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सियासत की विरासत संभालने को भटक रहे हैं दिग्गजों के उत्तराधिकारी

Fri, 14 Jan 2022 01:03 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 14 Jan 2022 01:03 AM IST
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बाराबंकी। विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। राजनीतिक दल अपने-अपने प्रत्याशियों के चयन को लेकर माथापच्ची में जुटे हैं। किसको टिकट मिलेगा और किसका कटेगा यह तो प्रत्याशियों की सूची आने के बाद ही साफ हो पाएगी किंतु जिले में दिग्गज नेताओं की सियासत की विरासत संभालने के लिए उनके उत्तराधिकारी क्षेत्र से लेकर नेताओं की चौखट तक चक्कर काट रहे हैं। यही नहीं सभी की जुबां पर चुनावी चर्चाओं में सबसे ज्यादा सवाल और जवाब इसी पर होता है कि कौन अपने-अपने पिता की राजनीतिक जमीन को बचाने में सफल होगा।
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कुछ भी हो चुनावी परिदृश्य में इस बार न रहने वाले दिग्गज नेता बेनी प्रसाद वर्मा, सुरेंद्रनाथ अवस्थी पुत्तू भइया, गयासुद्दीन किदवाई और कमला प्रसाद रावत कई दशकों से प्रदेश की राजनीति में अपना अलग मुकाम बना चुुके थे। उनके पुत्र या बहू अब उसे बचाने के लिए विभिन्न दलों से टिकट की लाइन में खड़े दिखाई पड़ रहे हैं।
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जिले की छह विधानसभा सीटों में चार पर बीजेपी और दो पर सपा का कब्जा है। चुनाव की तारीख का एलान हो चुका है। सभी दल तैयारियों में जुटे हैं। कोरोना के संकट में जिताऊ प्रत्याशी की तलाश में इन दिग्गज नेताओं के पुत्र और परिजन सहानुभूति वोटों के साथ क्या अपना राजनीतिक करिअर संवार कर सियासत की विरासत बचाने में सफल हो पाएंगे।
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पूर्व मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने जीवित रहते अपने पुत्र राकेश वर्मा को विधायक और कैबिनेट मंत्री बनवाकर उन्हें स्थापित किया था किंतु राजनीतिक उलटफेर में सपा मुखिया क्या रामनगर विधानसभा क्षेत्र से इन्हें टिकट देंगे, यह सवाल चुनावी चौपालों में हर समय गूंजते रहते हैं। यहीं से उनके खासमखास पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप संकट के दौर में चट्टान की तरह पार्टी के साथ खड़े रहे हैं। दोनों के बीच पार्टी नेतृत्व समझौते का क्या फार्मूला निकालेंगे इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।
इसी तरह सुरेंद्रनाथ अवस्थी पुत्तू भइया 20 साल पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी के साथ चले गए थे। अपनी सीट से इस्तीफा देकर तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के लिए मैदान खाली कर दिया था। पुत्र सिद्धार्थ अवस्थी इनके न रहने पर रामनगर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी से टिकट के लिए दौड़ लगा रहे हैं।
पुत्तू भइया के एक इशारे पर कांग्रेस और भाजपा में टिकट मिलता था लेकिन अब सिद्धार्थ टिकट लेकर चुनाव लड़ने के लिए जोर आजमाइश में जुटे हैं। दो बार सांसद, मंत्री और विधायक रहे कमला प्रसाद रावत के न रहने के बाद उनके पुत्रवधूू जिला पंचायत सदस्य लवली रावत सपा में हैं पर अपने घर की पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

गयासुद्दीन किदवाई के पुत्र फराज किदवाई ने बसपा में अपना राजनीतिक करिअर शुरू किया था लेकिन कुछ दिनों बाद ही उन्होंने सपा का दामन थाम लिया। गयासुद्दीन किदवाई के राजनीतिक धरोहर को क्या वह बचा पाएंगे इसे लेकर अटकलों का दौर बरकरार है। इस तरह अगर चुनावी चर्चाओं पर नजर डालें तो दिग्गजों के पुत्र और बहू उनकी विरासत संभालने में 2022 में कितना सफल होंगे यह देखना दिलचस्प होगा।
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