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प्याज संवारेगा सूखे बुंदेलखंड की किस्मत
ब्यूरो/अमर उजाला,बांदा
Updated Thu, 25 Feb 2016 11:45 PM IST
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बांदा। सूखे जैसे कठिन हालात से बुंदेलखंड न केवल लड़
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रहा है, इससे उबरने की जीतोड़ कोशिश भी हो रही है। इन्हीं कोशिशों से फूटी
है उम्मीद की किरण। कृषि विश्वविद्यालय ने प्याज पर शोध किया है।
अगर सब ठीक रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बुंदेलखंड में खरीफ के सीजन में भी प्याज की फसल लहलहाकर किसानों की किस्मत संवार देगी।
शोध में बुंदेलखंड की धरती और जलवायु दोनों ही प्याज की खेती के लिए बहुत ही मुफीद पाई गई हैं। पहले शोध में मिली सफलता से उत्साहित विश्वविद्यालय यहां के किसानों को प्याज और लहसुन की खेती के लिए प्रेरित भी कर रहा है।
बुंदेलखंड में प्याज की खपत काफी है किंतु यहां प्याज की खेती न के बराबर होती है। ऐसे में यहां के कृषि विश्वविद्यालय ने अपना पहला रुख प्याज की खेती पर किया है।
मंशा है कि नासिक की तर्ज पर यहां भी प्याज की पैदावार हो। विश्वविद्यालय में उद्यान विभाग के सह अधिष्ठाता डॉ. सत्यव्रत द्विवेदी का कहना है कि बुंदेलखंड की जमीन लहसुन, प्याज की खेती के लिए अनुकूल है।
इसका भरपूर सदुपयोग किया जाए तो प्याज की खेती में नासिक भी पिछड़ जाएगा। विश्वविद्यालय ने खरीफ सीजन में प्याज का शोध किया है। आधा बीघा जमीन मेें एग्री फाउंड डार्करेड प्रजाति का प्याज जुलाई में बोया गया था। दिसंबर मेें फसल तैयार हो गई। पैदावार भी जोरदार रही।
विश्वविद्यालय से मिलेगा बीज
बांदा। कृषि विश्वविद्यालय ने खरीफ सीजन में जो प्याज की फसल उगाई है, उसका बीज राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान विकास संस्थान, नासिक और कानपुर में मिलता है।
विश्वविद्यालय के सह अधिष्ठाता डॉ. सत्यव्रत का कहना है कि किसान यदि यह बीज चाहेंगे तो उन्हें विश्वविद्यालय से उपलब्ध कराया जाएगा। यहां कैंप लगाकर किसानों को कुछ कीमत पर बीज दिए जाएंगे। इस प्याज की नर्सरी जुलाई-अगस्त में तैयार होती है।
एक सप्ताह में खरपतवार से बचाने के लिए पैंडीपाथालीन का छिड़काव किया जाता है। सात-आठ हफ्ते बाद रोपाई और निराई करनी होगी। एक बीघा के लिए लगभग तीन किलो बीज लगेगा।
एक बीघा में फसल की लागत लगभग 10 हजार रुपये आएगी। उत्पादन 50 से 60 क्विंटल होगा। दिसंबर में प्याज तैयार हो जाएगा। इन दिनों बाजार में भाव भी अच्छा मिलेगा। प्याज के लिए खेत ढलवा होना चाहिए, ताकि पानी बहकर निकल जाए।
तकनीक सीखने लगे किसान
बांदा। विश्वविद्यालय निदेशक डॉ. आनंद किशोर वाजपेई बताते हैं कि किसान प्रतिदिन यहां आकर फसलों के बारे में जानकारी हासिल कर रहे हैं।
उनको बताया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन पर कौन सी खेती फायदेमंद होगी? मिट्टी के आधार पर खेती की जानकारी दी जा रही है। किसानों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ रही है।
हल्की बारिश ही पर्याप्त, ‘सल्फर‘ सोने पे सुहागा
बांदा। बुंदेलखंड में पानी की कमी प्याज की फसल में आड़े नहीं आएगी। साथ ही यहां की मिट्टी में सल्फर की अधिकता भी इस फसल के लिए ‘सोने पे सुहागा’ है।
कृषि विश्वविद्यालय में उद्यान विभाग के सह अधिष्ठाता डॉ.सत्यव्रत द्विवेदी का कहना है कि बारिश का पानी ही प्याज की खेती के लिए पर्याप्त है। अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की भूमि में सल्फर की मात्रा ‘हाई’ है। नासिक मेें भी इतनी नहीं है। नासिक के प्याज का भंडारण किए जाने पर 15-20 दिन में ही अंकुर फूट आते हैं लेकिन बुंदेलखंड में पैदा होने वाले प्याज को पांच-छह महीने तक रखा जा सकेगा।
अगर सब ठीक रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बुंदेलखंड में खरीफ के सीजन में भी प्याज की फसल लहलहाकर किसानों की किस्मत संवार देगी।
शोध में बुंदेलखंड की धरती और जलवायु दोनों ही प्याज की खेती के लिए बहुत ही मुफीद पाई गई हैं। पहले शोध में मिली सफलता से उत्साहित विश्वविद्यालय यहां के किसानों को प्याज और लहसुन की खेती के लिए प्रेरित भी कर रहा है।
बुंदेलखंड में प्याज की खपत काफी है किंतु यहां प्याज की खेती न के बराबर होती है। ऐसे में यहां के कृषि विश्वविद्यालय ने अपना पहला रुख प्याज की खेती पर किया है।
मंशा है कि नासिक की तर्ज पर यहां भी प्याज की पैदावार हो। विश्वविद्यालय में उद्यान विभाग के सह अधिष्ठाता डॉ. सत्यव्रत द्विवेदी का कहना है कि बुंदेलखंड की जमीन लहसुन, प्याज की खेती के लिए अनुकूल है।
इसका भरपूर सदुपयोग किया जाए तो प्याज की खेती में नासिक भी पिछड़ जाएगा। विश्वविद्यालय ने खरीफ सीजन में प्याज का शोध किया है। आधा बीघा जमीन मेें एग्री फाउंड डार्करेड प्रजाति का प्याज जुलाई में बोया गया था। दिसंबर मेें फसल तैयार हो गई। पैदावार भी जोरदार रही।
विश्वविद्यालय से मिलेगा बीज
बांदा। कृषि विश्वविद्यालय ने खरीफ सीजन में जो प्याज की फसल उगाई है, उसका बीज राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान विकास संस्थान, नासिक और कानपुर में मिलता है।
विश्वविद्यालय के सह अधिष्ठाता डॉ. सत्यव्रत का कहना है कि किसान यदि यह बीज चाहेंगे तो उन्हें विश्वविद्यालय से उपलब्ध कराया जाएगा। यहां कैंप लगाकर किसानों को कुछ कीमत पर बीज दिए जाएंगे। इस प्याज की नर्सरी जुलाई-अगस्त में तैयार होती है।
एक सप्ताह में खरपतवार से बचाने के लिए पैंडीपाथालीन का छिड़काव किया जाता है। सात-आठ हफ्ते बाद रोपाई और निराई करनी होगी। एक बीघा के लिए लगभग तीन किलो बीज लगेगा।
एक बीघा में फसल की लागत लगभग 10 हजार रुपये आएगी। उत्पादन 50 से 60 क्विंटल होगा। दिसंबर में प्याज तैयार हो जाएगा। इन दिनों बाजार में भाव भी अच्छा मिलेगा। प्याज के लिए खेत ढलवा होना चाहिए, ताकि पानी बहकर निकल जाए।
तकनीक सीखने लगे किसान
बांदा। विश्वविद्यालय निदेशक डॉ. आनंद किशोर वाजपेई बताते हैं कि किसान प्रतिदिन यहां आकर फसलों के बारे में जानकारी हासिल कर रहे हैं।
उनको बताया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन पर कौन सी खेती फायदेमंद होगी? मिट्टी के आधार पर खेती की जानकारी दी जा रही है। किसानों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ रही है।
हल्की बारिश ही पर्याप्त, ‘सल्फर‘ सोने पे सुहागा
बांदा। बुंदेलखंड में पानी की कमी प्याज की फसल में आड़े नहीं आएगी। साथ ही यहां की मिट्टी में सल्फर की अधिकता भी इस फसल के लिए ‘सोने पे सुहागा’ है।
कृषि विश्वविद्यालय में उद्यान विभाग के सह अधिष्ठाता डॉ.सत्यव्रत द्विवेदी का कहना है कि बारिश का पानी ही प्याज की खेती के लिए पर्याप्त है। अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की भूमि में सल्फर की मात्रा ‘हाई’ है। नासिक मेें भी इतनी नहीं है। नासिक के प्याज का भंडारण किए जाने पर 15-20 दिन में ही अंकुर फूट आते हैं लेकिन बुंदेलखंड में पैदा होने वाले प्याज को पांच-छह महीने तक रखा जा सकेगा।