{"_id":"59627aa64f1c1bed058b46b6","slug":"61499626150-barabanki-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"खतरे के निशान से नीचे पहुंचा घाघरा का जलस्तर, बढ़ी दुश्वारिया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खतरे के निशान से नीचे पहुंचा घाघरा का जलस्तर, बढ़ी दुश्वारिया
Updated Mon, 10 Jul 2017 12:19 AM IST
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बाराबंकी। घाघरा के जलस्तर कम होते ही खेतों में तेजी से कटान शुरू हो गई है। जिससे बांध के कटान का खतरा उत्पन्न हो गया है। ऐसे में कोटरी गौरिया के समीप अलीनगर-रानीमऊ तटबंध के बचाव में बाढ़ विभाग के अफसर लगे रहे। वहीं देर शाम बाढ़ प्रभावित क्षेत्र रायपुर मांझा व नाउनपुरवा पहुंचकर डीएम व एडीएम ने बाढ़ पीड़ितों में राहत सामग्री बंटवाई।
रविवार की दोपहर 2 बजे तक घाघरा का जलस्तर खतरे के निशान से छह सेंटी मीटर नीचे पहुंच कर ठहर सा गया। जिसके बाद से रामनगर तहसील के घाघरा के उस पार बसे जमका व खुज्जी व रामसनेहीघाट तहसील के सोनवर्षा, मगरौरा व करौनी गांव के बाहर खेतो में तेजी से कटान शुरू हो गई। खेत को लील रही घाघरा को देख तराई के लोगों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। जमका के ननकू, दीनू, राम प्रसाद व रमई कहते हैं कि बाढ़ हर बार खेतों को काटकर बहा ले जाती है। जो खेत बचे अबकी बार वह भी घाघरा में समाए जा रहे हैं। रविवार को कोठरी गौरिया के पास अलीनगर-रानमऊ बांध को बचाने के लिए बाढ़ विभाग के जेई शैलेश कुमार व वर्क सुपरवाइजर घनश्याम मिश्र की देखरेख में वायर कट डालने का काम किया जा रहा था। नैपुरा गांव के लोग बांध पर अपना आशियाना बनाने में जुटे थे। हालांकि कई परिवार नाव न मिलने के कारण अभी भी गांव में ही हैं। देर शाम नाउनपुरवा पहुचें डीएम अखिलेश तिवारी व एडीएम अनिल कुमार सिंह ने बाढ़ पीड़ित 336 परिवारों को खाद्य सामग्री वितरित की।
बंधे पर आशियाना बना जिंदगी गुजार रहे तराई के लोग
टिकैतनगर संवाददाता के अनुसार घाघरा की त्रासदी का शिकार हुए सैकड़ों परिवार चरसड़ी बंधे पर झोपड़ी बनाकर बदहाली की जिंदगी गुजार रहे हैं। बारिश हो या फिर चिलचिलाती धूप यह हर मौसम की मार झेलते हैं। प्रत्येक वर्ष बाढ़ के समय जिले के आला अधिकारी से लेकर मंत्री तक इस प्रभावित क्षेत्र का दौरा करते हैं। बाढ़ पीड़ितों को आश्वासन देते हैं। मगर, बाढ़ खत्म होते ही सभी उन्हें भुला देते हैं।
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घाघरा के किनारे बसे गांव के लोग पिछले कई वर्ष से बाढ़ की तबाही का शिकार होकर चरसड़ी बंधे पर झोपड़ी बना अपना जीवन काट रहे हैं। कुछ परिवार तो बांध पर ही अपना आशियाना बना कर रहने लगे। वहीं कई परिवार बाढ़ के समय घरों में पानी भरने के बाद बांध पर आ जाते हैं। हर साल घाघरा की कटान से सैकड़ों परिवार बेघर होते हैं। जिनका एकमात्र ठिकाना बांध होता है। तराई वासियों ने इसको लेकर कई बार आला अधिकारियों से स्थायी पुनर्वास के लिए गुहार लगाई। पर मिला सिर्फ आश्वासन। यहां के निवासी रामहेत, सरजू, मितई, वनीलाल, रामदीन व पुजारी आदि का कहना है कि अब तो जिंदगी भगवान भरोसे कट रही है। कई बार अधिकारियों ने भी यहां से हटाने का प्रयास किया लेकिन हम सभी जायें तो जायें कहां।
सूरतगंज संवाददाता के अनुसार बाढ़ के पानी ने कंचनापुर गांव को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। हालांकि रविवार को घाघरा का जलस्तर घटने से पानी गांव में घुसने से रह गया। ऐसे में पहले से परेशान ग्रामीणों ने फिलहाल राहत की सांस ली। मगर, घाघरा घटने के बाद पिछले वर्ष कटान से बचे प्राथमिक विद्यालय भवन व एक धार्मिक स्थल के साथ खेतों में कटान करने लगी है।
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रविवार की दोपहर 2 बजे तक घाघरा का जलस्तर खतरे के निशान से छह सेंटी मीटर नीचे पहुंच कर ठहर सा गया। जिसके बाद से रामनगर तहसील के घाघरा के उस पार बसे जमका व खुज्जी व रामसनेहीघाट तहसील के सोनवर्षा, मगरौरा व करौनी गांव के बाहर खेतो में तेजी से कटान शुरू हो गई। खेत को लील रही घाघरा को देख तराई के लोगों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। जमका के ननकू, दीनू, राम प्रसाद व रमई कहते हैं कि बाढ़ हर बार खेतों को काटकर बहा ले जाती है। जो खेत बचे अबकी बार वह भी घाघरा में समाए जा रहे हैं। रविवार को कोठरी गौरिया के पास अलीनगर-रानमऊ बांध को बचाने के लिए बाढ़ विभाग के जेई शैलेश कुमार व वर्क सुपरवाइजर घनश्याम मिश्र की देखरेख में वायर कट डालने का काम किया जा रहा था। नैपुरा गांव के लोग बांध पर अपना आशियाना बनाने में जुटे थे। हालांकि कई परिवार नाव न मिलने के कारण अभी भी गांव में ही हैं। देर शाम नाउनपुरवा पहुचें डीएम अखिलेश तिवारी व एडीएम अनिल कुमार सिंह ने बाढ़ पीड़ित 336 परिवारों को खाद्य सामग्री वितरित की।
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बंधे पर आशियाना बना जिंदगी गुजार रहे तराई के लोग
टिकैतनगर संवाददाता के अनुसार घाघरा की त्रासदी का शिकार हुए सैकड़ों परिवार चरसड़ी बंधे पर झोपड़ी बनाकर बदहाली की जिंदगी गुजार रहे हैं। बारिश हो या फिर चिलचिलाती धूप यह हर मौसम की मार झेलते हैं। प्रत्येक वर्ष बाढ़ के समय जिले के आला अधिकारी से लेकर मंत्री तक इस प्रभावित क्षेत्र का दौरा करते हैं। बाढ़ पीड़ितों को आश्वासन देते हैं। मगर, बाढ़ खत्म होते ही सभी उन्हें भुला देते हैं।
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घाघरा के किनारे बसे गांव के लोग पिछले कई वर्ष से बाढ़ की तबाही का शिकार होकर चरसड़ी बंधे पर झोपड़ी बना अपना जीवन काट रहे हैं। कुछ परिवार तो बांध पर ही अपना आशियाना बना कर रहने लगे। वहीं कई परिवार बाढ़ के समय घरों में पानी भरने के बाद बांध पर आ जाते हैं। हर साल घाघरा की कटान से सैकड़ों परिवार बेघर होते हैं। जिनका एकमात्र ठिकाना बांध होता है। तराई वासियों ने इसको लेकर कई बार आला अधिकारियों से स्थायी पुनर्वास के लिए गुहार लगाई। पर मिला सिर्फ आश्वासन। यहां के निवासी रामहेत, सरजू, मितई, वनीलाल, रामदीन व पुजारी आदि का कहना है कि अब तो जिंदगी भगवान भरोसे कट रही है। कई बार अधिकारियों ने भी यहां से हटाने का प्रयास किया लेकिन हम सभी जायें तो जायें कहां।
सूरतगंज संवाददाता के अनुसार बाढ़ के पानी ने कंचनापुर गांव को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। हालांकि रविवार को घाघरा का जलस्तर घटने से पानी गांव में घुसने से रह गया। ऐसे में पहले से परेशान ग्रामीणों ने फिलहाल राहत की सांस ली। मगर, घाघरा घटने के बाद पिछले वर्ष कटान से बचे प्राथमिक विद्यालय भवन व एक धार्मिक स्थल के साथ खेतों में कटान करने लगी है।