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गांवों में निरक्षरता ज्यादा 33 फीसदी प्रधान साक्षर
Banda
Updated Sun, 06 May 2012 12:00 PM IST
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बांदा। निरक्षरों को साक्षर बनाने की सरकारी योजना काफी महंगी साबित हुई। करोड़ों रुपए खर्च के बाद भी साक्षरता का ग्राफ 68 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ा। शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता ज्यादा है। आम ग्रामीणों की कौन कहे गांवों की कमान संभाले प्रधान ही ज्यादातर साक्षर नहीं हैं। 33 फीसदी ग्राम प्रधान सिर्फ हस्ताक्षर बनाना जानते हैं।
साक्षरता दर बढ़ाने और अंगूठा निशानी से छुटकारा दिलाने के लिए कुछ वर्षाें पहले संपूर्ण साक्षरता अभियान शुरू किया गया था। बाद में इसे साक्षरता कार्यक्रम घोषित किया गया। कुछ दिन बाद शासन ने इसका नाम बदलकर सतत शिक्षा अभियान कर दिया। योजना के नाम तो बदलते रहे लेकिन काम कुछ खास गुल नहीं खिला पाया। मानव संसासन विकास मंत्रालय भारत सरकार की यह योजना बांदा जनपद में कुछ खास नया नहीं कर पाई। पांच साल के लिए लागू हुई यह योजना दो साल में ही धड़ाम हो गई। 2001 की जनगणना में बांदा जनपद में 54.22 फीसदी साक्षरता बताई गई थी। 2011 जनगणना में यह बढ़कर 68.11 हो गई। 10 वर्षाें में मात्र 13.89 फीसदी साक्षरता बढ़ सकी। जबकि इस दौरान लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से ज्यादा खर्च हो गए। वर्ष 2006-07 में 84,77,122 रुपए, 2007-08 में 29,58,220 रुपए साक्षरता के नाम पर खर्च हुए। 2006-07 में शुरू हुआ साक्षरता अभियान पांच वर्ष चलना था। साक्षरता की दर ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में ज्यादा बेहतर है। पिछले वर्ष जनगणना के आंकडे़ बताते हैं कि पूरे जनपद में शहरी क्षेत्रों में जहां 72 फीसदी लोक साक्षर पाए गए वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 51 फीसदी से अधिक साक्षरता नहीं बढ़ सकी। और तो और गांव के मुखिया यानि प्रधान भी साक्षरता के मामले में काफी फिसड्डी रहे। 33 फीसदी प्रधान सिर्फ साक्षर हैं। वह अपने हस्ताक्षर बनाने के अलावा पढ़-लिख नहीं सकते। 10 फीसदी प्रधान कक्षा पांचवीं और 13 फीसदी कक्षा आठवीं पास हैं। नौ फीसदी प्रधान हाईस्कूल, चार फीसदी इंटर, नौ फीसदी स्नातक और तीन फीसदी प्रधान परास्नातक हैं। मौजूदा पंचवर्षीय में पांच प्रधान अधिवक्ता भी हैं। जनपद में कुल ग्राम पंचायतों की संख्या 437 है। यह आठ ब्लाकों में बंटी है।
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साक्षरता दर बढ़ाने और अंगूठा निशानी से छुटकारा दिलाने के लिए कुछ वर्षाें पहले संपूर्ण साक्षरता अभियान शुरू किया गया था। बाद में इसे साक्षरता कार्यक्रम घोषित किया गया। कुछ दिन बाद शासन ने इसका नाम बदलकर सतत शिक्षा अभियान कर दिया। योजना के नाम तो बदलते रहे लेकिन काम कुछ खास गुल नहीं खिला पाया। मानव संसासन विकास मंत्रालय भारत सरकार की यह योजना बांदा जनपद में कुछ खास नया नहीं कर पाई। पांच साल के लिए लागू हुई यह योजना दो साल में ही धड़ाम हो गई। 2001 की जनगणना में बांदा जनपद में 54.22 फीसदी साक्षरता बताई गई थी। 2011 जनगणना में यह बढ़कर 68.11 हो गई। 10 वर्षाें में मात्र 13.89 फीसदी साक्षरता बढ़ सकी। जबकि इस दौरान लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से ज्यादा खर्च हो गए। वर्ष 2006-07 में 84,77,122 रुपए, 2007-08 में 29,58,220 रुपए साक्षरता के नाम पर खर्च हुए। 2006-07 में शुरू हुआ साक्षरता अभियान पांच वर्ष चलना था। साक्षरता की दर ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में ज्यादा बेहतर है। पिछले वर्ष जनगणना के आंकडे़ बताते हैं कि पूरे जनपद में शहरी क्षेत्रों में जहां 72 फीसदी लोक साक्षर पाए गए वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 51 फीसदी से अधिक साक्षरता नहीं बढ़ सकी। और तो और गांव के मुखिया यानि प्रधान भी साक्षरता के मामले में काफी फिसड्डी रहे। 33 फीसदी प्रधान सिर्फ साक्षर हैं। वह अपने हस्ताक्षर बनाने के अलावा पढ़-लिख नहीं सकते। 10 फीसदी प्रधान कक्षा पांचवीं और 13 फीसदी कक्षा आठवीं पास हैं। नौ फीसदी प्रधान हाईस्कूल, चार फीसदी इंटर, नौ फीसदी स्नातक और तीन फीसदी प्रधान परास्नातक हैं। मौजूदा पंचवर्षीय में पांच प्रधान अधिवक्ता भी हैं। जनपद में कुल ग्राम पंचायतों की संख्या 437 है। यह आठ ब्लाकों में बंटी है।
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