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रौजे सीता हरन होत है, लोग कहत हैं रावन मरिगा....
Barabanki
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:30 AM IST
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देवा। देवा मेले के ऑडिटोरयिम में शनिवार की देर रात मंच पर चोटी के कवियाें की महफिल सजी। इस यादगार रात काव्यरस की ऐसी रसधारा बही कि श्रोता विभिन्न काव्यरसों से सरोबार हो मंत्रमुग्ध हो गए। ऑडिटोरयिम में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मलेन में शृंगार, वीर, हास्य रस के कवियों ने अपनी रचनाएं पढ़कर खूब वाहवाही लूटी। ऑडिटोरयिम में तय समय से काफी विलंब से शरू हुए कवि सम्मेलन में चोटी के कवियों ने अपना काव्यपाठ प्रस्तुत किया तो श्रोताओं ने खड़े हो पंडाल तालियों से सम्मान किया। कार्यक्रम की शुरुआत मेरठ से आई अनामिका अंबर ने वाणी वंदना- लेखनी जो भी कहे वह जिंदगी का तार है, शब्द सुर का ज्ञान हो और नेह का विस्तार हो, एक कलम दो दान जो बस सच कहे, है मेरी ये वंदना मां वंदना स्वीकार करो.. से की। इसके बाद उन्होंने पढ़ा- पायल की छन-छन से छनके-खनके बन कंगना, ओस की बूंदे हैं हम लड़की मन है एक दर्पण...। हरियाणा के कवि अरुण जेमिनी ने सुनाया- आंखों में पानी दादी की कहानी ढूंढते रह जाओगे, संतो की बानी, कर्ण जैसा दानी परोपकारी बंदे अर्थी को कंधे ढूंढते रह जाओगे... तो पंडाल तालियों से गूंज उठा। साजय झांसा जयपुर ने पढ़ा- दीवाली और ईद कुछ हम इस तरह मनाएं, राम को सिवइयां अल्लाह को लड्डू खिलाएं, राम करे अल्लाह कहें ऐसा हो जाए, सिवइयां खाएं राम मजा अल्लाह को आए...। लखनऊ से आई सुमन ने सुनाया- दर्द का दिल में रतन रख लिया, गीत गा-गाकर दुनिया का मन रख लिया, इतने कांटे मुझे है चुभोए गए, नाम हमने भी अपना सुमन रख लिया...। छतरपुर मध्यप्रदेश के अभिराम पाठक ने पढ़ा- मौन हो गई स्रष्टि जिंदगी मौत की दासी हुई, अनायास ही जब भगतसिंह की एक दिन पहले फांसी हुई, न्यायमूर्ति खुद कहता था ये न्याय नहीं मिथ्या है, तुम कहते हो फांसी इसको मैं कहता हूं हत्या है.. सुनाया तो पंडाल मेें तालियां गूंज उठी। बरेली के किशन सरोज ने पढ़ा- कोई अन्याय अनादर हमें खलता ही नहीं, इस कदर सर्द हुआ खून अब उबलता ही नहीं..। बहराइच के आशुतोष ने- ये पावा मुंह करिया-करिया, सुनत-सुनत जिव आपन भरिगा, रौजे सीता हरन होत है, लोग कहत हैं रावन मरिगा.... सुनाकर सभी को गुदगुदा दिया। जैसे-जैसे रात गहराती गई कवियों की कविताओं के रस में श्रोता डूबते नजर आए। बाराबंकी के विकास सिंह बौखल ने सुनाया- अमर उजाला, दैनिक देखै कोई देखै आज, कहां-कहां आतंक मचाए हैं हुदहुद महाराज..। अजय प्रधान बाराबंकी ने पढ़ा- हंस अभिशापित अंधेरा झेलने को, उल्लुओं के घर हैलोजन जल रहे हैं..। रामकिशोर तिवारी बाराबंकी ने सुनाया- चक्र उठा लो आज कृष्ण तुम, वंशी कभी बजा लेना, आज खड़ा है कंस सामने, रास कभी रचा लेना तुम...। जैसे-जैसे रात सर्द होती गई कवियों की कविताएं परवान चढ़ती गई। कवि सम्मेलन का संचालन रामकिशोर तिवारी ने किया। इससे पूर्व शुभारंभ अरविंद सिंह गोप, राजा राजीव सिंह व सुरेश यादव ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कवि सम्मेलन में राय सर्वेसर बली ने कवियों का स्वागत किया।
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