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खंगाल रहे किसानों की खुदकुशी के राज
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Sat, 04 Jul 2015 10:16 PM IST
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बुंदेलखंड के किसानों की आत्महत्याएं अब कनाडा, गुवाहाटी और दिल्ली के विश्वविद्यालयों में शोध का विषय बनेंगी। यहां के आधा दर्जन शोधकर्ता छात्र-छात्राओं ने बुंदेलखंड के गांवों में डेरा डाल रखा है। शुरुआत बांदा जिले से की है। इस दल में सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर कार्यालय के कानूनी सलाहकार भी शामिल हैं।
अध्ययन टीम में शामिल छात्र-छात्राओं का कहना है कि रिपोर्ट तैयार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिट भी दायर करेंगे। इसमें किसान आयोग गठन की मांग की जाएगी। कई वर्षों से बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मीडिया के जरिए देश की सीमाएं लांघकर विदेशों तक पहुंच चुकी हैं।
लगातार हो रहीं आत्महत्याएं और असामयिक मौतों पर अब कनाडा की मैक्गिल यूनिवर्सिटी की विधि छात्रा मिस मेरी, कनाडा की संस्था फिनेक्स के सामाजिक कार्यकर्ता मिस्टर साइमन, टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस, गुवाहाटी की छात्रा दीपा सिन्हा, डा.राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय के विधि छात्र अनुराग भाष्कर व चंदन माहेश्वरी और जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली की छात्रा तूबा सुल्ताना सहित सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर कार्यालय, नई दिल्ली के कानूनी सलाहकार आदित्य श्रीवास्तव यहां पिछले कई दिनों से शोध कर रहे हैं।
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उनके साथ विद्या धाम समिति के मंत्री राजा भइया भी हैं। यह अध्ययन टीम अब तक बांदा जिले के लगभग 40 गांवों का भ्रमण कर चुकी है। आत्महत्याएं करने वाले या सदमे से मरे किसानों के घर जाकर अध्ययन दल के सदस्य उनके परिजनों से देर तक बतिया कर मृतक के घर के हालात का जायजा लेते हैं। टीम के साथ चल रहे राजा भइया ने बताया कि अब तक बांदा जिले के 84 मृतक किसानों की सूची अध्ययन दल ने तैयार की है।
साथ ही ‘अमर उजाला’ व कुछ अन्य अखबारों में छपी खबरों की कतरने भी हासिल की हैं। टीम के सदस्य अनुराग भाष्कर (लोहिया विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने बताया कि इसी माह रिपोर्ट तैयार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिट (पीआईएल) दायर करके मांग की जाएगी कि किसान आयोग का गठन किया जाए, ताकि किसान अपनी परेशानी और बात सीधे कह सकें। साथ ही किसानों को मुआवजा भी दिलाए जाने की पैरवी की जाएगी।
‘निराश होकर चुन रहे मौत’
बुंदेलखंड में हो रहे क्लाइमेट चेंज, फसल का फेल्योरियर, बैंकों व साहूकारों का कर्ज, सरकारी योजनाओं का खराब क्रियान्वयन आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनसे बुंदेलखंड के किसान निराश होकर मौत का रास्ता चुन रहे हैं।
-मिस मेरी (विधि छात्रा), मैक्गिल यूनिवर्सिटी, कनाडा
‘मदद में भी हुआ भेदभाव’
आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को जो भी सरकारी मदद पहुंचाई गई है उसमें भेदभाव की बात भी सामने आई है। हमारे अध्ययन के दौरान कई ऐसे परिवार मिले हैं जिनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है। उनको किसी प्रकार की सहायता नहीं दी गई। पतवन गांव के किसान शिवगोपाल ने 2 मई को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उस पर इलाहाबाद बैंक का 3 लाख रुपये कर्ज था। सात बीघा जमीन गिरवी रखी है। खेत की फसल नष्ट हो चुकी थी। वह लगातार अपनी परेशानी बताता रहा, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।
-दीपा सिन्हा (छात्रा), टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस, गुवाहाटी गौहाटी
‘हैरत होती है ऐसे हालात देखकर’
आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार अभी भी बदहाल हैं। कई के घरों में तो फाकाकशी की नौबत है। नांदादेव के किसान सिद्धगोपाल ने आत्मदाह कर लिया था। अब उसका परिवार भुखमरी की कगार पर है। परिवार का बीपीएल राशनकार्ड भी नहीं बना। किसी तरह की मदद इस परिवार को नहीं मिली। हैरत होती है ऐसे हालात देखकर। -अनुराग भाष्कर (विधि छात्र), डा.राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
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अध्ययन टीम में शामिल छात्र-छात्राओं का कहना है कि रिपोर्ट तैयार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिट भी दायर करेंगे। इसमें किसान आयोग गठन की मांग की जाएगी। कई वर्षों से बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मीडिया के जरिए देश की सीमाएं लांघकर विदेशों तक पहुंच चुकी हैं।
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लगातार हो रहीं आत्महत्याएं और असामयिक मौतों पर अब कनाडा की मैक्गिल यूनिवर्सिटी की विधि छात्रा मिस मेरी, कनाडा की संस्था फिनेक्स के सामाजिक कार्यकर्ता मिस्टर साइमन, टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस, गुवाहाटी की छात्रा दीपा सिन्हा, डा.राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय के विधि छात्र अनुराग भाष्कर व चंदन माहेश्वरी और जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली की छात्रा तूबा सुल्ताना सहित सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर कार्यालय, नई दिल्ली के कानूनी सलाहकार आदित्य श्रीवास्तव यहां पिछले कई दिनों से शोध कर रहे हैं।
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उनके साथ विद्या धाम समिति के मंत्री राजा भइया भी हैं। यह अध्ययन टीम अब तक बांदा जिले के लगभग 40 गांवों का भ्रमण कर चुकी है। आत्महत्याएं करने वाले या सदमे से मरे किसानों के घर जाकर अध्ययन दल के सदस्य उनके परिजनों से देर तक बतिया कर मृतक के घर के हालात का जायजा लेते हैं। टीम के साथ चल रहे राजा भइया ने बताया कि अब तक बांदा जिले के 84 मृतक किसानों की सूची अध्ययन दल ने तैयार की है।
साथ ही ‘अमर उजाला’ व कुछ अन्य अखबारों में छपी खबरों की कतरने भी हासिल की हैं। टीम के सदस्य अनुराग भाष्कर (लोहिया विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने बताया कि इसी माह रिपोर्ट तैयार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रिट (पीआईएल) दायर करके मांग की जाएगी कि किसान आयोग का गठन किया जाए, ताकि किसान अपनी परेशानी और बात सीधे कह सकें। साथ ही किसानों को मुआवजा भी दिलाए जाने की पैरवी की जाएगी।
‘निराश होकर चुन रहे मौत’
बुंदेलखंड में हो रहे क्लाइमेट चेंज, फसल का फेल्योरियर, बैंकों व साहूकारों का कर्ज, सरकारी योजनाओं का खराब क्रियान्वयन आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनसे बुंदेलखंड के किसान निराश होकर मौत का रास्ता चुन रहे हैं।
-मिस मेरी (विधि छात्रा), मैक्गिल यूनिवर्सिटी, कनाडा
‘मदद में भी हुआ भेदभाव’
आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को जो भी सरकारी मदद पहुंचाई गई है उसमें भेदभाव की बात भी सामने आई है। हमारे अध्ययन के दौरान कई ऐसे परिवार मिले हैं जिनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है। उनको किसी प्रकार की सहायता नहीं दी गई। पतवन गांव के किसान शिवगोपाल ने 2 मई को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उस पर इलाहाबाद बैंक का 3 लाख रुपये कर्ज था। सात बीघा जमीन गिरवी रखी है। खेत की फसल नष्ट हो चुकी थी। वह लगातार अपनी परेशानी बताता रहा, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।
-दीपा सिन्हा (छात्रा), टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस, गुवाहाटी गौहाटी
‘हैरत होती है ऐसे हालात देखकर’
आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार अभी भी बदहाल हैं। कई के घरों में तो फाकाकशी की नौबत है। नांदादेव के किसान सिद्धगोपाल ने आत्मदाह कर लिया था। अब उसका परिवार भुखमरी की कगार पर है। परिवार का बीपीएल राशनकार्ड भी नहीं बना। किसी तरह की मदद इस परिवार को नहीं मिली। हैरत होती है ऐसे हालात देखकर। -अनुराग भाष्कर (विधि छात्र), डा.राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय, नई दिल्ली