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‘श्रीराम विदेश नहीं जाते तो कैसे होता रावण का अंत’
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‘श्रीराम विदेश नहीं जाते तो कैसे होता रावण का अंत’
- फोटो : अमर उजाला, बरेली
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बरेली। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम राज्य त्यागकर वन को नहीं जाते तो उन्हें ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता। संसार के सबसे बड़े आततायी रावण का अंत भी नहीं होता। वनों की यात्रा करने से ही श्रीराम को अनेक चमत्कारी अनुभव प्राप्त हुए। सभी को दुनिया की गति के साथ चलना चाहिए। देश-विदेश घूमना चाहिए। इससे प्राप्त अनुभव समाज, देश और परिवार के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं आशीर्वचनों के साथ मंगलवार को संत मोरारी बापू ने श्रीराम कथा की शुरुआत की।
कत्था फैक्टरी में श्रीराम कथा प्रेमयज्ञ समिति की ओर से चल रही श्रीराम कथा में चौथे दिन काफी संख्या में लोग पहुंचे। संत मोरारी बापू ने बताया कि आम आदमी के क्रोध और लोभ से श्रीराम का क्रोध और लोभ पूरी तरह अलग है। जब आम आदमी क्रोध करता है तो वह विकास की गति को धीमा कर खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचाता है। वहीं, जब भगवान क्रोध करते हैं तो समाज का कल्याण होता है। उन्होंने कहा कि कितनी ही विपरीत परिस्थितियां क्यों न हाें, युवाओं को बगैर ध्यान, साधना किए घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। ध्यान से कई समस्याओं का समाधान आसानी से मिल जाता है।
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कत्था फैक्टरी में श्रीराम कथा प्रेमयज्ञ समिति की ओर से चल रही श्रीराम कथा में चौथे दिन काफी संख्या में लोग पहुंचे। संत मोरारी बापू ने बताया कि आम आदमी के क्रोध और लोभ से श्रीराम का क्रोध और लोभ पूरी तरह अलग है। जब आम आदमी क्रोध करता है तो वह विकास की गति को धीमा कर खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचाता है। वहीं, जब भगवान क्रोध करते हैं तो समाज का कल्याण होता है। उन्होंने कहा कि कितनी ही विपरीत परिस्थितियां क्यों न हाें, युवाओं को बगैर ध्यान, साधना किए घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। ध्यान से कई समस्याओं का समाधान आसानी से मिल जाता है।
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- फोटो : अमर उजाला, बरेली