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Barabanki News: 50 साल बाद फिर ग्राम पंचायत को वापस होगी जमीन
Tue, 24 Jun 2025 12:17 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Tue, 24 Jun 2025 12:17 AM IST
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बाराबंकी। रामसनेहीघाट तहसील की सूर्यपुर परगना के एक गांव में तीन पीढि़यों से एक परिवार में कलह का कारण बनी करीब कच्चा 12 बीघा सरकारी जमीन 50 साल बाद ग्राम पंचायत को वापस होगी। खास बात यह है कि बेटे ने ही पिता के खिलाफ डीएम कोर्ट में इस जमीन को ग्राम पंचायत में दर्ज करने की मांग की थी।
बेटे ने अपने पिता को अपात्र होते हुए जमीन का पट्टा कराए जाने का आरोप ग्राम भूमि प्रबंध समिति पर लगाया था। डीएम कोर्ट से जब इस मामले में राजस्व अभिलेखागार से रिपोर्ट मांगी तो चौकाने वाला तथ्य सामने आया। रजिस्ट्रार कानूनगो ने अपनी आख्या में कहा कि जिस व्यक्ति के नाम अपात्र होते हुए भी पट्टा किए जाने का आरोप है, उस व्यक्ति का नाम राजस्व अभिलेखागार में मिली ग्राम पंचायत की दो कृषि आवंटन पत्रावलियों में अंकित ही नहीं है।
यह भी बताया कि एक पत्रावली का अनुमोदन 18 फरवरी 2000 व दूसरी पत्रावली का अनुमोदन इससे पहले 17 अप्रैल 1976 को हुआ था, लेकिन दोनों ही पत्रावलियों में नाम दर्ज नहीं है। वहीं लेखपाल की आख्या में जमीन गांव में हुई चकबंदी से दर्ज होना बताई गई है। चकबंदी में सीधे सरकारी जमीन कैसे नाम चढ़ गई, इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अभिलेखागार की रिपोर्ट पर डीएम शशांक त्रिपाठी ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए विपक्षी को शमन जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 26 जून को होगी।
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वादी के अधिवक्ता का कहना है कि राजस्व अभिलेखागार की रिपोर्ट से इस मामले में की गई धांधली पोल खुल गई है। अब अंतिम निर्णय का इंतजार है। निर्णय के बाद विपक्षी द्वारा अब तक सरकारी जमीन से जो लाभ कमाया गया है, उसकी वसूली भी नियमानुसार कराई जाएगी।
ऐसे शुरू हुआ विवाद
वादी के पिता ने करीब दो साल पहले अपने नाम दर्ज सरकारी जमीन को अपने एक पुत्र के तीन बेटों के नाम दानपत्र में लिख दिया था। इससे पहले विपक्षी का विवाद अपने तीन भाईयों से इसी जमीन को लेकर लंबे समय तक चला था। अब यही जमीन विपक्षी के अपने दो बेटों के बीच दुश्मनी का कारण बन गई। ऐसे में आरोपी के बड़े बेटे ने वादी मुकदमा बनकर जमीन को ग्राम पंचायत में दर्ज करने की मांग की।
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बेटे ने अपने पिता को अपात्र होते हुए जमीन का पट्टा कराए जाने का आरोप ग्राम भूमि प्रबंध समिति पर लगाया था। डीएम कोर्ट से जब इस मामले में राजस्व अभिलेखागार से रिपोर्ट मांगी तो चौकाने वाला तथ्य सामने आया। रजिस्ट्रार कानूनगो ने अपनी आख्या में कहा कि जिस व्यक्ति के नाम अपात्र होते हुए भी पट्टा किए जाने का आरोप है, उस व्यक्ति का नाम राजस्व अभिलेखागार में मिली ग्राम पंचायत की दो कृषि आवंटन पत्रावलियों में अंकित ही नहीं है।
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यह भी बताया कि एक पत्रावली का अनुमोदन 18 फरवरी 2000 व दूसरी पत्रावली का अनुमोदन इससे पहले 17 अप्रैल 1976 को हुआ था, लेकिन दोनों ही पत्रावलियों में नाम दर्ज नहीं है। वहीं लेखपाल की आख्या में जमीन गांव में हुई चकबंदी से दर्ज होना बताई गई है। चकबंदी में सीधे सरकारी जमीन कैसे नाम चढ़ गई, इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अभिलेखागार की रिपोर्ट पर डीएम शशांक त्रिपाठी ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए विपक्षी को शमन जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 26 जून को होगी।
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वादी के अधिवक्ता का कहना है कि राजस्व अभिलेखागार की रिपोर्ट से इस मामले में की गई धांधली पोल खुल गई है। अब अंतिम निर्णय का इंतजार है। निर्णय के बाद विपक्षी द्वारा अब तक सरकारी जमीन से जो लाभ कमाया गया है, उसकी वसूली भी नियमानुसार कराई जाएगी।
ऐसे शुरू हुआ विवाद
वादी के पिता ने करीब दो साल पहले अपने नाम दर्ज सरकारी जमीन को अपने एक पुत्र के तीन बेटों के नाम दानपत्र में लिख दिया था। इससे पहले विपक्षी का विवाद अपने तीन भाईयों से इसी जमीन को लेकर लंबे समय तक चला था। अब यही जमीन विपक्षी के अपने दो बेटों के बीच दुश्मनी का कारण बन गई। ऐसे में आरोपी के बड़े बेटे ने वादी मुकदमा बनकर जमीन को ग्राम पंचायत में दर्ज करने की मांग की।