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एनजीटी, हाईकोर्ट बचा सकते बकस्वाहा
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बांदा। बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बकस्वाहा के जंगल के 2.15 लाख पेड़-पौधों की कटान पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पिछले माह रोक लगा दी थी। अब मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट ने जंगल में मौजूद दुर्लभ शैल चित्रों को बचाने का संज्ञान लिया है। जनहित याचिका में सुनवाई के बाद केंद्र और मध्यप्रदेश की सरकार से जवाब मांगा है।
बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान के लिए दिए जाने के बाद लगभग पूरे देश के पर्यावरण प्रेमी इसे मुद्दा बनाकर विभिन्न तरीकों से विरोध कर रहे हैं। पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन भी चल रहा, जिसमें प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के आदिवासी महिलाएं और बच्चे भी इस आंदोलन में शरीक हो रहे हैं, लेकिन फिलहाल मध्यप्रदेश की भाजपा की शिवराज सिंह की सरकार अपने निर्णय पर अटल नजर आ रही है। हाल ही में मध्यप्रदेश के खनिज मंत्री भी बकस्वाहा जंगल पहुंचे थे। उन्होंने इस योजना को रोजगार परक और क्षेत्र के लिए फायदेमंद करार दिया था।
उधर, दिल्ली निवासी पर्यावरण पैरोकार और अधिवक्ता डॉ. पीजी नाजपांडे ने एनजीटी में रिट दायर करके पेड़ कटने से होने वाले नुकसान का हवाला देकर हीरा खदान रोकने की मांग की थी। उनकी रिट पर एनजीटी ने 30 जून को अंतरिम आदेश जारी करके पेड़ों की कटान पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और मध्यप्रदेश सरकार को चार हफ्ते में अपना पक्ष दाखिल करने का आदेश दिया था। अब नाजपांडे की ही रिट पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने शैल चित्रों के मुद्दे पर केंद्र व मध्यप्रदेश की सरकार से रिपोर्ट तलब की है। (संवाद)
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ठेकेदारों को हरियाली नहीं हीरे चाहिए
बांदा। बुंदेलखंड के पर्यावरण पैरोकार आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि हीरा ठेकेदारों को बुंदेलखंड की तबाही से कोई लेना देना नहीं है। अमूल्य हरियाली को तहस-नहस करके करोड़ों रुपये की कमाई करना चाहते हैं। यहां पाए जाने वाले शैल चित्र कंदराओं में हैं। एनजीटी और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के रुख से बुंदेलखंड के पर्यावरण की हिफाजत होने के आसार हैं। (संवाद)
इंसेट---
संस्था दे रही स्वयं सेवियों को प्रशिक्षण
बांदा। बुंदेलखंड की परमार्थ समाज सेवी संस्था बकस्वाहा जंगल क्षेत्र के स्वयं सेवियों को प्रशिक्षण दे रही है। जंगल और पर्यावरण बचाए रखने के लिए इन स्वयं सेवियों ने शपथ भी ली है। कहा कि किसी कीमत पर पेड़ों को नहीं काटने देंगे। (संवाद)
इंसेट---
बकस्वाहा की जंग में सभी की भागीदारी
बांदा। बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन में पर्यावरण पैरोकारों के अलावा स्वयंसेवी और जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं। इसके अलावा मध्यप्रदेश के चार विधायक भी लिखित तौर इस योजना से असहमति जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से बकस्वाहा जंगल बचाने का अनुरोध भी कर चुके हैं। (संवाद)
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दुर्लभ प्रजाति के जानवर भी हैं जंगल में
बांदा। बकस्वाहा जंगल का सफाया हुआ तो पेड़-पौधे और दुर्लभ शैल चित्र ही नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों के आदिवासी और इस जंगल में रहने वाले दुर्लभ प्रजाति के तेंदुए, भालू, लकड़बग्घे, सोनकुत्ते आदि भी प्रभावित और बेघर हो जाएंगे। इसके अलावा इस क्षेत्र के आदिवासियाें की रोजी-रोटी जंगल की उपज पर ही निर्भर है। इससे ये भी प्रभावित होंगे। (संवाद)
इंसेट---
बकस्वाहा जंगल का ये है मुद्दा
बांदा। मध्य प्रदेश सरकार ने बकस्वाहा जंगल की 382.13 हेक्टेयर जमीन बिरला ग्रुप की माइनिंग कंपनी को पचास साल के पट्टे पर दे दिया है। मध्यप्रदेश सरकार को इस अवधि में कंपनी से अलग-अलग मदों में 23632.83 करोड़ रुपये मिलना बताया जा रहा है। इसके अलावा रायल्टी आदि से भी प्रतिवर्ष 472.65 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष मिलेंगे। इस जंगल में हीरा खनन के लिए जो पेड़ कटने हैं, उनकी संख्या दो लाख 15 हजार से अधिक बताई जा रही है। यहां 22 लाख कैरेट के हीरे मिलना भी बताया जा रहा है। (संवाद)
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बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान के लिए दिए जाने के बाद लगभग पूरे देश के पर्यावरण प्रेमी इसे मुद्दा बनाकर विभिन्न तरीकों से विरोध कर रहे हैं। पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन भी चल रहा, जिसमें प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के आदिवासी महिलाएं और बच्चे भी इस आंदोलन में शरीक हो रहे हैं, लेकिन फिलहाल मध्यप्रदेश की भाजपा की शिवराज सिंह की सरकार अपने निर्णय पर अटल नजर आ रही है। हाल ही में मध्यप्रदेश के खनिज मंत्री भी बकस्वाहा जंगल पहुंचे थे। उन्होंने इस योजना को रोजगार परक और क्षेत्र के लिए फायदेमंद करार दिया था।
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उधर, दिल्ली निवासी पर्यावरण पैरोकार और अधिवक्ता डॉ. पीजी नाजपांडे ने एनजीटी में रिट दायर करके पेड़ कटने से होने वाले नुकसान का हवाला देकर हीरा खदान रोकने की मांग की थी। उनकी रिट पर एनजीटी ने 30 जून को अंतरिम आदेश जारी करके पेड़ों की कटान पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और मध्यप्रदेश सरकार को चार हफ्ते में अपना पक्ष दाखिल करने का आदेश दिया था। अब नाजपांडे की ही रिट पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने शैल चित्रों के मुद्दे पर केंद्र व मध्यप्रदेश की सरकार से रिपोर्ट तलब की है। (संवाद)
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ठेकेदारों को हरियाली नहीं हीरे चाहिए
बांदा। बुंदेलखंड के पर्यावरण पैरोकार आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि हीरा ठेकेदारों को बुंदेलखंड की तबाही से कोई लेना देना नहीं है। अमूल्य हरियाली को तहस-नहस करके करोड़ों रुपये की कमाई करना चाहते हैं। यहां पाए जाने वाले शैल चित्र कंदराओं में हैं। एनजीटी और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के रुख से बुंदेलखंड के पर्यावरण की हिफाजत होने के आसार हैं। (संवाद)
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संस्था दे रही स्वयं सेवियों को प्रशिक्षण
बांदा। बुंदेलखंड की परमार्थ समाज सेवी संस्था बकस्वाहा जंगल क्षेत्र के स्वयं सेवियों को प्रशिक्षण दे रही है। जंगल और पर्यावरण बचाए रखने के लिए इन स्वयं सेवियों ने शपथ भी ली है। कहा कि किसी कीमत पर पेड़ों को नहीं काटने देंगे। (संवाद)
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बकस्वाहा की जंग में सभी की भागीदारी
बांदा। बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन में पर्यावरण पैरोकारों के अलावा स्वयंसेवी और जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं। इसके अलावा मध्यप्रदेश के चार विधायक भी लिखित तौर इस योजना से असहमति जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से बकस्वाहा जंगल बचाने का अनुरोध भी कर चुके हैं। (संवाद)
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दुर्लभ प्रजाति के जानवर भी हैं जंगल में
बांदा। बकस्वाहा जंगल का सफाया हुआ तो पेड़-पौधे और दुर्लभ शैल चित्र ही नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों के आदिवासी और इस जंगल में रहने वाले दुर्लभ प्रजाति के तेंदुए, भालू, लकड़बग्घे, सोनकुत्ते आदि भी प्रभावित और बेघर हो जाएंगे। इसके अलावा इस क्षेत्र के आदिवासियाें की रोजी-रोटी जंगल की उपज पर ही निर्भर है। इससे ये भी प्रभावित होंगे। (संवाद)
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बकस्वाहा जंगल का ये है मुद्दा
बांदा। मध्य प्रदेश सरकार ने बकस्वाहा जंगल की 382.13 हेक्टेयर जमीन बिरला ग्रुप की माइनिंग कंपनी को पचास साल के पट्टे पर दे दिया है। मध्यप्रदेश सरकार को इस अवधि में कंपनी से अलग-अलग मदों में 23632.83 करोड़ रुपये मिलना बताया जा रहा है। इसके अलावा रायल्टी आदि से भी प्रतिवर्ष 472.65 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष मिलेंगे। इस जंगल में हीरा खनन के लिए जो पेड़ कटने हैं, उनकी संख्या दो लाख 15 हजार से अधिक बताई जा रही है। यहां 22 लाख कैरेट के हीरे मिलना भी बताया जा रहा है। (संवाद)