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Barabanki News: मोबाइल की लत से समय से नहीं बोल पा रहे बच्चे
Mon, 16 Dec 2024 11:55 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Mon, 16 Dec 2024 11:55 PM IST
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बाराबंकी। हाईटेक हो चुकी जीवन शैली में स्मार्ट फोन हर व्यक्ति की जरूरत बन गया है। इसका सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। हर घर में बच्चों को चुप कराने या जिद से पीछा छुड़ाने के लिए माता-पिता मोबाइल पकड़ा देते हैं। इस कारण दो से तीन वर्ष तक के बच्चों की बोलने की क्षमता प्रभावित होने लगी है। स्कूल जाने वाले बच्चों में भी आत्म नियंत्रण, एकाग्रता और व्यवहारिकता की कमी आने लगी है। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला अस्पताल में चलने वाली ओपीडी में हर दिन 15 से 20 अभिभावक इन्हीं समस्याओं से ग्रसित बच्चों के इलाज के लिए आ रहे हैं।
इन बच्चों की मानसिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि डॉक्टरों को इनकी सेहत में सुधार और मोबाइल की आदत छुड़वाने के लिए कई-कई महीनों तक काउंसलिंग करना पड़ रही है। ऐसे बीमार बच्चों के माता-पिता को भी काउंसलिंग के जरिए बच्चों की दैनिक चर्या में बदलाव लाने के गुर सिखाए जा रहे हैं।
अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) बच्चों में पाई जाने वाली प्रमुख बीमारी है। इससे बच्चों में मानसिक, व्यवहारिक, और इमोशनल स्ट्रेस का अधिक खतरा होता है। यह ऐसा मेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें दिमाग का विकास सामान्य इंसान की तुलना में धीरे या ठीक से नहीं होता है। जिला अस्पताल में हर माह इस व्याधि से पीड़ित होकर करीब 10 से 12 बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं।
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डॉ. सौरभ मिश्रा, प्रभारी डीएमएचपी ने बताया कि मोबाइल की आदत बदलने के लिए अभिभावकों को अपनी दिनचर्या में बदलाव करना होगा। बच्चों को मोबाइल देने की समय सीमा तय करनी होगी और इससे सख्ती से लागू करना भी जरूरी है। मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत के लिए करें न कि इसे नशा बनने दें। जागरूक होना जरूरी
इसी तरह मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नुपुर पांडेय ने बताया मानसिक बीमारी के प्रति जागरूकता लाने के लिए शैक्षिक संस्थानों में विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं, ताकि बच्चे अपनी मनोस्थिति का स्वयं आंकलन कर सकें और काउंसलिंग के जरिए उनकी बौद्धिक क्षमता में विकास किया जा सके।
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इन बच्चों की मानसिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि डॉक्टरों को इनकी सेहत में सुधार और मोबाइल की आदत छुड़वाने के लिए कई-कई महीनों तक काउंसलिंग करना पड़ रही है। ऐसे बीमार बच्चों के माता-पिता को भी काउंसलिंग के जरिए बच्चों की दैनिक चर्या में बदलाव लाने के गुर सिखाए जा रहे हैं।
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अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) बच्चों में पाई जाने वाली प्रमुख बीमारी है। इससे बच्चों में मानसिक, व्यवहारिक, और इमोशनल स्ट्रेस का अधिक खतरा होता है। यह ऐसा मेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें दिमाग का विकास सामान्य इंसान की तुलना में धीरे या ठीक से नहीं होता है। जिला अस्पताल में हर माह इस व्याधि से पीड़ित होकर करीब 10 से 12 बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं।
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डॉ. सौरभ मिश्रा, प्रभारी डीएमएचपी ने बताया कि मोबाइल की आदत बदलने के लिए अभिभावकों को अपनी दिनचर्या में बदलाव करना होगा। बच्चों को मोबाइल देने की समय सीमा तय करनी होगी और इससे सख्ती से लागू करना भी जरूरी है। मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत के लिए करें न कि इसे नशा बनने दें। जागरूक होना जरूरी
इसी तरह मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नुपुर पांडेय ने बताया मानसिक बीमारी के प्रति जागरूकता लाने के लिए शैक्षिक संस्थानों में विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं, ताकि बच्चे अपनी मनोस्थिति का स्वयं आंकलन कर सकें और काउंसलिंग के जरिए उनकी बौद्धिक क्षमता में विकास किया जा सके।