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Barabanki News: बांसुरी की धुन में खोजा रोजगार, पल रहा परिवार
Mon, 07 Apr 2025 11:40 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Mon, 07 Apr 2025 11:40 PM IST
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कोटवाधाम (बाराबंकी)। भूत भावन भगवान लोधेश्वर महादेव की धरती लोधौरा (महादेवा) की रहने वाली कृष्णावती ने बांसुरी की धुन में रोजगार का अवसर खोजकर अपनी अलग पहचान बनाई है। बांसुरी बेचने से होने वाली आमदनी से ही वह अपने परिवार का भरण पोषण भी कर रही है। वर्तमान में सतनामी संप्रदाय समर्थ स्वामी जगजीवन साहेब की तपोस्थली कोटवाधाम मेला में बांसुरी बेचने में जुटी है।
कृष्णावती के नाम और काम का अजब संयोग लोगों को आकर्षित करता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का नाम सुनते ही उनके हाथों में बांसुरी और कानों में उसकी धुन का अहसास होने लगता है। इससे पहले वह लोधेश्वर महादेवा के फाल्गुनी मेला में खूब बांसुरी बेच चुकी हैं। महादेवा, कोटवाधाम व देवा मेला के साथ ही वह जिले व आसपास के जिलों में आयोजित होने वाले सभी प्रमुख मेलों में बांसुरी बेचने जरूर पहुंचती है। बांसुरी बेचने के लिए वह उसे बजाकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी करती है। ऐसे में बच्चों के साथ ही बड़े-बुजुर्ग व महिलाएं भी कृष्णावती को नजर अंदाज नहीं कर पाती। मेले के दौरान वह सौ से दो सौ बांसुरी तक प्रतिदिन बेच लेती हैं। इससे होने वाली आमदनी से परिवार का खर्च भी अच्छे से चल जाता है। मेला में ज्यादा भीड़ होने पर बिक्री बढ़ भी जाती है। (संवाद)
कृष्णावती ने कोविड आपदा में अवसर तलाशने का काम किया। वह नरकुल से बांसुरी अपने हाथों से बना कर उसे रंगती है। कोविड काल में जब लॉकडाउन हुआ तो मेला व बाजार बंद हो गए। इस दौरान उसने घर मेें बांसुरी बनाने का काम जारी रखा।
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काफी संख्या में बांसुरी बन कर तैयार हो जाने के बाद जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो आयोजित होने वाले मेलों में वह स्वयं परिवार की अन्य महिलाओं को साथ लेकर बनाई गई बांसुरी बेचने के काम में जुट गई। कृष्णावती बताती हैं कि विवाह के बाद दो बच्चों समेत परिवार का खर्च उठाने के लिए श्रीकृष्ण की बांसुरी ही अब उनकी जीविका का साधन बन गई।
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कृष्णावती के नाम और काम का अजब संयोग लोगों को आकर्षित करता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का नाम सुनते ही उनके हाथों में बांसुरी और कानों में उसकी धुन का अहसास होने लगता है। इससे पहले वह लोधेश्वर महादेवा के फाल्गुनी मेला में खूब बांसुरी बेच चुकी हैं। महादेवा, कोटवाधाम व देवा मेला के साथ ही वह जिले व आसपास के जिलों में आयोजित होने वाले सभी प्रमुख मेलों में बांसुरी बेचने जरूर पहुंचती है। बांसुरी बेचने के लिए वह उसे बजाकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी करती है। ऐसे में बच्चों के साथ ही बड़े-बुजुर्ग व महिलाएं भी कृष्णावती को नजर अंदाज नहीं कर पाती। मेले के दौरान वह सौ से दो सौ बांसुरी तक प्रतिदिन बेच लेती हैं। इससे होने वाली आमदनी से परिवार का खर्च भी अच्छे से चल जाता है। मेला में ज्यादा भीड़ होने पर बिक्री बढ़ भी जाती है। (संवाद)
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कृष्णावती ने कोविड आपदा में अवसर तलाशने का काम किया। वह नरकुल से बांसुरी अपने हाथों से बना कर उसे रंगती है। कोविड काल में जब लॉकडाउन हुआ तो मेला व बाजार बंद हो गए। इस दौरान उसने घर मेें बांसुरी बनाने का काम जारी रखा।
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काफी संख्या में बांसुरी बन कर तैयार हो जाने के बाद जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो आयोजित होने वाले मेलों में वह स्वयं परिवार की अन्य महिलाओं को साथ लेकर बनाई गई बांसुरी बेचने के काम में जुट गई। कृष्णावती बताती हैं कि विवाह के बाद दो बच्चों समेत परिवार का खर्च उठाने के लिए श्रीकृष्ण की बांसुरी ही अब उनकी जीविका का साधन बन गई।