{"_id":"62d992ed7246da24c41fb1b1","slug":"banda-foreign-farmers-are-learning-natural-farming-in-bundelkhand-new-hope-among-bundeli-farmers-due-to-the-decision-of-cabinet-experienced-farmers-counted-the-benefits-of-natural-farming-banda-news-knp7087821158","type":"story","status":"publish","title_hn":"बांदा : विदेशी किसान बुंदेलखंड में सीख रहे प्राकृतिक खेती, कैबिनेट के फैसले से बुंदेली किसानों में नई आस, अनुभवी किसानों ने गिनाए प्राकृतिक खेती के फायदे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बांदा : विदेशी किसान बुंदेलखंड में सीख रहे प्राकृतिक खेती, कैबिनेट के फैसले से बुंदेली किसानों में नई आस, अनुभवी किसानों ने गिनाए प्राकृतिक खेती के फायदे
विज्ञापन
बांदा। बुंदेलखंड के मशहूर प्रगतिशील किसान और उत्तर प्रदेश किसान समृद्धि आयोग सदस्य प्रेम सिंह (बड़ोखर खुर्द) का कहना है कि बुंदेलखंड के सातों जनपदों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का प्रदेश मंत्रिमंडल का फैसला यहां के किसानों के लिए अच्छी खबर है। प्रदेश सरकार ने फिलहाल इसके लिए 68.83 करोड़ का खर्च तय किया है।
बुंदेलखंड के किसान प्रेम सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती से मुंह मोड़ना बुंदेली किसानों को महंगा पड़ा। अब शायद सरकार की यह पहल इस प्राचीन परंपरा को अमल में लाने में कारगर हो सके। उन्होंने कहा कि भारत की प्राकृतिक खेती से विदेशी किसान प्रेरणा ले रहे हैं। पिछले वर्षों में कई देशों के प्रगतिशील किसान बुंदेलखंड आकर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण भी ले चुके हैं। यह सिलसिला अभी भी जारी है। प्राकृतिक खेती में पानी की कम जरूरत पड़ेगी। पैदावार अच्छी होगी। किसानों और खेतिहर मजदूरों को खेत में ही रोजगार मिलेगा। काम की तलाश में महानगरों के लिए बुंदेलखंड से बड़ी संख्या में हो रहा पलायन घटेगा। अन्ना प्रथा पर भी लगाम लगेगी। इन किसानों की दलील है कि खेती में प्राकृतिक तौर तरीके अपनाए जाएंगे तो सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि आपदाओं में कमी आएगी। खेती की लागत घटेगी। अनाज में पौष्टिकता बढ़ेगी।
बुंदेलखंड की प्राचीन पद्धति है प्राकृतिक खेती
बांदा। बुंदेलखंड में प्राकृतिक खेती प्राचीन पद्धति रही है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बरकरार रखती है। खेती की इस पद्धति में रासायनिक पदार्थों और कीटनाशकों आदि का उपयोग नहीं किया जाता। खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते हैं, उन्हीं को कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता है। कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कंपोस्ट, जीवाणु खाद, फसलों के अवशेष और कुदरती तौर जमीन में उपलब्ध खनिज जैसे रॉक फास्फेट व जिप्सम आदि के जरिये पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। यह फसलों को हानिकारक जीवाणुओं से बचाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
बुंदेलखंड के किसान प्रेम सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती से मुंह मोड़ना बुंदेली किसानों को महंगा पड़ा। अब शायद सरकार की यह पहल इस प्राचीन परंपरा को अमल में लाने में कारगर हो सके। उन्होंने कहा कि भारत की प्राकृतिक खेती से विदेशी किसान प्रेरणा ले रहे हैं। पिछले वर्षों में कई देशों के प्रगतिशील किसान बुंदेलखंड आकर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण भी ले चुके हैं। यह सिलसिला अभी भी जारी है। प्राकृतिक खेती में पानी की कम जरूरत पड़ेगी। पैदावार अच्छी होगी। किसानों और खेतिहर मजदूरों को खेत में ही रोजगार मिलेगा। काम की तलाश में महानगरों के लिए बुंदेलखंड से बड़ी संख्या में हो रहा पलायन घटेगा। अन्ना प्रथा पर भी लगाम लगेगी। इन किसानों की दलील है कि खेती में प्राकृतिक तौर तरीके अपनाए जाएंगे तो सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि आपदाओं में कमी आएगी। खेती की लागत घटेगी। अनाज में पौष्टिकता बढ़ेगी।
विज्ञापन
बुंदेलखंड की प्राचीन पद्धति है प्राकृतिक खेती
बांदा। बुंदेलखंड में प्राकृतिक खेती प्राचीन पद्धति रही है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बरकरार रखती है। खेती की इस पद्धति में रासायनिक पदार्थों और कीटनाशकों आदि का उपयोग नहीं किया जाता। खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते हैं, उन्हीं को कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता है। कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कंपोस्ट, जीवाणु खाद, फसलों के अवशेष और कुदरती तौर जमीन में उपलब्ध खनिज जैसे रॉक फास्फेट व जिप्सम आदि के जरिये पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। यह फसलों को हानिकारक जीवाणुओं से बचाते हैं।
विज्ञापन