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बाराबंकी में मुशायरा
अमर उजाला ब्यूरो/बराबंकी
Updated Tue, 23 Feb 2016 12:31 AM IST
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मशहूर शायर खुमार बाराबंकवी की पुण्यतिथि पर रविवार रात खुमार मेमोरियल एकेडमी में एक मुशायरे का आयोजन कर श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता निहाल रिजवी और संचालन सगीर नूरी ने किया। शायर निहाल रिजवी ने पढ़ा, इस गमों की भीड़ में थोड़ी खुशी है भी तो क्या, घुप अंधेरों में जरा सी रोशनी है भी तो क्या। रिफत अज्मी ने, ‘कभी यकीं तो कभी मंजिलें गुमों में रहे, तमाम उम्र इसी तरह हम जहां में रहे।
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डॉ. फिदा हुसैन ने कुछ यू तालियां बटोरीं, ‘बस एक दिल ही तो टूटा है आसमां तो नहीं, जरा सी बात पे क्यों इतनी बेकरारी है।’ मोहसिन किदवई ने पढ़ा- गजल का फैज न होता तो हम नहीं कहते, मरा नहीं है हमारा खुमार जिंदा है। सगीर नूरी ने ये पढ़कर तालियां बटोरीं, सीने फिक्र में पैदा कोई हलचल कर दे, मुंतजिर हूं कि कोई आके मुकम्मल कर दे।
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वकार बाराबंकवी ने पढ़ा- मेरी हल गोई की आदत नहीं जाने वाली, सर कलम कर दे कि सूली पे चढ़ा दे कोई। फैज खुमार ने पढ़ा- भटकते फिर रहे हैं दर बदर की ठोकरें खाते, हमें जिस दर पे रहना था वही दर छोड आए हैं। इसके अलावा कैफी रूदौलवी, कशिश संडेलवी, वाकर नकवी, हुजैल लालपरी, अफसर बाराबंकवी, इरशाद बाराबंकवी, अहमद सईद हर्फ, अख्तर कुरैशी आदि ने कलाम पेश किए।
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