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चार साल में सड़ गई योजना, प्लांट लगा न गोबर बिका

Tue, 15 Feb 2022 11:12 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 15 Feb 2022 11:12 PM IST
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The plan rotted in four years, neither plant nor cow dung was sold
अपने निजी कृषि फार्म में गोबर से खाद और गैस बनाने के प्लांट में काम करते प्रगतिशील किसान विज्ञान ? - फोटो : BANDA
बांदा। मवेशियों का गोबर खरीदने की योजना गोवर्धन (गोबर धन) बुंदेलखंड में चार वर्ष पहले ही लागू हो चुकी थी, लेकिन तब यह ठंडे बस्ते में पड़ी है। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानपुर देहात में चुनावी जनसभा में छुट्टा मवेशियों से निजात दिलाने के मकसद से गोबर खरीदने की योजना का जिक्र किया तो पशुपालकों में फिर से उम्मीद जगी है।
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वर्ष 2018 से लागू हुई इस योजना में प्रदेश के 36 जिले शामिल हैं। इनमें बुंदेलखंड के बांदा, जालौन, झांसी और ललितपुर (चार जिले) चुने गए हैं। चित्रकूटधाम मंडल में सिर्फ बांदा, जबकि झांसी मंडल में जालौन, ललितपुर और झांसी को शामिल किया गया है।
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परियोजना के तहत गोबर से खाद, बायो गैस और बिजली पैदा करने वले संयंत्र लगाए जाने हैं। प्रति प्लांट 50 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। बांदा में रगौली भटपुरा गांव को इस योजना के लिए चिह्नित किया गया है। सरकार की मंशा है कि पशुपालक किसान इन संयंत्रों को मवेशियों का गोबर बेचें और अपनी आमदनी बढ़ाएं।
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अभी तक बजट ही नहीं मिला
रगौली भटपुरा गांव में ग्राम पंचायत को गोवर्धन योजना के तहत प्लांट लगाना है, लेकिन अभी तक बजट नहीं मिला है। ग्रामीण और पशुपालक इंतजार कर रहे हैं कि कब प्लांट लगे और उनसे गोबर की खरीद हो। दरअसल यह परियोजना उन्हीं गांवों में स्थापित की जाती है जहां गोशाला और पशु अधिक हों।
गोशालाओं के गोबर से बायो गैस आदि बनेगी। कम पड़ा तो किसानों से गोबर खरीदा जाएगा। इसकी कीमत लगभग 17 रुपये किलो बताई जा रही है। प्लांट से पैदा होने वाली बिजली से संबंधित गांव सहित आसपास के कई गांव भी रोशन होंगे। रगौली भटपुरा में जनपद की सबसे बड़ी गोशाला है। इनकी क्षमता लगभग 20 हजार मवेशियों की है।
डीएम की अध्यक्षता में समिति गठित
गोबर से गैस बनाने वाले प्लांट की अनुमानित लागत 50 लाख रुपये तय की गई है। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया है। इसमें डीपीआरओ सदस्य सचिव हैं। इनके अलावा मुख्य विकास अधिकारी और कई अन्य अधिकारी भी समिति में शामिल किए गए हैं।
इस योजना की नोडल एजेंसी पंचायती राज विभाग है। राज्य स्तर पर पंचायती राज निदेशालय के पास जिम्मेदारी है। आनलाइन आवेदन के लिए गोबर धन योजना पोर्टल खोला गया है। जिला स्तर पर जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय इस योजना को संचालित कर रहे हैं।
योजना के मुख्य फायदे
गोबर, कृषि अपशिष्ट, रसोई घर के कचरे आदि को कंपोस्ट और बायो गैस तथा बायो सीएनजी में बदला जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई रखने में मदद मिलेगी। बायो गैस से खाना पकाने के साथ ही रोशनी के लिए ऊर्जा (बिजली) भी पैदा होगी। किसानों और पशुपालकों की आमदनी बढ़ेगी। प्रदूषण कम होगा।
सरकार से पहले निजी किसान ने अपनाई योजना
बांदा। गोवर्धन (गोबर धन) गैस योजना सरकारी स्तर पर भले ही चार वर्षों में परवान न चढ़ सकी हो पर बुंदेलखंड के कुछ प्रगतिशील किसानों ने अपने स्तर से इसे अपना लिया है। उनकी आय बढ़ी है। इसकी बानगी जनपद के खेरवा गांव के युवा और प्रगतिशील किसान विज्ञान शुक्ला हैं।
विज्ञान बताते हैं कि वह करीब 400 एकड़ में जैविक खेती कर रहे हैं। उनके पास लगभग 150 गाय हैं। इनके गोबर और मूत्र से वह खाद तैयार करने के साथ ही गोबर गैस बना रहे हैं। कृषि फार्म को जैविक फार्म का मॉडल बनाया है। जनपद के करीब 3300 किसान उनके साथ जुड़े हैं। इनके अलावा चित्रकूट, महोबा और हमीरपुर में भी लगभग 7000 किसान इसी पद्धति पर खेती कर रहे हैं।

यहां गोबर से तैयार होती हैं तमाम वस्तुएं
चित्रकूट। जिले के ऐचवारा गांव में शोभन सरकार के आश्रम में गोबर से वस्तुएं बनाने के लिए आधुनिक मशीनें लगाई गई हैं। यहां कंडे और उपले भी बनते हैं। इन्हें जलाने पर धुआं बहुत कम निकलता है। आश्रम में खुली गोशाला का गोबर इसमें उपयोग किया जाता है। इसी तरह से दीये भी बनाए जाते हैं। आश्रम के महंत ओम बाबा ने बताया कि गोबर गैस प्लांट लगाने का प्रयास कर रहे है। इसकी शुरुआत होते ही ग्रामीणों से तीन से पांच रुपये किलो गोबर खरीदा जाएगा।
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