीट पर 17 चुनाव हुए। इनमें छह बार वैश्य, सात बार कुर्मी और तीन बार मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत चुका है। एक बार ठाकुर प्रत्याशी के रूप में बृजराज सिंह उर्फ आछू बाबू जीते थे। पहला चुनाव सन 1951 में हुआ था। कांग्रेस के सतीशचंद्रा बरेली के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। 1957 में भी जीते। 1962 में हुए चुनाव में जनसंघ के बृजराज सिंह ने उन्हें हराया। 1967 में बीजेएस से बीबी लाल ने जीत हासिल की थी। मगर, 1971 में सतीशचंद्राने एक बार फिर जीत हासिल कर इस सीट पर कांग्रेस का परचम फहरा दिया। सन 1977 में बीएलडी से राममूर्ति, वर्ष 1980 में जेएनपीएस से मिसिर यार खां लोकसभा सदस्य चुने गए। मगर, सन 1981 के उपचुनाव और 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बेगम आबिदा अहमद ने कब्जा जमाया। उसके बाद 1989 में भाजपा के संतोष गंगवार ने यह सीट कांग्रेस से छीनी और फिर लगातार छह बार जीतते रहे।
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मोदी मैजिक के बगैर आंवला में भाजपा की राह आसान नहीं
आंवला लोकसभा सीट
बरेली। आंवला सीट पर कांग्रेस सन् 1984 के बाद कभी नहीं जीत पाई। हालात यह हो गए कि कांग्रेस ज्यादातर चुनावों में मुख्य संघर्ष में शामिल होने तक को तरसती रह गई, लेकिन इस बार तीन दफा यहां से सांसद रहे सर्वराज सिंह के कांग्रेस टिकट पर मैदान में उतरने से 35 सालों बाद एक बार फिर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन गए हैं। बहुत ज्यादा मजबूत समीकरण पक्ष में न होने के बावजूद पिछले दो चुनावों में भाजपा इस सीट पर कब्जा करने में कामयाब रही है। मगर इस बार भाजपा की तीसरी जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि यहां 2014 की तरह मोदी का जादू कितना चलेगा और यहां सपा-बसपा गठबंधन और सर्वराज सिंह के वोट बैंक में पार्टी किस हद तक सेंध लगा पाएगी।
आंवला संसदीय क्षेत्र में सर्वाधिक वोटर क्षत्रिय, मुस्लिम और दलित हैं, जिनकी संख्या ढाई-ढाई लाख से ऊपर है। एक लाख के करीब यादव मतदाता भी हैं। मुस्लिम, दलितों के अलावा यादवों पर भी गठबंधन की उम्मीदें टिकी हुईं है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी सर्वराज सिंह चुनाव मैदान में इस बार क्षत्रिय समाज की अकेले नुमाइंदगी कर रहे हैं। गठबंधन की प्रत्याशी रुचिवीरा चूंकि वैश्य हैं, इसलिए उनकी नजर इस संसदीय क्षेत्र के करीब0 70 हजार वैश्य वोटों पर भी हो सकती है। भाजपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप के सजातीय वोट करीब 90 हजार हैं। भाजपा का वोट बैंक माने जाने वाले मौर्य मतदाता भी 70 हजार से ज्यादा हैं। पिछले चुनाव में उनकी जीत का आधार मोदी लहर बनी थी। इस बार भी भाजपा को यहां मोदी लहर में दूसरे दलों के समीकरण ध्वस्त होने की उम्मीद हो सकती है, लेकिन चुनाव का नतीजा ही बता पाएगा कि भाजपा की उम्मीदें यहां कितनी पूरी हो पाईं।
सिर्फ तीन बार चुनाव जीती कांग्रेस, बसपा कभी नहीं
आजादी के बाद आंवला सीट पर पहला चुनाव 1962 में हुआ था, जिसमें हिंदू महासभा ने विजय हासिल की थी। इसके बाद 1967 और 1971 का चुनाव कांग्रेस ने जीता। 1977 में भारतीय लोकदल और 1980 में जनता पार्टी ने इस सीट पर कब्जा किया। 1984 में एक बार फिर भारी अंतर से कांग्रेस जीती, लेकिन इसके बाद उसका सफाया हो गया। यह सीट भाजपा के सर्वाधिक कब्जे में रही। 2009 में यहां से मेनका गांधी और 2014 में धर्मेंद्र कश्यप जीते। इस बार कांग्रेस से मैदान में उतरे सर्वराज सिंह यहां से तीन बार सांसद रहे हैं। बसपा यहां से कभी चुनाव नहीं जीती, लेकिन इस बार गठबंधन में यह सीट बसपा को ही मिली है।
भाजपा की मजबूती, विधानसभा की सभी सीटों पर पार्टी केविधायक
आंवला संसदीय क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें बदायूं जिले के दातागंज, शेखूपुर और बरेली के आंवला, बिथरी चैनपुर और फरीदपुर शामिल हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा की मजबूती यह है कि ये पांचों विधानसभा सीटें उसी के विधायकों के कब्जे में हैं। आंवला से धर्मपाल सिंह, बिथरी चैनपुर से राजेश मिश्रा पप्पू भरतौल, फरीदपुर से प्रो. श्याम बिहारी लाल, शेखूपुर से धर्मेंद्र शाक्य और दातागंज से राजीव कुमार सिंह भाजपा के विधायक हैं।
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वर्ष 2009 से पहले पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबिदा अहमद कांग्रेस के टिकट पर 1984 में चुनाव जीती थीं। इस बार फिर संतोष गंगवार के सामने कांग्रेस से प्रवीण सिंह ऐरन एक बार फिर ताल ठोंक रहे हैं। 2009 में ऐरन ने वैश्यों के अलावा भाजपा के दूसरे वोटबैंक में भी अच्छी-खासी सेंध लगाई थी। सपा-बसपा गठबंधन से अभी प्रत्याशी नहीं आया है। गठबंधन का प्रत्याशी उतरने के बाद ही यह तय होगा कि बरेली सीट पर चुनाव के क्या समीकरण बनेंगे। इस बार के चुनाव में खास बात यह होगी कि सपा और बसपा से अलग-अलग प्रत्याशी नहीं होगा। बरेली लोकसभा सीट पर मुस्लिम, कुर्मी, वैश्य, दलित, लोध, ब्राह्मण, मौर्य, कश्यप, लोध और कायस्थ मतदाता निर्णायक संख्या में हैं। मुस्लिम, दलित के अलावा अन्य छुटपुट जातियों के मतदाता जिस तरफ झुकेंगे। चुनाव में उसका पलड़ा भारी रहेगा। भाजपा प्रत्याशी की मजबूती यह है कि बरेली लोकसभा सीटों में आने वाली सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा काबिज है। शहर सीट से डा. अरुण कुमार, कैँट से राजेश अग्रवाल, भोजीपुरा से बहोरनलाल मौर्य, मीरगंज से डॉ. डीसी वर्मा और नवाबगंज से केसर सिंह गंगवार भाजपा के विधायक हैं। मगर, लोकसभा और विधानसभा सीटों पर जीत के समीकरण हर बार अलग होते हैं। इसलिए भाजपा को इस बार कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी से कड़ा मुकाबला करना होगा।
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छह बार वैश्य, सात बार कुर्मी और
तीन बार मुस्लिम प्रत्याशी जीते
बरेली सीट पर 17 चुनाव हुए। इनमें छह बार वैश्य, सात बार कुर्मी और तीन बार मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत चुका है। एक बार ठाकुर प्रत्याशी के रूप में बृजराज सिंह उर्फ आछू बाबू जीते थे। पहला चुनाव सन 1951 में हुआ था। कांग्रेस के सतीशचंद्रा बरेली के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। 1957 में भी जीते। 1962 में हुए चुनाव में जनसंघ के बृजराज सिंह ने उन्हें हराया। 1967 में बीजेएस से बीबी लाल ने जीत हासिल की थी। मगर, 1971 में सतीशचंद्राने एक बार फिर जीत हासिल कर इस सीट पर कांग्रेस का परचम फहरा दिया। सन 1977 में बीएलडी से राममूर्ति, वर्ष 1980 में जेएनपीएस से मिसिर यार खां लोकसभा सदस्य चुने गए। मगर, सन 1981 के उपचुनाव और 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बेगम आबिदा अहमद ने कब्जा जमाया। उसके बाद 1989 में भाजपा के संतोष गंगवार ने यह सीट कांग्रेस से छीनी और फिर लगातार छह बार जीतते रहे।
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मोदी मैजिक के बगैर आंवला में भाजपा की राह आसान नहीं
आंवला लोकसभा सीट
बरेली। आंवला सीट पर कांग्रेस सन् 1984 के बाद कभी नहीं जीत पाई। हालात यह हो गए कि कांग्रेस ज्यादातर चुनावों में मुख्य संघर्ष में शामिल होने तक को तरसती रह गई, लेकिन इस बार तीन दफा यहां से सांसद रहे सर्वराज सिंह के कांग्रेस टिकट पर मैदान में उतरने से 35 सालों बाद एक बार फिर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन गए हैं। बहुत ज्यादा मजबूत समीकरण पक्ष में न होने के बावजूद पिछले दो चुनावों में भाजपा इस सीट पर कब्जा करने में कामयाब रही है। मगर इस बार भाजपा की तीसरी जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि यहां 2014 की तरह मोदी का जादू कितना चलेगा और यहां सपा-बसपा गठबंधन और सर्वराज सिंह के वोट बैंक में पार्टी किस हद तक सेंध लगा पाएगी।
आंवला संसदीय क्षेत्र में सर्वाधिक वोटर क्षत्रिय, मुस्लिम और दलित हैं, जिनकी संख्या ढाई-ढाई लाख से ऊपर है। एक लाख के करीब यादव मतदाता भी हैं। मुस्लिम, दलितों के अलावा यादवों पर भी गठबंधन की उम्मीदें टिकी हुईं है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी सर्वराज सिंह चुनाव मैदान में इस बार क्षत्रिय समाज की अकेले नुमाइंदगी कर रहे हैं। गठबंधन की प्रत्याशी रुचिवीरा चूंकि वैश्य हैं, इसलिए उनकी नजर इस संसदीय क्षेत्र के करीब0 70 हजार वैश्य वोटों पर भी हो सकती है। भाजपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप के सजातीय वोट करीब 90 हजार हैं। भाजपा का वोट बैंक माने जाने वाले मौर्य मतदाता भी 70 हजार से ज्यादा हैं। पिछले चुनाव में उनकी जीत का आधार मोदी लहर बनी थी। इस बार भी भाजपा को यहां मोदी लहर में दूसरे दलों के समीकरण ध्वस्त होने की उम्मीद हो सकती है, लेकिन चुनाव का नतीजा ही बता पाएगा कि भाजपा की उम्मीदें यहां कितनी पूरी हो पाईं।
सिर्फ तीन बार चुनाव जीती कांग्रेस, बसपा कभी नहीं
आजादी के बाद आंवला सीट पर पहला चुनाव 1962 में हुआ था, जिसमें हिंदू महासभा ने विजय हासिल की थी। इसके बाद 1967 और 1971 का चुनाव कांग्रेस ने जीता। 1977 में भारतीय लोकदल और 1980 में जनता पार्टी ने इस सीट पर कब्जा किया। 1984 में एक बार फिर भारी अंतर से कांग्रेस जीती, लेकिन इसके बाद उसका सफाया हो गया। यह सीट भाजपा के सर्वाधिक कब्जे में रही। 2009 में यहां से मेनका गांधी और 2014 में धर्मेंद्र कश्यप जीते। इस बार कांग्रेस से मैदान में उतरे सर्वराज सिंह यहां से तीन बार सांसद रहे हैं। बसपा यहां से कभी चुनाव नहीं जीती, लेकिन इस बार गठबंधन में यह सीट बसपा को ही मिली है।
भाजपा की मजबूती, विधानसभा की सभी सीटों पर पार्टी केविधायक
आंवला संसदीय क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें बदायूं जिले के दातागंज, शेखूपुर और बरेली के आंवला, बिथरी चैनपुर और फरीदपुर शामिल हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा की मजबूती यह है कि ये पांचों विधानसभा सीटें उसी के विधायकों के कब्जे में हैं। आंवला से धर्मपाल सिंह, बिथरी चैनपुर से राजेश मिश्रा पप्पू भरतौल, फरीदपुर से प्रो. श्याम बिहारी लाल, शेखूपुर से धर्मेंद्र शाक्य और दातागंज से राजीव कुमार सिंह भाजपा के विधायक हैं।