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मुकदमे में लचर पैरवी से बरी हुए साबरमती कांड के आरोपी

अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी Updated Sat, 20 May 2017 11:17 PM IST
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रौजागांव में ब्लास्ट के बाद जला साबरमती एक्सप्रेस का कोच। (फाइल फोटो)
रौजागांव में ब्लास्ट के बाद जला साबरमती एक्सप्रेस का कोच। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

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साबरमती एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट के नामजद आरोपियों के अदालत से दोषमुक्त होने के पीछे अभियोजन की लचर पैरवी मुख्य वजह दिख रही है। जिस घटना में एक आरोपी को आजीवन कारावास की सजा हो चुकी हो और एक की मौत हो गई हो उसी में दो आरोपियों के दोषमुक्त होने से पैरवीकारों पर सवालिया निशान उठ रहे हैं।
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मुकदमे में पैरवी के लिए जिला प्रशासन ने एक कमेटी का भी गठन किया था, उसके बावजूद अभियोजन पक्ष इसका फायदा नहीं उठा सका। 

करीब 17 साल पहले 14 अगस्त 2000 की रात फैजाबाद से लखनऊ जा रही साबरमती एक्सप्रेस में करीब 11 बजे रौजागांव रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट हुआ था। इस घटना में 11 यात्रियों की मौत हो गई थी वहीं 40 घायल हुए थे।


पुलिस व खुफिया एजेंसियों ने इस मामले में जीआरपी बाराबंकी में हत्या, हत्या के प्रयास के अलावा, देशद्रोही गतिविधियों में केस दर्ज किया था। पुलिस ने साजिश रचने के आरोप में गुलजार बानी व सिमी के सक्रिय कार्यकर्ता अहमद मुबीन, मारूफ व मोहम्मद आकिल को पकड़ा था। इन आरोपियों ने वारदात को अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस करने का बदला बताया था।

जांच एजेंसियों ने पहले  इस मामले में मारूफ नाम के एक व्यक्ति को अरेस्ट किया था उसके बाद आगरा में हुए बम विस्फोट में पकड़े गए सिमी आतंकी अहमद मुबीन व उनके साथी मोहम्मद आकिल को पकड़ा था। मामले की सुनवाई के दौरान जहां आरोपी मोहम्मद आकिल की मौत हो चुकी है वहीं मारूफ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है जबकि गुलजार बानी व मुबीन पर केस चल रहा था।        
फेल हो गई मुकदमे के लिए गठित कमेटी      
जिला प्रशासन द्वारा साबरमती बम कांड मामले में अभियोजन पैरवी के लिए उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी में वरिष्ठ संयुक्त निदेशक अभियोजन आरके उपाध्याय, डीजीसी क्रिमिनल अमरेश विक्रम सिंह, एडीजीसी अमर सिंह यादव व मथुरा प्रसाद वर्मा को शामिल किया गया था। वहीं एएसपी कुवंर ज्ञानंजय सिंह जहां मामले पर नजर रखे थे वहीं एटीएस, एसआईबी व खुफिया एजेंसी के पदाधिकारी भी बराबर लगे हुए थे लेकिन कोई कुछ नहीं कर सका।       
    
सिमी व हिजबुल मुजाहिदीन संगठनों के इशारे पर वारदात के मिले थे सुबूत      
साबरमती बम कांड की जांच करने वाली पुलिस टीम ने बताया था कि सिमी व हिजबुल मुजाहिदीन संगठनों के इशारे पर वारदात होने के सुबूत मिले थे। इसी के आधार पर पुलिस ने पकड़े गए आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया था। लेकिन उसके बावजूद मामले में अभियोजन पक्ष की लचर पैरवी के चलते आरोपी फायदा उठाते हुए अदालत से दोष मुक्त हो गए।

एक आरोपी की हो चुकी है मौत              
मामले में आरोपी गुलजार अहमद बानी को जुलाई 2001 व मो. मारुफ, मोबीन तथा मो. आकिल को माह सितंबर 2000 में गिरफ्तार किया गया। मामले में गुलजार अहमद बानी कारागार में निरुद्घ था। मो. मारुफ को इसी मामले में पूर्व में ही उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी थी। मो. आकिल व अब्दुल मोबीन जमानत पर थे। जिसमें मो. आकिल की निर्णय पूर्व ही मौत हो चुकी है।     
              
17 साल में 82 लोगों ने दर्ज कराए बयान 
17 साल चले इस मुकदमे की सुनवाई कई अदालतों में हुई। इस दौरान घायलों तथा प्रत्यक्षदर्शियों समेत 82 लोगों ने कोर्ट में अपने बयान दर्ज कराए।     
अभियोजन पक्ष रहा असफल                  
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गुजलार अहमद बानी व अब्दुल मुबीन पर आरोपित अपराध अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका। आरोपीगण ने ट्रेन की बोगी में बम रखने का आपराधिक षडयंत्र किया, भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के लिए व राजद्रोह के लिए विस्फोटक पदार्थ एकत्र किया। अभियोजन पक्ष यह भी साबित करने में असफल रहा। 

फैसले से परिवारीजनों में खुशी
कोर्ट में सुनाए गए फैसले से गुलजार अहमद बानी के परिवारीजन काफी खुश व संतुष्ट दिखे। कश्मीर से आए पिता गुलाम मोहम्मद बानी ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। मेरा पुत्र 16 साल से जेल में है। उस पर लगे आरोपों से उसका कॅरियर तबाह हो गया। बताया कि गुलजार अहमद बानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहा था। कश्मीर से दिल्ली आते समय उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

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