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सेना पहले हमें चार गुना सर्किल रेट दिलाए फिर यहां तोप चलाए
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बरेली। सैन्य अभ्यास के लिए आरक्षित जमीन पर तोप-गोले चलाने के एलान पर ग्रामीण आक्रोशित हैं। वे 20 वर्ष बाद एक बार फिर शुरू होने वाले सैन्य अभ्यास के विरोध की तैयारी में हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन पर बिना जांच पड़ताल किए जमीन को सैन्य अभ्यास के लिए देने पर भी नाराजगी जताई है। ग्रामीणों का कहना है कि वे सैन्य अभ्यास के लिए जमीन देने को तैयार हैं लेकिन इसके बदले उन्हें वर्तमान सर्किल रेट से चार गुना अधिक मुआवजा मिलना चाहिए।
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 20 वर्ष पहले रामगंगा के कटरी में फैली जमीन पर सैन्याभ्यास होता था। इससे वहां की अच्छी खासी खेतिहर जमीन बर्बाद हो गई। तोप-गोले चलने से जमीन में गहरे गड्ढे बन गए और कई लोग जख्मी भी हुए। इसके बाद सैन्य अभ्यास बंद कराने के लिए उन्होंने जमीन के दस्तावेज जुटाकर प्रशासन से शिकायत की तो रोक लगा दी गई। फिर उन लोगों ने गहरे गड्ढों में तब्दील हुई जमीन को दोबारा खेती के लायक बनाया। ग्रामीण जगदीश सिंह, रामपाल सिंह, राजीव सिंह का कहना है कि सैन्य अभ्यास के लिए आरक्षित बताई जा रही जमीन बभिया, क्यारा, आंवला, चौबारी, सराथू, फतेहपुर, मोहनी, भगवानपुर, प्रतापपुर गांवों के किसानों की है। उस पर आग के गोले नहीं बरसते, खेती हो रही है। अब इसे उजाड़ना सेना और प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।
प्रशासन ने प्रदेश सरकार को किया गुमराह
ग्रामीणों का आरोप है कि सैन्य अभ्यास के लिए दी गई जमीन के करीब डेढ़ सौ से अधिक भूस्वामी हैं। वर्ष 2011 में प्रशासन ने प्रदेश सरकार को गुमराह कर सैन्य अभ्यास के लिए पांच वर्ष के लिए यह जमीन आरक्षित कर दी। जब सेना अभ्यास करने पहुंची तो उसका विरोध किया गया। वर्ष 2016 तक यही क्रम चलता रहा। आरक्षित जमीन की मियाद खत्म होने के बाद सेना ने फिर से वर्ष 2016 में 2021 तक के लिए जमीन आरक्षित करा ली। यहां अभ्यास के लिए सैन्य अधिकारी मौका मुआयना करने पहुंचते रहते हैं।
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ग्रामीणों के मुताबिक करीब 20 वर्ष पहले रामगंगा के कटरी में फैली जमीन पर सैन्याभ्यास होता था। इससे वहां की अच्छी खासी खेतिहर जमीन बर्बाद हो गई। तोप-गोले चलने से जमीन में गहरे गड्ढे बन गए और कई लोग जख्मी भी हुए। इसके बाद सैन्य अभ्यास बंद कराने के लिए उन्होंने जमीन के दस्तावेज जुटाकर प्रशासन से शिकायत की तो रोक लगा दी गई। फिर उन लोगों ने गहरे गड्ढों में तब्दील हुई जमीन को दोबारा खेती के लायक बनाया। ग्रामीण जगदीश सिंह, रामपाल सिंह, राजीव सिंह का कहना है कि सैन्य अभ्यास के लिए आरक्षित बताई जा रही जमीन बभिया, क्यारा, आंवला, चौबारी, सराथू, फतेहपुर, मोहनी, भगवानपुर, प्रतापपुर गांवों के किसानों की है। उस पर आग के गोले नहीं बरसते, खेती हो रही है। अब इसे उजाड़ना सेना और प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।
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प्रशासन ने प्रदेश सरकार को किया गुमराह
ग्रामीणों का आरोप है कि सैन्य अभ्यास के लिए दी गई जमीन के करीब डेढ़ सौ से अधिक भूस्वामी हैं। वर्ष 2011 में प्रशासन ने प्रदेश सरकार को गुमराह कर सैन्य अभ्यास के लिए पांच वर्ष के लिए यह जमीन आरक्षित कर दी। जब सेना अभ्यास करने पहुंची तो उसका विरोध किया गया। वर्ष 2016 तक यही क्रम चलता रहा। आरक्षित जमीन की मियाद खत्म होने के बाद सेना ने फिर से वर्ष 2016 में 2021 तक के लिए जमीन आरक्षित करा ली। यहां अभ्यास के लिए सैन्य अधिकारी मौका मुआयना करने पहुंचते रहते हैं।
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