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Barabanki News: आस्था बढ़ी तो बाराबंकी में स्थापित कर लीं छोटी हनुमानगढ़ी
Tue, 09 Jan 2024 01:26 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Tue, 09 Jan 2024 01:26 AM IST
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बाराबंकी। रामनगरी अयोध्या के प्रति जिले के लोगों की आस्था इतनी ज्यादा है कि हर मंगलवार व शनिवार को हजारों लोग अयोध्या जाकर हनुमानगढ़ी में दर्शन करते हैं। लेकिन यह आस्था इतनी बढ़ गई कि श्रद्धालुओं ने जिले में ही हनुमानगढ़ी की स्थापना कर ली। कोटवाधाम व भिटरिया में छोटी हनुमानगढ़ी की स्थापना व प्राण प्रतिष्ठा अयोध्या के हनुमानगढ़ी के माध्यम से ही हुई। बुजुर्ग व चलने फिरने में असमर्थ श्रद्धालु मन में अयोध्या की आस्था लिए इसी हनुमानगढ़ी पर आकर महाबली की पूजा-अर्चना करते हैं।
सतनामी पंथ का उद्गम स्थल व संत जगजीवनदास की तपोस्थली कोटवाधाम की छोटी हनुमानगढ़ी मंदिर का संबंध सीधे अयोध्या की हनुमानगढ़ी से है। अनुयायियों के अनुसार समर्थ साईं जगजीवन दास की पांचवीं पीढ़ी के संत जसकरनदास हनुमान जी अनन्य भक्त थे। वह पैदल ही अयोध्या पहुंचे और हनुमानजी को अपने हाथों से लड्डू खिलाने की जिद पर अड़ गए, लेकिन सेवादारों ने उन्हें वापस कर दिया।
बताते हैं कि इस दौरान हनुमानगढ़ी के कपाट अचानक बंद हो गए। तब वहां के तत्कालीन पुजारी रघुनाथदास ने कहा कि किसी संत का अपमान हुआ है, जिसके बाद जसकरन दास को हनुमानगढ़ी लाया गया। उन्होंने हनुमानजी को अपने हाथों से लड्डू खिलाया। जसकरनदास हनुमानजी के मठ की मिट्टी लेकर कोटवाधाम पहुंचे और यहां भी एक हनुमानगढ़ी का निर्माण किया। कोटवाधाम के महंत नीलेन्द्रबख्श दास ने बताया कि संत जसकरनदास की समाधि भी मंदिर के बगल बनाई गई है। कीर्ति सिंधु महाकाव्य में लेखक प्रेमदास ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखा है कि लड्डू कर मुख ओर बढ़ायाहु, खोली पवनसुत तुरतय खायहु।
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इसी प्रकार लखनऊ-अयोध्या हाईवे के भिटरिया चौराहे पर दशकों से एक बरगद के पेड़ के नीचे हनुमानजी की प्रतिमा की पूजा होती थी। वर्ष 2000 के बाद इस स्थान को हनुमानगढ़ी का रूप देने के लिए श्रद्धालु आगे आए। इंद्रप्रताप सिंह बताते हैं कि वर्ष 2002 में चौराहे पर अयोध्या की हनुमानगढ़ी के माध्यम से प्राण प्रतिष्ठा करके छोटी हनुमानगढ़ी की स्थापना हुई। वर्ष 2007 में जीर्णोद्धार कर मंदिर बनाया गया। पुजारी भैरवप्रसाद तिवारी रोजाना यहां सुंदरकांड का पाठ करवाते हैं। सुबह व शाम आरती में श्रद्धालु जुटते हैं। संवाद
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सतनामी पंथ का उद्गम स्थल व संत जगजीवनदास की तपोस्थली कोटवाधाम की छोटी हनुमानगढ़ी मंदिर का संबंध सीधे अयोध्या की हनुमानगढ़ी से है। अनुयायियों के अनुसार समर्थ साईं जगजीवन दास की पांचवीं पीढ़ी के संत जसकरनदास हनुमान जी अनन्य भक्त थे। वह पैदल ही अयोध्या पहुंचे और हनुमानजी को अपने हाथों से लड्डू खिलाने की जिद पर अड़ गए, लेकिन सेवादारों ने उन्हें वापस कर दिया।
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बताते हैं कि इस दौरान हनुमानगढ़ी के कपाट अचानक बंद हो गए। तब वहां के तत्कालीन पुजारी रघुनाथदास ने कहा कि किसी संत का अपमान हुआ है, जिसके बाद जसकरन दास को हनुमानगढ़ी लाया गया। उन्होंने हनुमानजी को अपने हाथों से लड्डू खिलाया। जसकरनदास हनुमानजी के मठ की मिट्टी लेकर कोटवाधाम पहुंचे और यहां भी एक हनुमानगढ़ी का निर्माण किया। कोटवाधाम के महंत नीलेन्द्रबख्श दास ने बताया कि संत जसकरनदास की समाधि भी मंदिर के बगल बनाई गई है। कीर्ति सिंधु महाकाव्य में लेखक प्रेमदास ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखा है कि लड्डू कर मुख ओर बढ़ायाहु, खोली पवनसुत तुरतय खायहु।
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इसी प्रकार लखनऊ-अयोध्या हाईवे के भिटरिया चौराहे पर दशकों से एक बरगद के पेड़ के नीचे हनुमानजी की प्रतिमा की पूजा होती थी। वर्ष 2000 के बाद इस स्थान को हनुमानगढ़ी का रूप देने के लिए श्रद्धालु आगे आए। इंद्रप्रताप सिंह बताते हैं कि वर्ष 2002 में चौराहे पर अयोध्या की हनुमानगढ़ी के माध्यम से प्राण प्रतिष्ठा करके छोटी हनुमानगढ़ी की स्थापना हुई। वर्ष 2007 में जीर्णोद्धार कर मंदिर बनाया गया। पुजारी भैरवप्रसाद तिवारी रोजाना यहां सुंदरकांड का पाठ करवाते हैं। सुबह व शाम आरती में श्रद्धालु जुटते हैं। संवाद