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सूखा झेलेंगे, हार मानकर जान नहीं देंगे
Updated Thu, 28 Apr 2016 11:29 PM IST
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स्वामीदीन के घर में खड़ा ट्रैक्टर और थ्रेसर।
- फोटो : चंद्रभान यादव
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बांदा। सूखे-भूखे बुंदेलखंड के किसानों को महीनों की मेहनत के बाद छटांक भर दाना मिला है। जिस खेत से क्विंटल के हिसाब से उपज होती थी, उसमें इस बार पांच से 10 किलो अनाज पैदा हुआ है। हालात ऐसे रहे कि ज्यादातर किसानों को ट्रैक्टर और थ्रेसर बाहर निकालने की नौबत ही नहीं आई। फिर भी उनके हौसले नहीं टूटे। वे आत्महत्या करने वालों को धिक्कारते हैं। कहते हैं कि संघर्ष करना ही किसान का धर्म है।
चित्रकूटधाम मंडल में रबी सीजन में इस बार गेहूं बुवाई का लक्ष्य 391233 हेक्टेयर रखा गया था लेकिन बारिश नहीं होने से 40 फीसदी बुवाई हुई। महोबा में लक्ष्य के सापेक्ष सबसे कम 14 फीसदी तो हमीरपुर में 55 फीसदी बुवाई हुई। सरकारी आंकड़े से इतर किसानों की मानें तो मात्र 10 से 12 फीसदी ही बुवाई हो पाई।
करीब चार माह की मेहनत के बाद किसानों ने जब मड़ाई की तो सन्न रह गए। किसी के खेत में दो किलो बिस्वा तो किसी के खेत में पांच किलो बिस्वा की उपज हुई है। इस वजह से तमाम किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन इनके बीच कुछ ऐसे भी किसान हैं, जो आत्महत्या करने वालों को धिक्कार रहे हैं और हिम्मत नहीं हारे हैं।
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केस- 1
बांदा। मध्य प्रदेश की सीमा पर केन नदी के किनारे बसे बिल्हरका गांव में नहर भी है। इसके बाद भी यहां खेत खाली हैं। गांव में प्रवेश करते ही किसान गेंदा सिंह फसल की मड़ाई के बाद परिवार के साथ ओसाई करते नजर आते हैं। उनके साथ पत्नी और बच्चे भी लगे हैं।
अपनी धुन में मस्त गेंदालाल खेती के बारे में पूछने पर बात टालने की बार-बार कोशिश करते हैं। काफी कुरेदने पर कहते हैं कि खेती ही किसान का ओढ़ना, बिछौना है। खेती छोड़कर किसान कहां जाएगा। फिर कहते हैं किसी तरह 20 बीघे में गेहूं और दो बीघे में सरसों की बुवाई हुई।
चार माह के इंतजार के बाद मड़ाई की तो सन्न रह गए। 20 बीघे फसल से सिर्फ तीन क्विंटल गेहूं पैदा हुआ है। सरसों सिर्फ 50 किलो मिली है। गेंदा लाल उपज से बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला कराना चाहते थे लेकिन कम पैदावार ने उनका सपना तोड़ दिया। वह दुखी हैं। फिर भी आत्महत्या करने वाले किसानों को धिक्कारते हैं। कहते हैं कि जब तक जान है संघर्ष करेंगे।
केस- 2
बांदा। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के भवानीपुर गांव के किसान स्वामीदीन भी हिम्मत नहीं हारे हैं। करतल बाजार से आगे बढ़ने पर बांदा- छतरपुर मुख्य मार्ग से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित है भवानीपुर गांव। गांव में प्रवेश करते ही स्वामीदीन का घर है।
घर के सामने कुआं हैं, जो पूरी तरह सूख गया है। दो भैंस औने-पौने दाम पर बेच चुके हैं। दो भैंस और एक पड़िया बची है। घर में ट्रैक्टर है और ट्रैक्टर से ताले में बंद थ्रेसर। थ्रेसर में लगा ताला इस बात की गवाही दे रहा है कि पिछली गर्मी के बाद खेत में ट्रैक्टर नहीं घुसा है।
पूछने पर बताते हैं कि दो भाइयों के बीच 20 बीघा खेत हैं, जो इस बार परती रह गए। खाने के इंतजाम के सवाल पर मुस्कुराते हैं। खुद ही सवाल करते हैं कि क्या आत्महत्या कर लें? फिर कहते हैं कि भूखे मर जाएंगे लेकिन आत्महत्या नहीं करेंगे।
आत्महत्या कमजोर लोग करते हैं। सरकार की ओर से मदद के सवाल पर कहते हैं कि यूपी सरकार तो अपने लोगों को कुछ दे रही है, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने मुंह उठा कर देखा तक नहीं। फिलहाल इस इलाके के ज्यादातर खेतों में बुवाई नहीं हुई है और अब धूल उड़ रही है।
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चित्रकूटधाम मंडल में रबी सीजन में इस बार गेहूं बुवाई का लक्ष्य 391233 हेक्टेयर रखा गया था लेकिन बारिश नहीं होने से 40 फीसदी बुवाई हुई। महोबा में लक्ष्य के सापेक्ष सबसे कम 14 फीसदी तो हमीरपुर में 55 फीसदी बुवाई हुई। सरकारी आंकड़े से इतर किसानों की मानें तो मात्र 10 से 12 फीसदी ही बुवाई हो पाई।
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करीब चार माह की मेहनत के बाद किसानों ने जब मड़ाई की तो सन्न रह गए। किसी के खेत में दो किलो बिस्वा तो किसी के खेत में पांच किलो बिस्वा की उपज हुई है। इस वजह से तमाम किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन इनके बीच कुछ ऐसे भी किसान हैं, जो आत्महत्या करने वालों को धिक्कार रहे हैं और हिम्मत नहीं हारे हैं।
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केस- 1
बांदा। मध्य प्रदेश की सीमा पर केन नदी के किनारे बसे बिल्हरका गांव में नहर भी है। इसके बाद भी यहां खेत खाली हैं। गांव में प्रवेश करते ही किसान गेंदा सिंह फसल की मड़ाई के बाद परिवार के साथ ओसाई करते नजर आते हैं। उनके साथ पत्नी और बच्चे भी लगे हैं।
अपनी धुन में मस्त गेंदालाल खेती के बारे में पूछने पर बात टालने की बार-बार कोशिश करते हैं। काफी कुरेदने पर कहते हैं कि खेती ही किसान का ओढ़ना, बिछौना है। खेती छोड़कर किसान कहां जाएगा। फिर कहते हैं किसी तरह 20 बीघे में गेहूं और दो बीघे में सरसों की बुवाई हुई।
चार माह के इंतजार के बाद मड़ाई की तो सन्न रह गए। 20 बीघे फसल से सिर्फ तीन क्विंटल गेहूं पैदा हुआ है। सरसों सिर्फ 50 किलो मिली है। गेंदा लाल उपज से बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला कराना चाहते थे लेकिन कम पैदावार ने उनका सपना तोड़ दिया। वह दुखी हैं। फिर भी आत्महत्या करने वाले किसानों को धिक्कारते हैं। कहते हैं कि जब तक जान है संघर्ष करेंगे।
केस- 2
बांदा। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के भवानीपुर गांव के किसान स्वामीदीन भी हिम्मत नहीं हारे हैं। करतल बाजार से आगे बढ़ने पर बांदा- छतरपुर मुख्य मार्ग से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित है भवानीपुर गांव। गांव में प्रवेश करते ही स्वामीदीन का घर है।
घर के सामने कुआं हैं, जो पूरी तरह सूख गया है। दो भैंस औने-पौने दाम पर बेच चुके हैं। दो भैंस और एक पड़िया बची है। घर में ट्रैक्टर है और ट्रैक्टर से ताले में बंद थ्रेसर। थ्रेसर में लगा ताला इस बात की गवाही दे रहा है कि पिछली गर्मी के बाद खेत में ट्रैक्टर नहीं घुसा है।
पूछने पर बताते हैं कि दो भाइयों के बीच 20 बीघा खेत हैं, जो इस बार परती रह गए। खाने के इंतजाम के सवाल पर मुस्कुराते हैं। खुद ही सवाल करते हैं कि क्या आत्महत्या कर लें? फिर कहते हैं कि भूखे मर जाएंगे लेकिन आत्महत्या नहीं करेंगे।
आत्महत्या कमजोर लोग करते हैं। सरकार की ओर से मदद के सवाल पर कहते हैं कि यूपी सरकार तो अपने लोगों को कुछ दे रही है, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने मुंह उठा कर देखा तक नहीं। फिलहाल इस इलाके के ज्यादातर खेतों में बुवाई नहीं हुई है और अब धूल उड़ रही है।