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Barabanki News: 20 साल में मैदान सिमटे, स्क्रीन में कैद हुआ बचपन
Tue, 28 Jul 2026 02:16 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Tue, 28 Jul 2026 02:16 AM IST
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जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव
बाराबंकी। पिछले दो दशकों में शहर और गांवों का भूगोल जितनी तेजी से बदला, उतनी ही खामोशी से बच्चों की खिलखिलाहट भी गुम हो गई। 20 साल पहले जहां बच्चे शाम होते ही खेल के मैदानों की ओर भागते थे, वहीं आज खेल मैदान सिमट चुके हैं और उनकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। यह कहना है जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव का।
डॉ. आरती ने बताया कि असल मायनों में मैदान खाली नहीं हुए हैं, बल्कि बच्चों का बचपन ही खाली हो गया है। खुले मैदानों की जगह मोबाइल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहद नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
मैदानों के लगातार सिकुड़ने से बच्चों की शारीरिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। दो दशक पहले जहां शहर और ग्रामीण इलाकों में दर्जनों खुले मैदान हुआ करते थे, वहीं आज वे कंक्रीट की इमारतों, अतिक्रमण और कब्जों की भेंट चढ़ चुके हैं। खेल छूटने का सीधा असर सेहत पर दिख रहा है।
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शारीरिक थकान न होने के कारण नींद न आना और सुस्ती आम बात हो गई है। बच्चे बाहरी दुनिया के खेलों से दूर होकर वर्चुअल गेमिंग में अपने शरीर और ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं। मैदानों का खालीपन अब बच्चों में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन और नशे जैसी खतरनाक आदतों के रूप में सामने आ रहा है।
जब बच्चे मैदान में अपनी ऊर्जा को सकारात्मक रूप से खर्च नहीं कर पाते, तो वे अकेलेपन का शिकार होते हैं। इस अकेलेपन को भरने के लिए वे मोबाइल की ओर भागते हैं, जहां स्क्रीन टाइम चार से छह घंटे तक पहुंच चुका है। मोबाइल एडिक्शन की वजह से बच्चे न सिर्फ वास्तविक दोस्तों से कट रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया के असर में आकर कम उम्र में ही असामाजिक गतिविधियों की ओर आकर्षित होने का खतरा बढ़ रहा है।
डाॅ. आरती के मुताबिक खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक संतुलन की दवा है। जब बच्चा मैदान में खेलता है, तो वह हार-जीत के जरिये जीवन के तनाव को सहना सीखता है। अब जब मैदान ही खत्म हो रहे हैं, तो बच्चे सहनशीलता खो रहे हैं।
मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से दिमाग में डोपामाइन का असंतुलन बन रहा है, जिससे बच्चों में गुस्सा, डिप्रेशन और मोबाइल न मिलने पर हिंसक व्यवहार बढ़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि मैदानों का गायब होना एक सामाजिक आपातकाल जैसा है और अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाकर उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रेरित करना होगा।
20 साल का बदलाव का डराने वाला आंकड़ा
डॉ. आरती के अनुसार, एक रिपोर्ट में आया है कि बच्चों का औसत स्क्रीन टाइम वर्ष 2024 में 30 मिनट था, जो अब बढ़कर चार से पांच घंटे रोजाना हो गया है। बचपन में मोटापे की दर पिछले 20 वर्षों में करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मानसिक तनाव व चिड़चिड़ापन के लक्षण 10 से 16 वर्ष के 40 प्रतिशत से अधिक बच्चों में मिल रहे हैं।
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डॉ. आरती ने बताया कि असल मायनों में मैदान खाली नहीं हुए हैं, बल्कि बच्चों का बचपन ही खाली हो गया है। खुले मैदानों की जगह मोबाइल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहद नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
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मैदानों के लगातार सिकुड़ने से बच्चों की शारीरिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। दो दशक पहले जहां शहर और ग्रामीण इलाकों में दर्जनों खुले मैदान हुआ करते थे, वहीं आज वे कंक्रीट की इमारतों, अतिक्रमण और कब्जों की भेंट चढ़ चुके हैं। खेल छूटने का सीधा असर सेहत पर दिख रहा है।
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शारीरिक थकान न होने के कारण नींद न आना और सुस्ती आम बात हो गई है। बच्चे बाहरी दुनिया के खेलों से दूर होकर वर्चुअल गेमिंग में अपने शरीर और ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं। मैदानों का खालीपन अब बच्चों में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन और नशे जैसी खतरनाक आदतों के रूप में सामने आ रहा है।
जब बच्चे मैदान में अपनी ऊर्जा को सकारात्मक रूप से खर्च नहीं कर पाते, तो वे अकेलेपन का शिकार होते हैं। इस अकेलेपन को भरने के लिए वे मोबाइल की ओर भागते हैं, जहां स्क्रीन टाइम चार से छह घंटे तक पहुंच चुका है। मोबाइल एडिक्शन की वजह से बच्चे न सिर्फ वास्तविक दोस्तों से कट रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया के असर में आकर कम उम्र में ही असामाजिक गतिविधियों की ओर आकर्षित होने का खतरा बढ़ रहा है।
डाॅ. आरती के मुताबिक खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक संतुलन की दवा है। जब बच्चा मैदान में खेलता है, तो वह हार-जीत के जरिये जीवन के तनाव को सहना सीखता है। अब जब मैदान ही खत्म हो रहे हैं, तो बच्चे सहनशीलता खो रहे हैं।
मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से दिमाग में डोपामाइन का असंतुलन बन रहा है, जिससे बच्चों में गुस्सा, डिप्रेशन और मोबाइल न मिलने पर हिंसक व्यवहार बढ़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि मैदानों का गायब होना एक सामाजिक आपातकाल जैसा है और अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाकर उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रेरित करना होगा।
20 साल का बदलाव का डराने वाला आंकड़ा
डॉ. आरती के अनुसार, एक रिपोर्ट में आया है कि बच्चों का औसत स्क्रीन टाइम वर्ष 2024 में 30 मिनट था, जो अब बढ़कर चार से पांच घंटे रोजाना हो गया है। बचपन में मोटापे की दर पिछले 20 वर्षों में करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मानसिक तनाव व चिड़चिड़ापन के लक्षण 10 से 16 वर्ष के 40 प्रतिशत से अधिक बच्चों में मिल रहे हैं।