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‘मुन्ना’ को लगा मौत का इंजेक्शन तो भर आईं किशन की आंखें
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बरेली। रिठौरा निवासी किशन बाबू के जिस घोड़े में ग्लैंडर्स के लक्षण पाए गए उसे किशन ने पांच साल पहले भोजीपुरा निवासी एक व्यक्ति से 16 हजार रुपये में खरीदा था। मजदूरी पेशा किशन ने उसका नाम मुन्ना रखा था। किशन ने उसे एक ईंट भट्ठे पर लगाया था। प्रतिदिन घोड़े से किशन 400 से 500 रुपये कमाते थे। रोजी-रोटी का साधन ‘मुन्ना’ ही था, लिहाजा किशन उसकी खूब सेवा भी करता था। करीब 100 रुपये का दाना रोज खिलाता था। पांच दिन पहले जब उसके ग्लैंडर्स से पीड़ित होने की जानकारी पशु पालन विभाग के एक चिकित्सक ने दी, उसके बाद से उसने उससे काम लेना बंद कर दिया था, लेकिन उसकी खुराक में कोई कमी नहीं की। चिकित्सकों के यह बताए जाने के बाद भी कि घोड़ा (मुन्ना) बचेगा नहीं और उसे अधिक दिन तक जिंदा रखना परिवार के लिए भी नुकसानदेय हो सकता है, के बाद भी किशन मुन्ना को मरने नहीं देना चाहता था।
पशुपालन विभाग के डॉ. रामलखन ने बताया कि किशन को यह भी बताया गया था कि उसे मुआवजे के तौर पर सरकार से 25 हजार रुपये मिलेंगे, जो उसके घोड़े की कीमत से कहीं अधिक हैं। दूसरे घोड़ों और इंसानों में इसके फैलने का खतरा भी कम हो जाएगा, लेकिन किशन, मुन्ना को मारने देने को तैयार नहीं था। अधिकारियों ने जब उसे एक्ट का हवाला देते हुए दबाव बनाया तो वह भाजपा नेताओं से फोन कराकर अधिकारियों पर घोड़े को न मारने का दबाव बनवाने लगा, लेकिन जैसे ही बीमारी की भयावहता का पता लगता नेता निरुत्तर हो जाते। कोई बस न चलने पर किशन ग्लैंडर्स पीड़ित मुन्ना को लेकर बुधवार को भारी मन से बताए गए स्थान पर पहुंच गया।
डॉक्टर जब तक तैयारी करते रहे तब तक किशन, घोड़े के मुंह के पास खड़ा होकर उसका सिर सहलाता रहा। उसे संक्रमित घोड़े से खुद में बीमारी फैलने का खतरा भी नहीं लग रहा था। जैसे ही चिकित्सकों ने घोड़े को मौत का इंजेक्शन लगाने के लिए खोदे गए गड्ढे के पास लेकर चलने को कहा तो किशन लाल ने घोड़े की रस्सी अपने हाथ से छोड़ दी। खुद उसे वहां ले जाने से इंकार कर दिया। तब किशन के पिता घोड़े को गड्ढे के पास तक ले गए। वहां डॉक्टरों ने जैसे ही उसे मौत का इंजेक्शन लगाया वैसे ही किशनलाल की आंखें भर आईं। उसने अपनी नजर भी हटा ली और अपने गांव के एक साथी के साथ वहां से बिना डॉक्टरों को बताए घर चला गया।
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किशन ने बताया कि पांच साल से वह मुन्ना की कमाई से परिवार चलाता रहा। वह उसके लिए एक जानवर नहीं, बल्कि घर के सदस्य जैसा था। पहले उसके खाने का इंतजाम करके बाद में खुद खाना खाता था। यह जानने के बाद भी कि ग्लैंडर्स बीमारी लाइलाज है वह उसका इलाज करवाना चाहता था। उसका कहना था कि मुआवजे की मिली 25 हजार रुपये की रकम से वह दूसरा घोड़ा तो खरीद सकता है, लेकिन मुन्ना ने पांच साल तक जो उसका साथ दिया उसे वह कभी भूल नहीं पाएगा।
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पशुपालन विभाग के डॉ. रामलखन ने बताया कि किशन को यह भी बताया गया था कि उसे मुआवजे के तौर पर सरकार से 25 हजार रुपये मिलेंगे, जो उसके घोड़े की कीमत से कहीं अधिक हैं। दूसरे घोड़ों और इंसानों में इसके फैलने का खतरा भी कम हो जाएगा, लेकिन किशन, मुन्ना को मारने देने को तैयार नहीं था। अधिकारियों ने जब उसे एक्ट का हवाला देते हुए दबाव बनाया तो वह भाजपा नेताओं से फोन कराकर अधिकारियों पर घोड़े को न मारने का दबाव बनवाने लगा, लेकिन जैसे ही बीमारी की भयावहता का पता लगता नेता निरुत्तर हो जाते। कोई बस न चलने पर किशन ग्लैंडर्स पीड़ित मुन्ना को लेकर बुधवार को भारी मन से बताए गए स्थान पर पहुंच गया।
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डॉक्टर जब तक तैयारी करते रहे तब तक किशन, घोड़े के मुंह के पास खड़ा होकर उसका सिर सहलाता रहा। उसे संक्रमित घोड़े से खुद में बीमारी फैलने का खतरा भी नहीं लग रहा था। जैसे ही चिकित्सकों ने घोड़े को मौत का इंजेक्शन लगाने के लिए खोदे गए गड्ढे के पास लेकर चलने को कहा तो किशन लाल ने घोड़े की रस्सी अपने हाथ से छोड़ दी। खुद उसे वहां ले जाने से इंकार कर दिया। तब किशन के पिता घोड़े को गड्ढे के पास तक ले गए। वहां डॉक्टरों ने जैसे ही उसे मौत का इंजेक्शन लगाया वैसे ही किशनलाल की आंखें भर आईं। उसने अपनी नजर भी हटा ली और अपने गांव के एक साथी के साथ वहां से बिना डॉक्टरों को बताए घर चला गया।
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किशन ने बताया कि पांच साल से वह मुन्ना की कमाई से परिवार चलाता रहा। वह उसके लिए एक जानवर नहीं, बल्कि घर के सदस्य जैसा था। पहले उसके खाने का इंतजाम करके बाद में खुद खाना खाता था। यह जानने के बाद भी कि ग्लैंडर्स बीमारी लाइलाज है वह उसका इलाज करवाना चाहता था। उसका कहना था कि मुआवजे की मिली 25 हजार रुपये की रकम से वह दूसरा घोड़ा तो खरीद सकता है, लेकिन मुन्ना ने पांच साल तक जो उसका साथ दिया उसे वह कभी भूल नहीं पाएगा।