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मुस्लिम गढ़ों में हार की टीस भी मुस्लिम थे जिनके सहारे.. वे ‘अपनों’ से ही हारे

Fri, 24 May 2019 02:46 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 24 May 2019 02:46 AM IST
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मुस्लिम गढ़ों में हार की टीस भी मुस्लिम थे जिनके सहारे.. वे ‘अपनों’ से ही हारे
बरेली। जरी-जरदोजी और मांझे के लिए मशहूर बरेली में तीन तलाक और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर गठबंधन का बेस वोट माने जा रहे मुस्लिमों और दलितों की आंख से भाजपा जैसे सुरमा चुराकर ले गई। मुस्लिम दस्तकारों की बहुलता वाला यह जिला वैसे तो भाजपा का पुराना गढ़ है लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर एक बार फिर भाजपा के काबिज होने के कुछ अलग ही मायने हैं। सपा-बसपा गठबंधन को यहां जितनी कामयाबी की उम्मीद थी, उतनी नहीं मिली। मुस्लिम बहुल इलाकों में उम्मीद से कम पोलिंग और वोटों का थोड़ा-बहुत बिखराव तो एक वजह रही ही, इसके साथ बसपा के आधार वोट में भाजपा की सेंधमारी गठबंधन प्रत्याशी की शिकस्त की दूसरी सबसे बड़ी वजह साबित हुई। सबसे बड़ा कमाल मोदी मैजिक ने दिखाया। जो मतदाता भाजपा प्रत्याशी से नाराज थे, उन्होंने मोदी के नाम पर अपनी नाराजगी एक तरफ रख दी। मतगणना के परिणाम आने के बाद मुस्लिम और दलित बहुल इलाकों में अमर उजाला ने सर्वे किया तो यही नतीजा निकलकर सामने आया।
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शहर के जाटवपुरा इलाके में कृष्णा मंदिर के पास इकट्ठे लोगों के बीच भाजपा की जीत और गठबंधन की हार पर चल रही चर्चा में हम शरीक हुए तो काफी कुछ साफ हो गया। अमरनाथ सरन का कहना था कि दलितों ने तमाम सालों तक एकजुट होकर बसपा को वोट दिया लेकिन इस बार बसपा सुप्रीमो उसे सहेजकर अपने पक्ष में रखने में नाकाम रहीं। दलितों में सिर्फ जाटवों ने ही गठबंधन प्रत्याशी को वोट दिया। कृपा शंकर का कहना था कि कुछ दलित स्थानीय भाजपा प्रत्याशी से नाराज थे लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने उन्हें मोदी के राष्ट्रवाद की दुहाई देकर भाजपा के लिए वोट करने के लिए तैयार कर लिया। कमलेश भारती का कहना था कि अधिकांश दलितों ने इस बार भाजपा के पक्ष में मतदान किया है। वैसे जाटव बिरादरी अभी भी बसपा के साथ है लेकिन इस बिरादरी के युवाओं पर भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर अपनी पकड़ बना ली है। इसी कारण इस बार जाटव बिरादरी युवा तबका भी भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया। सुनील कुमार का कहना है कि दलितों में जाटव ही अब बसपा के साथ रह गई है। भाजपा को कुछ दलितों ने इसलिए भी वोट दिया है ताकि उसे काम करने का पूरा मौका मिल सके। बसपा समेत अन्य सभी गैर भाजपाई राजनीतिक दलों को देश में भाजपा के प्रदर्शन को देखते हुए चिंतन करना चाहिए।
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मुस्लिम महिलाओं ने कम की वोटिंग, कुछ ने भाजपा को भी दिया
मुस्लिम बहुल इलाके सैलानी में शाम को रोजा इफ्तार के बजाय टोलियों में इकट्ठे लोगों की जगह-जगह चुनाव पर ही चर्चा चल रही थी। यहां मौजूद छोटे की बातचीत का लब्बोलुआब यह था कि पहले मुस्लिमों को उम्मीद थी कि सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल रहेगी, ऐसा नहीं हुआ तो मुस्लिम मतदाता भ्रममित हो गए। मुस्लिमों ने पहले कांग्रेस को वोट करने का मन बनाया था लेकिन जब यह देखा कि भाजपा को टक्कर गठबंधन प्रत्याशी दे रहा है तो अधिकांश मुस्लिमों ने गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया। मोहम्मद ताहिर ने कहा कि गठबंधन से जहां-जहां बसपा प्रत्याशी खड़े थे वहां तो यादव, दलित और मुस्लिम ने उसके पक्ष में मतदान किया, लेकिन जहां सपा प्रत्याशी खड़ा था वहां मुस्लिमों का ही बड़ा हिस्सा तो उसके पक्ष में इकट्ठा हुआ, दलित मतदाताओं में से सिर्फ जाटव ही हाथ लगा। यहां तो गठबंधन के उम्मीदवार अपनी ही बिरादरी के वोट का कोई खास हिस्सा हासिल नहीं कर पाए। आमिर अली का तर्क था कि मोदी जब राष्ट्र को कोई संदेश देते हैं तो वह काफी प्रभावी ढंग से अपनी बात रखते हैं। विपक्षी दलों में दूसरा कोई ऐसा नेता नहीं है जो अपनी बात से आम जनता पर प्रभाव डाल सके। मसूद का कहना था कि पोलिंग बूथों पर पहुंचने पर मतदाता सूची में कुछ महिलाओं का नाम ही नहीं मिला। धूप भी अधिक थी लिहाजा मुस्लिम महिलाएं कम ही वोट डालने निकलीं। तहसीन रजा खां का कहना था कि गठबंधन प्रत्याशी को जिस बिरादरी का वोट मिलने की उम्मीद थी उस 60 फीसदी सेकुलर वोट भी ‘चौकीदार’ और हिंदू हो गया। गैर भाजपा की सरकारों ने भी मुस्लिमों के लिए कोई खास काम नहीं किए थे लिहाजा तीन तलाक से पीड़ित कुछ महिलाएं व उनके परिवार के लोगों ने भी भाजपा के पक्ष में मतदान किया। यही सब आधार भाजपा प्रत्याशी की जीत का कारण बना।
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