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प्रदूषण फैलाने वाले 154 क्रेशरों पर ताले
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Locks on 154 polluting crushers
- फोटो : BANDA
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बांदा। चित्रकूटधाम मंडल में रात-दिन पहाड़ों की चट्टानों को तोड़कर गिट्टी बना रहे क्रेशरों की धुंध से फैलते प्रदूषण पर छह माह के दौरान उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चारों जनपदों बांदा, महोबा, चित्रकूट और हमीरपुर के 154 क्रेशरों के संचालन पर रोक तो लगा दी, लेकिन अभी भी प्रदूषण का स्तर कम नहीं हो रहा है।
जिन क्रेशरों पर प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने रोक लगाई है, वह सभी वायु प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाएं करने में नाकाम रहे। मंडल में कुल 380 क्रेशर हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इनमें से 226 को क्लीन चिट भी दी है। बुंदेलखंड की खनिज उद्योग में बालू के बाद क्रेशर ही महत्वपूर्ण उद्योग है। हर वर्ष खनिज विभाग को इनसे कई करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है। मंडल के चारों जिलों में सबसे ज्यादा 283 क्रेशर महोबा में हैं। चित्रकूट में 75, बांदा में 17 और हमीरपुर में पांच क्रेशर बताए गए हैं। क्रेशरों की मशीन से बड़ी मात्रा में धूल उड़ती है। यह काफी दूर तक पर्यावरण प्रदूषित करती है।
आसपास के लोगों को प्रदूषण से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मानक और नियम तय कर रखे हैं, लेकिन अधिकांश क्रेशरों में इनका पालन नहीं हो रहा। जन सूचना अधिकार अधिनियम में समाजसेवी कुलदीप शुक्ला द्वारा मांगी गई सूचना में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी घनश्याम द्वारा दी गई सूचना में बताया गया कि चारों जिलों में 154 क्रेशर बंद हैं। वायु प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था न कर पाने से इनके संचालन पर रोक है। महोबा में 81, चित्रकूट में 55, बांदा में 13 क्रेशर बंद हैं। हमीरपुर में सभी पांच क्रेशर बंद हैं।
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चित्रकूटधाम मंडल में चालू और बंद क्रेशरों का ब्योरा---
जनपद कुल क्रेशर चालू बंद
महोबा 283 202 81
चित्रकूट 75 20 55
बांदा 17 4 13
हमीरपुर 5 0 5
योग- 380 226 154
क्रेशर के मानक और शर्तें
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बताए गए मानक/गाइडलाइन के अनुसार, स्टोन क्रेशर हाईवे से 500 मीटर दूर होने चाहिए। आबादी और सार्वजनिक स्थल से इनकी दूरी का मानक एक किलोमीटर है। अन्य शर्तों में क्रेशर टिनशेड से कवर्ड हो, पानी की टंकी तथा प्रतिदिन फव्वारे से आसपास छिड़काव, ग्रीन लैंड, 10 फीट ऊंची बाउंड्रीवाल, क्रेशर के अंदर पक्की सड़क आदि शामिल हैं। मशीन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी मिलने पर ही क्रेशर संचालित हो सकते हैं।
300 मीटर दायरे में उड़ती है धूल
आसपास लगभग 300 मीटर दायरे में क्रेशर की धूल पहुंचती है। यह धूल आम आदमी के फेफड़ों समेत शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाती है। आसपास के खेतों की भूमि और फसलें खराब होती हैं। बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा क्रेशर महोबा जनपद में है। यहां डहर्रा, पचपहरा, पथरा आदि गांवों में इनकी भरमार है। कबरई में नेशनल हाईवे से कुछ दूरी पर कई क्रेशर हैं। आसपास के ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ में चट्टान तोड़ने के लिए किए जाने वाले विस्फोट से अक्सर पत्थर के भारी भरकम टुकड़े दूर उछलकर उनके घरों और खेतों में गिरते हैं। कई बार इनसे मौतें भी हुई हैं।
फोटो परिचय-11-कुलदीप शुक्ला।
प्राणों से ज्यादा राजस्व की लालच
मंडल में अंधाधुंध नदियों और पहाड़ों के खनन से बुंदेलखंड में पर्यावरण का संकट लगातार बढ़ रहा है। प्रदेश सरकार को लाखों नागरिकों की सेहत और प्राणों से ज्यादा शायद करोड़ों रुपये मिलने वाला राजस्व महत्वपूर्ण है। स्थिति यह है कि ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का नामोनिशान मिटने के बाद उनके नीचे पाताल तक खनन किया जा रहा है। इस पर तत्काल रोक लगाई जाना चाहिए।
- कुलदीप शुक्ल, आरटीआई एक्टिविस्ट
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जिन क्रेशरों पर प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने रोक लगाई है, वह सभी वायु प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाएं करने में नाकाम रहे। मंडल में कुल 380 क्रेशर हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इनमें से 226 को क्लीन चिट भी दी है। बुंदेलखंड की खनिज उद्योग में बालू के बाद क्रेशर ही महत्वपूर्ण उद्योग है। हर वर्ष खनिज विभाग को इनसे कई करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है। मंडल के चारों जिलों में सबसे ज्यादा 283 क्रेशर महोबा में हैं। चित्रकूट में 75, बांदा में 17 और हमीरपुर में पांच क्रेशर बताए गए हैं। क्रेशरों की मशीन से बड़ी मात्रा में धूल उड़ती है। यह काफी दूर तक पर्यावरण प्रदूषित करती है।
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आसपास के लोगों को प्रदूषण से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मानक और नियम तय कर रखे हैं, लेकिन अधिकांश क्रेशरों में इनका पालन नहीं हो रहा। जन सूचना अधिकार अधिनियम में समाजसेवी कुलदीप शुक्ला द्वारा मांगी गई सूचना में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी घनश्याम द्वारा दी गई सूचना में बताया गया कि चारों जिलों में 154 क्रेशर बंद हैं। वायु प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था न कर पाने से इनके संचालन पर रोक है। महोबा में 81, चित्रकूट में 55, बांदा में 13 क्रेशर बंद हैं। हमीरपुर में सभी पांच क्रेशर बंद हैं।
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चित्रकूटधाम मंडल में चालू और बंद क्रेशरों का ब्योरा---
जनपद कुल क्रेशर चालू बंद
महोबा 283 202 81
चित्रकूट 75 20 55
बांदा 17 4 13
हमीरपुर 5 0 5
योग- 380 226 154
क्रेशर के मानक और शर्तें
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बताए गए मानक/गाइडलाइन के अनुसार, स्टोन क्रेशर हाईवे से 500 मीटर दूर होने चाहिए। आबादी और सार्वजनिक स्थल से इनकी दूरी का मानक एक किलोमीटर है। अन्य शर्तों में क्रेशर टिनशेड से कवर्ड हो, पानी की टंकी तथा प्रतिदिन फव्वारे से आसपास छिड़काव, ग्रीन लैंड, 10 फीट ऊंची बाउंड्रीवाल, क्रेशर के अंदर पक्की सड़क आदि शामिल हैं। मशीन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी मिलने पर ही क्रेशर संचालित हो सकते हैं।
300 मीटर दायरे में उड़ती है धूल
आसपास लगभग 300 मीटर दायरे में क्रेशर की धूल पहुंचती है। यह धूल आम आदमी के फेफड़ों समेत शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाती है। आसपास के खेतों की भूमि और फसलें खराब होती हैं। बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा क्रेशर महोबा जनपद में है। यहां डहर्रा, पचपहरा, पथरा आदि गांवों में इनकी भरमार है। कबरई में नेशनल हाईवे से कुछ दूरी पर कई क्रेशर हैं। आसपास के ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ में चट्टान तोड़ने के लिए किए जाने वाले विस्फोट से अक्सर पत्थर के भारी भरकम टुकड़े दूर उछलकर उनके घरों और खेतों में गिरते हैं। कई बार इनसे मौतें भी हुई हैं।
फोटो परिचय-11-कुलदीप शुक्ला।
प्राणों से ज्यादा राजस्व की लालच
मंडल में अंधाधुंध नदियों और पहाड़ों के खनन से बुंदेलखंड में पर्यावरण का संकट लगातार बढ़ रहा है। प्रदेश सरकार को लाखों नागरिकों की सेहत और प्राणों से ज्यादा शायद करोड़ों रुपये मिलने वाला राजस्व महत्वपूर्ण है। स्थिति यह है कि ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का नामोनिशान मिटने के बाद उनके नीचे पाताल तक खनन किया जा रहा है। इस पर तत्काल रोक लगाई जाना चाहिए।
- कुलदीप शुक्ल, आरटीआई एक्टिविस्ट