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बांदा: एक कक्षा में पढ़ती हैं 200 छात्राएं, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में 868 छात्राओं के लिए चार कमरे
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एक कक्ष में बड़ी संख्या में बैठकर अध्ययन करतीं जीजीआईसी छात्राएं।
- फोटो : BANDA
तिंदवारी। राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में कक्षा 9 से 12 तक में 868 छात्राएं हैं। इन छात्राओं के अध्ययन के लिए केवल चार कमरे हैं। एक कमरे में 200 से 250 छात्राओं को जमीन पर बैठकर अध्ययन करना पड़ता है। 50 छात्राओं की क्षमता वाले कमरे में 250 छात्राओं का एक साथ बैठकर अध्ययन करना मुश्किल हो जाता है।
कक्षा नौ की छात्रा सीमा का कहना है कि जब सभी छात्राएं आ जाती हैं तो हमको अपनी गोद में बैग रखना पड़ता है। 10वीं की छात्रा राखी का कहना है कि निकलने की जगह न होने से हमें देर तक एक ही स्थान पर बैठे रहना पड़ता है। 11वीं की छात्रा पूजा ने बताया कि कभी-कभी क्लासरूम के बाहर गैलरी में बैठकर भी पढ़ना पड़ता है। वहां शिक्षिका की आवाज भी नहीं जाती। 12वीं की छात्रा वेदिका गुप्ता का कहना है कि अक्सर पढ़ते समय अध्यापिका की नजर न मिलने से समझ नहीं आता है। पीछे बैठे रहने से दोबारा पूछ नहीं पाते हैं।
जीजीआईसी प्रधानाचार्य निशा त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने कई बार इस समस्या से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया। लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। क्लासरूम न होने से यह समस्या 20 से 25 साल पुरानी है।
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प्रोजेक्ट अलंकार के तहत शासन को अधूरी पड़ी बिल्डिंग की स्थिति और उसका इस्टीमेट बनाकर भेजा गया था, लेकिन मंजूरी नहीं मिल सकी। अब दोबारा से भेजा जाएगा। फिलहाल पीटीए (अभिभावक शिक्षक संघ) आदि के पैसों से किसी तरह से अधूरी पड़ी बिल्डिंग के एक दो कमरों को बच्चियों के पढ़ने के लिए बना दिया गया है।
विनोद सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक, बांदा।
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कक्षा नौ की छात्रा सीमा का कहना है कि जब सभी छात्राएं आ जाती हैं तो हमको अपनी गोद में बैग रखना पड़ता है। 10वीं की छात्रा राखी का कहना है कि निकलने की जगह न होने से हमें देर तक एक ही स्थान पर बैठे रहना पड़ता है। 11वीं की छात्रा पूजा ने बताया कि कभी-कभी क्लासरूम के बाहर गैलरी में बैठकर भी पढ़ना पड़ता है। वहां शिक्षिका की आवाज भी नहीं जाती। 12वीं की छात्रा वेदिका गुप्ता का कहना है कि अक्सर पढ़ते समय अध्यापिका की नजर न मिलने से समझ नहीं आता है। पीछे बैठे रहने से दोबारा पूछ नहीं पाते हैं।
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जीजीआईसी प्रधानाचार्य निशा त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने कई बार इस समस्या से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया। लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। क्लासरूम न होने से यह समस्या 20 से 25 साल पुरानी है।
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प्रोजेक्ट अलंकार के तहत शासन को अधूरी पड़ी बिल्डिंग की स्थिति और उसका इस्टीमेट बनाकर भेजा गया था, लेकिन मंजूरी नहीं मिल सकी। अब दोबारा से भेजा जाएगा। फिलहाल पीटीए (अभिभावक शिक्षक संघ) आदि के पैसों से किसी तरह से अधूरी पड़ी बिल्डिंग के एक दो कमरों को बच्चियों के पढ़ने के लिए बना दिया गया है।
विनोद सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक, बांदा।