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नसबंदी के बाद गर्भवती हुईं 81 महिलाएं
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
Updated Wed, 22 Feb 2017 11:23 PM IST
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गर्भवती महिला
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स्वास्थ्य विभाग द्वारा जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए लाखों रुपये खर्च कर चलाया जा रहा नसबंदी अभियान पूरी तरह से फेल हो गया। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले में दो वर्ष के भीतर नसबंदी कराने के बाद 81 महिलाएं गर्भवती हो चुकी हैं।
यही नहीं नसबंदी के बाद दो की जान भी जा चुकी है। यह तो वे आंकड़े हैं जिनके परिवारीजन आर्थिक सहायता के लिए आवेदन किया है। कइयों ने तो लोकलाज में मुहं खोलना ही मुनासिब नहीं समझा। विभाग की नाकामी खाली नसबंदी अभियान में ही नहीं पीड़िताओं को मुआवजे के भुगतान में भी साफ दिखाई पड़ रही है।
राष्ट्रीय प्रोग्राम नसबंदी को सफल बनाने के लिए सरकार और शासन प्रोत्साहन के लिए कई सुविधाएं देता है। इतना ही नहीं नसबंदी के बाद यदि कोई महिला गर्भवती हो जाए तो उसे मुआवजे के रूप में 30 हजार रुपये दिए जाते हैं। यदि नसबंदी के चलते किसी महिला की एक सप्ताह के भीतर मृत्यु हुई तो दो लाख व उसके बाद 50 हजार रुपये दिए जाने का प्रावधान है।
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जिले में वित्तीय वर्ष 2015-16 व 2016-17 में 81 महिलाएं नसबंदी के बाद गर्भवती हुई हैं तथा दो की जान भी जा चुकी है। 83 महिलाओं के परिवारीजनों ने मुआवजे के लिए आवेदन किया। पर अभी तक किसी को एक धेला नसीब नहीं हुआ। यह तथ्य तो सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं, पर इससे अधिक पीड़ित परिवार ने लोकलाज के चक्कर में मुंह तक नहीं खोला।
केस-1 सीएचसी बड़ागांव में 18 दिसंबर 2015 को लगाए गए नसबंदी शिविर में चिलौकी के सतीश अपनी पत्नी सुनैना (32) का ऑपरेशन कराने ले गया था। सीएचसी हैदगढ़ के सर्जन डॉ. मनोज गुप्ता ने नसबंदी के लिए ऑपरेशन शुरू किया कुछ पलों में सुनैना की हालत बिगड़ गई।
परिवारीजन सुनैना को आननफानन जिला महिला अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक वह दम तोड़ चुकी थी। परिवारीजनों ने डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाया था। विभाग ने डॉक्टर को क्लीन चिट दे दी और परिवार को बतौर क्लेम दो लाख रुपये दिलाने की औपचारिकता कराई। लेकिन आज तक परिवार को एक फू टी कौड़ी भी नहीं मिल सकी।
केस-2 टिकैतनगर सीएचसी पर इसी क्षेत्र के विद्यानगर की निवासी रमेश की पत्नी सुषमा ने 19 फरवरी 2015 को कैंप में नसबंदी कराई थी। चिकित्सकों ने ऑपरेशन के तुंरत बाद उसे घर भेज दिया। सुषमा की ऑपरेशन के बाद हालत बिगड़ी पर समुचित इलाज नहीं मिल सका। उसने आठवें दिन 27 फरवरी को दम तोड़ दिया।
डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगा कर परिवारीजनों ने हंगामा किया। अधिकारी मौके पर पहुंचे और पति को बताया कि ऑपरेशन के सात दिन के अंदर मौत होने पर ही दो लाख रुपये क्लेम का प्रावधान है। औपचारिकता भी पूर्ण कराई, पर अब तक क्लेम की धनराशि नहीं मिली।
नसबंदी फेल्योर होने पर क्लेम देने का प्रावधान है, इसके लिए एक लंबी व जटिल प्रक्रिया है। लंबित मामलों की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है।-डॉ. डीआर सिंह, सीएमओ
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यही नहीं नसबंदी के बाद दो की जान भी जा चुकी है। यह तो वे आंकड़े हैं जिनके परिवारीजन आर्थिक सहायता के लिए आवेदन किया है। कइयों ने तो लोकलाज में मुहं खोलना ही मुनासिब नहीं समझा। विभाग की नाकामी खाली नसबंदी अभियान में ही नहीं पीड़िताओं को मुआवजे के भुगतान में भी साफ दिखाई पड़ रही है।
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राष्ट्रीय प्रोग्राम नसबंदी को सफल बनाने के लिए सरकार और शासन प्रोत्साहन के लिए कई सुविधाएं देता है। इतना ही नहीं नसबंदी के बाद यदि कोई महिला गर्भवती हो जाए तो उसे मुआवजे के रूप में 30 हजार रुपये दिए जाते हैं। यदि नसबंदी के चलते किसी महिला की एक सप्ताह के भीतर मृत्यु हुई तो दो लाख व उसके बाद 50 हजार रुपये दिए जाने का प्रावधान है।
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जिले में वित्तीय वर्ष 2015-16 व 2016-17 में 81 महिलाएं नसबंदी के बाद गर्भवती हुई हैं तथा दो की जान भी जा चुकी है। 83 महिलाओं के परिवारीजनों ने मुआवजे के लिए आवेदन किया। पर अभी तक किसी को एक धेला नसीब नहीं हुआ। यह तथ्य तो सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं, पर इससे अधिक पीड़ित परिवार ने लोकलाज के चक्कर में मुंह तक नहीं खोला।
केस-1 सीएचसी बड़ागांव में 18 दिसंबर 2015 को लगाए गए नसबंदी शिविर में चिलौकी के सतीश अपनी पत्नी सुनैना (32) का ऑपरेशन कराने ले गया था। सीएचसी हैदगढ़ के सर्जन डॉ. मनोज गुप्ता ने नसबंदी के लिए ऑपरेशन शुरू किया कुछ पलों में सुनैना की हालत बिगड़ गई।
परिवारीजन सुनैना को आननफानन जिला महिला अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक वह दम तोड़ चुकी थी। परिवारीजनों ने डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाया था। विभाग ने डॉक्टर को क्लीन चिट दे दी और परिवार को बतौर क्लेम दो लाख रुपये दिलाने की औपचारिकता कराई। लेकिन आज तक परिवार को एक फू टी कौड़ी भी नहीं मिल सकी।
केस-2 टिकैतनगर सीएचसी पर इसी क्षेत्र के विद्यानगर की निवासी रमेश की पत्नी सुषमा ने 19 फरवरी 2015 को कैंप में नसबंदी कराई थी। चिकित्सकों ने ऑपरेशन के तुंरत बाद उसे घर भेज दिया। सुषमा की ऑपरेशन के बाद हालत बिगड़ी पर समुचित इलाज नहीं मिल सका। उसने आठवें दिन 27 फरवरी को दम तोड़ दिया।
डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगा कर परिवारीजनों ने हंगामा किया। अधिकारी मौके पर पहुंचे और पति को बताया कि ऑपरेशन के सात दिन के अंदर मौत होने पर ही दो लाख रुपये क्लेम का प्रावधान है। औपचारिकता भी पूर्ण कराई, पर अब तक क्लेम की धनराशि नहीं मिली।
नसबंदी फेल्योर होने पर क्लेम देने का प्रावधान है, इसके लिए एक लंबी व जटिल प्रक्रिया है। लंबित मामलों की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है।-डॉ. डीआर सिंह, सीएमओ