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बरेली की हवा भी कम जहरीली नहीं
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
Updated Thu, 03 May 2018 02:07 AM IST
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ग्लोबल एयर पॉल्यूशन द्वारा जिनेवा जारी वायु प्रदूषण के आंकड़ों में विश्व के सबसे ज्यादा प्रदूषित 15 शहरों की सूची में चौदह भारत के हैं। इसमें चार बड़े शहर उत्तर प्रदेश हैं जहां बढ़ती पार्टीकुलेट मैटर 2.5 (पीएम-2.5) की मात्रा भविष्य के लिए खतरा बन सकती। सूबे के सिर्फ यह चार शहर ही नहीं बल्कि हमारी बरेली की आबोहवा भी तेजी से जहरीली होती जा रही है। पर्यावरणविदों का यहां तक कहना है कि अगर अभी नहीं सुधरे तो शायद खुली हवा में सांस लेना भी मुश्किल हो सकता है। प्रदेश के बाकी शहरों की तरह वायु प्रदूषण का स्तर बरेली में भी बढ़ रहा है। डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी रिपोर्ट में सूबे के शहर कानपुर में पीएम 2.5 की मात्रा 173, बनारस 151,लखनऊ 138 और आगरा 131 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर मिली। अब इन शहरों से बरेली की तुलना करें तो बरेली में पीएम 2.5 की मात्रा पिछले दो माह में औसत 90 दर्ज की गई। बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग में बने पर्यावरण स्टडी सेंटर के प्रभारी डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि अगर पीएम 2.5 की मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है तो कोई चिंता की बात नहीं, लेकिन इसका तेजी से बढ़ना खतरनाक साबित हो सकता है। बरेली में स्टैंडर्ड वैल्यू से इसकी मात्रा 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर ज्यादा है। सिर्फ पीएम 2.5 ही नहीं बल्कि पीएम 10 की मात्रा भी बढ़ी हुई पाई गई। पिछले दो माह में इसकी औसत मात्रा 160 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई। उन्होंने बताया कि सर्दियों के मुकाबले गर्मियों में पीएम 2.5 की मात्रा में कमी आई है। इसका दूसरा कारण शहर में निर्माण कार्य कम होना भी माना जा सकता है।
ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट में भी बरेली की स्थिति थी खतरनाक
ग्रीनपीस इंडिया ने देश के 280 शहरों में प्रदूषण के स्तर पर स्टडी करते हुए जनवरी में एक रिपोर्र्ट जारी की थी। इसमें बरेली में पीएम 10 का औसत स्तर 226 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर आया था। बरेली देश का 13वां सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर था। रिपोर्ट में कहा गया था कि बढ़ते प्रदूषण के स्तर से देश में 65 लाख बच्चे चपेट में आए।
घास लगाएं और प्रदूषण कम करने में करें सहयोग
शहर ही हवा स्वच्छ रखनी है तो पौधों के साथ घास भी लगानी होगी, क्योंकि घास से हवा के प्रदूषण के काफी हद तक कम किया जा सकता है। डॉ. डीके सक्सेना के अन सार 12 गुणा 12 वर्ग फीट के स्पेस में घास लगाते हैं तो इससे दो आक्सीजन सिलिंडर के बराबर आक्सीजन पैदा कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि अगर शाम को घास पर दो घंटे तक ट्रिकलिंग से पानी का छिड़काव किया जाए तो यह घास रात में पीएम 2.5 नीचे बैठा सकती है। उन्होंने अरब और दिल्ली का उदाहरण भी दिया जहां इसी मकसद से घास लगाई गई।
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चौराहों पर जाम बनता प्रदूषण का बड़ा कारण
शहर में हजारों लाखों वाहन दिन भर में गुजरते हैं। कई जगह चौराहों पर जाम लगता है। डॉ. डीके सक्सेना के अनुसार कार एक लीटर पैट्रोल से औसत पंद्रह किलोमीटर तक जा सकती है। कार एक लीटर फ्यूल से 0.06 माइक्रोग्राम पॉल्यूटैंट निकालता है। चौराहों में पर जाम के कारण सफर की औसत दूरी दस किलोमीटर तक आ जाती है। यानी जो पॉल्यूटैंट पंद्रह किलोमीटर में फैलने चाहिए थे वो दस किलोमीटर के दायरे में ही रह जाते हैं। अगर औसत तीन लाख वाहन शहर में इधर से उधर जाते हैं तो अंदाजा लगाइए कि कितना प्रदूषण बढ़ता होगा।
क्या होते हैं पार्टीकुलेट मैटर
पार्टीकुलेट मैटर एक तरह के बारीक कण हैं जो हवा में तैरते रहते हैं। पीएम 2.5 माइक्रोन को होता है। इससे भी छोटे कण हो सके हैं। इसमें धूल, कार्बन, रवड़ व अन्य के कण हो सकते हैं। सबसे खतरनाक कार्बन और रवड़ के कण साबित हो सकते हैं। सांस संबंधी बीमारी से लेकर फेफड़े, रक्तचाप भी प्रभावित हो सकता है।
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ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट में भी बरेली की स्थिति थी खतरनाक
ग्रीनपीस इंडिया ने देश के 280 शहरों में प्रदूषण के स्तर पर स्टडी करते हुए जनवरी में एक रिपोर्र्ट जारी की थी। इसमें बरेली में पीएम 10 का औसत स्तर 226 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर आया था। बरेली देश का 13वां सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर था। रिपोर्ट में कहा गया था कि बढ़ते प्रदूषण के स्तर से देश में 65 लाख बच्चे चपेट में आए।
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घास लगाएं और प्रदूषण कम करने में करें सहयोग
शहर ही हवा स्वच्छ रखनी है तो पौधों के साथ घास भी लगानी होगी, क्योंकि घास से हवा के प्रदूषण के काफी हद तक कम किया जा सकता है। डॉ. डीके सक्सेना के अन सार 12 गुणा 12 वर्ग फीट के स्पेस में घास लगाते हैं तो इससे दो आक्सीजन सिलिंडर के बराबर आक्सीजन पैदा कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि अगर शाम को घास पर दो घंटे तक ट्रिकलिंग से पानी का छिड़काव किया जाए तो यह घास रात में पीएम 2.5 नीचे बैठा सकती है। उन्होंने अरब और दिल्ली का उदाहरण भी दिया जहां इसी मकसद से घास लगाई गई।
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चौराहों पर जाम बनता प्रदूषण का बड़ा कारण
शहर में हजारों लाखों वाहन दिन भर में गुजरते हैं। कई जगह चौराहों पर जाम लगता है। डॉ. डीके सक्सेना के अनुसार कार एक लीटर पैट्रोल से औसत पंद्रह किलोमीटर तक जा सकती है। कार एक लीटर फ्यूल से 0.06 माइक्रोग्राम पॉल्यूटैंट निकालता है। चौराहों में पर जाम के कारण सफर की औसत दूरी दस किलोमीटर तक आ जाती है। यानी जो पॉल्यूटैंट पंद्रह किलोमीटर में फैलने चाहिए थे वो दस किलोमीटर के दायरे में ही रह जाते हैं। अगर औसत तीन लाख वाहन शहर में इधर से उधर जाते हैं तो अंदाजा लगाइए कि कितना प्रदूषण बढ़ता होगा।
क्या होते हैं पार्टीकुलेट मैटर
पार्टीकुलेट मैटर एक तरह के बारीक कण हैं जो हवा में तैरते रहते हैं। पीएम 2.5 माइक्रोन को होता है। इससे भी छोटे कण हो सके हैं। इसमें धूल, कार्बन, रवड़ व अन्य के कण हो सकते हैं। सबसे खतरनाक कार्बन और रवड़ के कण साबित हो सकते हैं। सांस संबंधी बीमारी से लेकर फेफड़े, रक्तचाप भी प्रभावित हो सकता है।