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Barabanki News: झोलामैन अजीत की प्लास्टिक से जंग, 22 साल में बांटे एक लाख झोले
Fri, 17 Jul 2026 01:58 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 17 Jul 2026 01:58 AM IST
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बाराबंकी। संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाले वीडीओ अजीत प्रताप सिंह ने 22 साल पहले प्लास्टिक मुक्त समाज का जो बीड़ा उठाया, उसे आज भी आत्मसात करके आगे बढ़ रहे हैं। सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ उन्होंने अकेले ही मुहिम छेड़ रखी है। वह अब तक एक लाख से ज्यादा कपड़े के झोले आमोखास को बांट चुके हैं।
वह सभी से एक ही गुजारिश करते हैं कि स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें। झोलामैन के नाम से मशहूर इस शख्स में अभी भी वही जोश और उत्साह है, जो दो दशक पहले पर्यावरण संरक्षण के लिए मुहिम छेड़ते वक्त था।
मूलरूप से रामसनेहीघाट के भेंटुआ ठकुरान गांव में जन्मे व पले बढ़े अजीत का वर्ष 1999 में ग्राम विकास अधिकारी के पद पर चयन हुआ। 2004 में वह उत्तराखंड घूमने गए। वहां प्लास्टिक बैन था। वहीं पर उन्होंने ठान लिया कि सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने के लिए लोगों को जागरूक करेंगे।
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उन्होंने रामसनेहीघाट में कपड़ा दुकानदारों से संपर्क किया। कपड़े की थान में आखिरी में बचे कपड़े को उन्होंने खरीदना और फिर झोला बनवाना शुरू किया। ये सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है। वह प्रतिदिन 10 से 15 झोले वितरित करते हैं। उनके गांव में 50 फीसदी लोगों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर दिया है।
अभी वह बंकी विकासखंड कार्यालय में तैनात हैं। यहां भी उन्होंने टोकाटाकी के साथ झोला वितरण का क्रम जारी रखा है। उन्होंने राम मनोहर लोहिया संस्थान में देहदान भी किया है।
भतीजे की शादी में रुमाल में छपवाया कार्ड
अजीत ने बताया कि वैवाहिक कार्ड में भगवान गणेश की फोटो प्रकाशित होती है। मंत्र भी लिखे होते हैं। आमंत्रण के बाद इन कार्डों को इधर-उधर फेक दिया जाता है। इससे भगवान और मंत्रों का अपमान होता है। कागज भी बर्बाद होता है। नवंबर 2025 में उनके भतीजे की शादी थी। उन्होंने सोशल मीडिया में सर्च कर पुणे की एक प्रिंटिंग प्रेस खोज निकाली।
वहां रुमाल में कार्ड प्रिंट कराया। खास बात ये रही कि इस रुमाल को दो बार धुलने पर प्रिंटिंग सामग्री मिट गई। न भगवान का अपमान हुआ और न कागज की बर्बादी। रुमाल काम आया सो अलग।
परिवार का मिल रहा सहयोग
अजीत की पत्नी शर्मिला सिंह सहायक अध्यापिका हैं। बेटी मास्टर डिग्री करने के बाद दिल्ली में नौकरी कर रही है। बेटा भी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में कोर्स पूरा करके लेखन और निर्देशन में हाथ आजमा रहा है। उनका पूरा परिवार पर्यावरण संरक्षण के प्रति संकल्पित है।
व्याख्यान के लिए आता है बुलावा
अजीत बताते हैं कि प्रमुख विश्वविद्यालयों, एफएम रेडियो, दूरदर्शन सहित कई संस्थानों से उन्हें पर्यावरण संरक्षण पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है। इन्होंने चार देशों की यात्रा की, जिनमें रवांडा में उन्हें बहुत अच्छा लगा। बताया कि आर्थिक रूप से कमजोर इस देश में स्वच्छता पर सबसे ज्यादा फोकस है। ये भी बताया कि पांच साल बाद वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह इस मुहिम को और आगे बढ़ाएंगे।
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वह सभी से एक ही गुजारिश करते हैं कि स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें। झोलामैन के नाम से मशहूर इस शख्स में अभी भी वही जोश और उत्साह है, जो दो दशक पहले पर्यावरण संरक्षण के लिए मुहिम छेड़ते वक्त था।
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मूलरूप से रामसनेहीघाट के भेंटुआ ठकुरान गांव में जन्मे व पले बढ़े अजीत का वर्ष 1999 में ग्राम विकास अधिकारी के पद पर चयन हुआ। 2004 में वह उत्तराखंड घूमने गए। वहां प्लास्टिक बैन था। वहीं पर उन्होंने ठान लिया कि सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने के लिए लोगों को जागरूक करेंगे।
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उन्होंने रामसनेहीघाट में कपड़ा दुकानदारों से संपर्क किया। कपड़े की थान में आखिरी में बचे कपड़े को उन्होंने खरीदना और फिर झोला बनवाना शुरू किया। ये सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है। वह प्रतिदिन 10 से 15 झोले वितरित करते हैं। उनके गांव में 50 फीसदी लोगों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर दिया है।
अभी वह बंकी विकासखंड कार्यालय में तैनात हैं। यहां भी उन्होंने टोकाटाकी के साथ झोला वितरण का क्रम जारी रखा है। उन्होंने राम मनोहर लोहिया संस्थान में देहदान भी किया है।
भतीजे की शादी में रुमाल में छपवाया कार्ड
अजीत ने बताया कि वैवाहिक कार्ड में भगवान गणेश की फोटो प्रकाशित होती है। मंत्र भी लिखे होते हैं। आमंत्रण के बाद इन कार्डों को इधर-उधर फेक दिया जाता है। इससे भगवान और मंत्रों का अपमान होता है। कागज भी बर्बाद होता है। नवंबर 2025 में उनके भतीजे की शादी थी। उन्होंने सोशल मीडिया में सर्च कर पुणे की एक प्रिंटिंग प्रेस खोज निकाली।
वहां रुमाल में कार्ड प्रिंट कराया। खास बात ये रही कि इस रुमाल को दो बार धुलने पर प्रिंटिंग सामग्री मिट गई। न भगवान का अपमान हुआ और न कागज की बर्बादी। रुमाल काम आया सो अलग।
परिवार का मिल रहा सहयोग
अजीत की पत्नी शर्मिला सिंह सहायक अध्यापिका हैं। बेटी मास्टर डिग्री करने के बाद दिल्ली में नौकरी कर रही है। बेटा भी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में कोर्स पूरा करके लेखन और निर्देशन में हाथ आजमा रहा है। उनका पूरा परिवार पर्यावरण संरक्षण के प्रति संकल्पित है।
व्याख्यान के लिए आता है बुलावा
अजीत बताते हैं कि प्रमुख विश्वविद्यालयों, एफएम रेडियो, दूरदर्शन सहित कई संस्थानों से उन्हें पर्यावरण संरक्षण पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है। इन्होंने चार देशों की यात्रा की, जिनमें रवांडा में उन्हें बहुत अच्छा लगा। बताया कि आर्थिक रूप से कमजोर इस देश में स्वच्छता पर सबसे ज्यादा फोकस है। ये भी बताया कि पांच साल बाद वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह इस मुहिम को और आगे बढ़ाएंगे।