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जैविक खेती कर बुंदेलखंड को बना रहीं सेहतमंद
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Making Bundelkhand healthy by doing organic farming
- फोटो : BANDA
बांदा। कुछ करने की चाहत हो तो असंभव काम भी संभव हो जाता है। ऐसा डिगवाही की स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने कर दिखाया। इन्होंने फार्म मशीनरी योजना के तहत ऋण में ट्रैक्टर व कृषि यंत्र लेकर जैविक खेती करने का काम शुरू किया। इनके द्वारा उत्पादित स्वादिष्ट अरहर दाल, मोटा अनाज (कठिया) बुंदेलियों की पसंद बना है।
बड़ोखर ब्लाक के डिगवाही गांव की आर्थिक रूप से कमजोर कमलेश ने वर्ष 2018 में दुर्गा सहायता समूह बनाकर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ गईं और जैविक खेती करने लगी। पहले हल-बैल से खेती करती थीं। 2020 में शासन ने ऋण में ट्रैक्टर और कृषि यंत्र थ्रेसर, हैप्पी सीडर आदि मुहैया कराए। कमलेश ने सचिव सुतकीर्ति, सावित्री, सरस्वती की मदद से जैविक खेती का वृहद रूप में काम शुरू किया।
पिछले साल इन्होंने 100 एकड़ जमीन पर जैविक अरहर दाल, कोदा, मोटा अनाज (कठिया गेहूं) की खेती की। अब यह बुंदेलियों की पहली पसंद बन गया है। कमलेश का कहना है कि मांग के अनुरूप वह अरहर व कठिया गेहूं की पूर्ति नहीं कर पा रही है।
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इस वर्ष उन्होंने 200 से 300 एकड़ में इसकी खेती करने का मन बनाया है। बताया कि जैविक खेती के कार्य में समूह व गांव की 12 से अधिक महिलाएं लगीं हैं। इससे वह साल में अच्छी आमदनी कर लेती है। इसके अलावा खाली खेतों में महिलाएं साग-सब्जी का उत्पादन करती हैं। प्रति महिला सब खर्च निकालने के बाद माह का पांच से छह हजार की कमाई करती हैं।
समूह की अध्यक्ष कमलेश का कहना है कि वह ट्रैक्टर को किराए पर चलाती हैं। इससे जो आमदनी होती है, उससे बैंक के ऋण की किस्त जमा करती हैं। खेती से जो उत्पादन होता है, उसका खर्च निकालकर समूह की महिलाएं आपस में बांट लेती है।
समूह की सदस्य विद्या व गीता ने इस 10 एकड़ में गुलाब के फूलों की खेती शुरू की है। हालांकि अभी गुलाब की कलमे लगाई गई है। विद्या का कहना है कि दो माह के बाद गुलाब के फूल उत्पादित होने लगेंगे। जिन्हें वह बुंदेलखंड के जनपद झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा, चित्रकूट में बिक्री कराएंगी।
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बड़ोखर ब्लाक के डिगवाही गांव की आर्थिक रूप से कमजोर कमलेश ने वर्ष 2018 में दुर्गा सहायता समूह बनाकर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ गईं और जैविक खेती करने लगी। पहले हल-बैल से खेती करती थीं। 2020 में शासन ने ऋण में ट्रैक्टर और कृषि यंत्र थ्रेसर, हैप्पी सीडर आदि मुहैया कराए। कमलेश ने सचिव सुतकीर्ति, सावित्री, सरस्वती की मदद से जैविक खेती का वृहद रूप में काम शुरू किया।
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पिछले साल इन्होंने 100 एकड़ जमीन पर जैविक अरहर दाल, कोदा, मोटा अनाज (कठिया गेहूं) की खेती की। अब यह बुंदेलियों की पहली पसंद बन गया है। कमलेश का कहना है कि मांग के अनुरूप वह अरहर व कठिया गेहूं की पूर्ति नहीं कर पा रही है।
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इस वर्ष उन्होंने 200 से 300 एकड़ में इसकी खेती करने का मन बनाया है। बताया कि जैविक खेती के कार्य में समूह व गांव की 12 से अधिक महिलाएं लगीं हैं। इससे वह साल में अच्छी आमदनी कर लेती है। इसके अलावा खाली खेतों में महिलाएं साग-सब्जी का उत्पादन करती हैं। प्रति महिला सब खर्च निकालने के बाद माह का पांच से छह हजार की कमाई करती हैं।
समूह की अध्यक्ष कमलेश का कहना है कि वह ट्रैक्टर को किराए पर चलाती हैं। इससे जो आमदनी होती है, उससे बैंक के ऋण की किस्त जमा करती हैं। खेती से जो उत्पादन होता है, उसका खर्च निकालकर समूह की महिलाएं आपस में बांट लेती है।
समूह की सदस्य विद्या व गीता ने इस 10 एकड़ में गुलाब के फूलों की खेती शुरू की है। हालांकि अभी गुलाब की कलमे लगाई गई है। विद्या का कहना है कि दो माह के बाद गुलाब के फूल उत्पादित होने लगेंगे। जिन्हें वह बुंदेलखंड के जनपद झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा, चित्रकूट में बिक्री कराएंगी।

Making Bundelkhand healthy by doing organic farming- फोटो : BANDA