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आठ हजार में तैयार हो रहा छठवीं का बैग
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बलरामपुर। महंगाई की चौतरफा मार से हर कोई कराह रहा है। रसोई गैस से लेकर डीजल, पेट्रोल व सब्जियां महंगाई की आग में उबल रही हैं। पढ़ाई भी महंगाई से अछूती नहीं है। पढ़ाई-लिखाई पर बढ़ी कीमतों से अभिभावकों की जेब ढीली हो रही है। अभिभावक परेशान हैं, ऐसे में हर चीजों में कटौती कर बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभाने को मजबूर हैं। कक्षा छह-सात का स्कूल बैग तैयार कराने में अभिभावकों पर पहले की अपेक्षा 30 फीसदी अधिक बोझ बढ़ा है।
अप्रैल माह से नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है। स्कूल-कॉलेज खुल चुके हैं। बच्चों से शिक्षा के मंदिर गुलजार हो रहे हैं, लेकिन सीधा असर कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के अभिभावकों पर पड़ रहा है। दो साल तक कोरोना का प्रकोप होने से अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजने से कतराते रहे। अब अभिभावकों का पूरा फोकस बच्चों के अच्छी शिक्षा पर है, इसलिए एक आंकड़े के मुताबिक अन्य वर्षों की अपेक्षा इस बार बच्चों के दाखिले काफी संख्या में बढ़े हैं, लेकिन अभिभावक महंगाई की मार से परेशान हैं। बच्चों का स्कूल बैग तैयार कराने में जेब ढीली हो रही है। कॉपी-किताब से लेकर रबर, पेंसिल, कटर, बैग, थरमस व कलर बाक्स तक महंगा हो गया है। अभिभावकों ने बताया कि कोरोना काल के पहले बच्चे का कक्षा छह व सात का जो स्कूल बैग चार से पांच हजार रुपये में तैयार हो जाता था, उसे उसी क्लास व कोर्स समेत अन्य सामान को खरीदने में इस बार आठ हजार रुपये तक चुकता करना पड़ रहा है। (संवाद)
सामानों के कीमतों में आया अंतर
वस्तुएं-पहले-अब
स्कूल बैग-200-450
पेंसिल पैकेट-40-60
रबर पैकेट-40-60
कटर पैकेट-60-100
पेन-10-15
थरमस-100-180
कलर बॉक्स-60-120
लंच बाक्स-80-160
सही जानकारी देने से कतरा रहे विक्रेता
अमर उजाला टीम ने शहर में अलग-अलग पुस्तक विक्रेताओं के दुकानों पर पहुंचकर कोर्स से लेकर हर वस्तु की बढ़ी कीमतों को जानने की कोशिश की। मीडिया से होना जानकार कुछ बातें सही बताई तो कुछ का गोलमाल जवाब दिया। खासकर जिस स्कूल से अटैच हैं, यानी जिन कॉन्वेंट स्कूलों का कोर्स रखते हैं, उससे जुड़ी क्लासों के कॉपी किताबों के बारे में दो साल पहले और अब के रेटों में अंतर नहीं बताए।
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क्लास एक, पुस्तकों के दाम अलग-अलग
एक पुस्तक विक्रेता ने बताया कि पहले की अपेक्षा कॉपी-किताब महंगी हुई हैं। जैसे दो साल पहले प्ले ग्रुप की कॉपी किताब खरीदने पर अभिभावक को 600 से 700 रुपये देने पड़ते थे, लेकिन इस बार उसी क्लास की कॉपी किताब के लिए 1000 से 1200 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। एक कॉन्वेंट स्कूल के एक बच्चे के कोर्स से दूसरे कॉन्वेंट स्कूल का उसी क्लास का कोर्स लेते हैं तो दामों में काफी अंतर रहेगा। मसलन, कक्षा तो एक ही है, लेकिन उसके कोर्स के दाम अलग-अलग हैं। यह सिर्फ प्ले ग्रुप के बच्चे के कोर्स की बात नहीं है। अभिभावकों का कहना है कि कक्षा एक से लेकर पांच तक और छह से लेकर इंटर तक सभी बच्चों के जो अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं, उनके समान क्लास के कोर्स के दामों में काफी अंतर है।
सरकार इस समस्या पर दे ध्यान
कोरोना काल में भी निजी स्कूलों ने न तो फीस माफ की और न ही कॉपी किताबों में कोई छूट दी। इस बार भी वहीं हाल है, जो स्कूलों के कोर्स पहले तीन हजार रुपये में मिलते थे वह कोर्स अब इस बार पांच से छह हजार रुपये तक मिल रहे हैं। सरकार को अभिभावकों की इस समस्या की ओर ध्यान देना चाहिए।
मीरा सिंह, अभिभावक
थम नहीं रही स्कूलों की मनमानी
प्राइवेट स्कूलों की महंगी कॉपी किताब से अतिरिक्त भार बढ़ रहा है। कोरोना काल के बाद से पढ़ाई पर महंगाई छा गई है। अगर इसी तरह से प्राइवेट स्कूल मनमानी करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए लाइन लगानी होगी।
गुड़िया गुप्ता, अभिभावक
अभी तक आठ हजार रुपये हो चुके खर्च
प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई दिन प्रतिदिन महंगी होती जा रही है। मेरा भतीजा इससे तीसरी दूसरी कक्षा में था। इस साल चौथी कक्षा में आया है। पिछले साल बच्चे का कोर्स पांच हजार रुपये में लिया था। इस बार अभी तक आठ हजार रुपये कॉपी किताब खरीदने में खर्च हो चुके हैं। आगे अभी कितने रुपये खर्च होंगे, कुछ पता नहीं है।
रवींद्र गुप्ता कमलापुरी, अभिभावक
हर साल बढ़ा देते हैं स्कूल फीस
डीजल-पेट्रोल में तो आए दिन बढ़ोत्तरी होती रहती है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों की कॉपी किताबों का हाल न पूछिए। इनके रेट आसमान छू रहे हैं। आम आदमी मजबूरी में जैसे-तैसे बच्चों की कॉपी किताब खरीद रहा है। प्राइवेट स्कूलों की चाहे फीस हो या पढ़ाई का कोर्स इनका रेट हर साल बढ़ना तय रहता है।
प्रमोद चौधरी, अभिभावक
पिछले साल मैंने अपने दो बच्चों को पांच-पांच हजार रुपये में कोर्स दिलवाया था। आज उसी क्लास के बच्चों के पढ़ाई का कोर्स आठ हजार रुपये में मिल रहा है। पुस्तकों की कीमत हर साल बढ़ जाती है। इतना ही नहीं पिछले साल बच्चे का बैग तीन-तीन सौ रुपये में मिला था। इस बार पांच-पांच सौ रुपये में मिला।
यश वर्धन गौड़, अभिभावक
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अप्रैल माह से नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है। स्कूल-कॉलेज खुल चुके हैं। बच्चों से शिक्षा के मंदिर गुलजार हो रहे हैं, लेकिन सीधा असर कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के अभिभावकों पर पड़ रहा है। दो साल तक कोरोना का प्रकोप होने से अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजने से कतराते रहे। अब अभिभावकों का पूरा फोकस बच्चों के अच्छी शिक्षा पर है, इसलिए एक आंकड़े के मुताबिक अन्य वर्षों की अपेक्षा इस बार बच्चों के दाखिले काफी संख्या में बढ़े हैं, लेकिन अभिभावक महंगाई की मार से परेशान हैं। बच्चों का स्कूल बैग तैयार कराने में जेब ढीली हो रही है। कॉपी-किताब से लेकर रबर, पेंसिल, कटर, बैग, थरमस व कलर बाक्स तक महंगा हो गया है। अभिभावकों ने बताया कि कोरोना काल के पहले बच्चे का कक्षा छह व सात का जो स्कूल बैग चार से पांच हजार रुपये में तैयार हो जाता था, उसे उसी क्लास व कोर्स समेत अन्य सामान को खरीदने में इस बार आठ हजार रुपये तक चुकता करना पड़ रहा है। (संवाद)
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सामानों के कीमतों में आया अंतर
वस्तुएं-पहले-अब
स्कूल बैग-200-450
पेंसिल पैकेट-40-60
रबर पैकेट-40-60
कटर पैकेट-60-100
पेन-10-15
थरमस-100-180
कलर बॉक्स-60-120
लंच बाक्स-80-160
सही जानकारी देने से कतरा रहे विक्रेता
अमर उजाला टीम ने शहर में अलग-अलग पुस्तक विक्रेताओं के दुकानों पर पहुंचकर कोर्स से लेकर हर वस्तु की बढ़ी कीमतों को जानने की कोशिश की। मीडिया से होना जानकार कुछ बातें सही बताई तो कुछ का गोलमाल जवाब दिया। खासकर जिस स्कूल से अटैच हैं, यानी जिन कॉन्वेंट स्कूलों का कोर्स रखते हैं, उससे जुड़ी क्लासों के कॉपी किताबों के बारे में दो साल पहले और अब के रेटों में अंतर नहीं बताए।
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क्लास एक, पुस्तकों के दाम अलग-अलग
एक पुस्तक विक्रेता ने बताया कि पहले की अपेक्षा कॉपी-किताब महंगी हुई हैं। जैसे दो साल पहले प्ले ग्रुप की कॉपी किताब खरीदने पर अभिभावक को 600 से 700 रुपये देने पड़ते थे, लेकिन इस बार उसी क्लास की कॉपी किताब के लिए 1000 से 1200 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। एक कॉन्वेंट स्कूल के एक बच्चे के कोर्स से दूसरे कॉन्वेंट स्कूल का उसी क्लास का कोर्स लेते हैं तो दामों में काफी अंतर रहेगा। मसलन, कक्षा तो एक ही है, लेकिन उसके कोर्स के दाम अलग-अलग हैं। यह सिर्फ प्ले ग्रुप के बच्चे के कोर्स की बात नहीं है। अभिभावकों का कहना है कि कक्षा एक से लेकर पांच तक और छह से लेकर इंटर तक सभी बच्चों के जो अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं, उनके समान क्लास के कोर्स के दामों में काफी अंतर है।
सरकार इस समस्या पर दे ध्यान
कोरोना काल में भी निजी स्कूलों ने न तो फीस माफ की और न ही कॉपी किताबों में कोई छूट दी। इस बार भी वहीं हाल है, जो स्कूलों के कोर्स पहले तीन हजार रुपये में मिलते थे वह कोर्स अब इस बार पांच से छह हजार रुपये तक मिल रहे हैं। सरकार को अभिभावकों की इस समस्या की ओर ध्यान देना चाहिए।
मीरा सिंह, अभिभावक
थम नहीं रही स्कूलों की मनमानी
प्राइवेट स्कूलों की महंगी कॉपी किताब से अतिरिक्त भार बढ़ रहा है। कोरोना काल के बाद से पढ़ाई पर महंगाई छा गई है। अगर इसी तरह से प्राइवेट स्कूल मनमानी करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए लाइन लगानी होगी।
गुड़िया गुप्ता, अभिभावक
अभी तक आठ हजार रुपये हो चुके खर्च
प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई दिन प्रतिदिन महंगी होती जा रही है। मेरा भतीजा इससे तीसरी दूसरी कक्षा में था। इस साल चौथी कक्षा में आया है। पिछले साल बच्चे का कोर्स पांच हजार रुपये में लिया था। इस बार अभी तक आठ हजार रुपये कॉपी किताब खरीदने में खर्च हो चुके हैं। आगे अभी कितने रुपये खर्च होंगे, कुछ पता नहीं है।
रवींद्र गुप्ता कमलापुरी, अभिभावक
हर साल बढ़ा देते हैं स्कूल फीस
डीजल-पेट्रोल में तो आए दिन बढ़ोत्तरी होती रहती है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों की कॉपी किताबों का हाल न पूछिए। इनके रेट आसमान छू रहे हैं। आम आदमी मजबूरी में जैसे-तैसे बच्चों की कॉपी किताब खरीद रहा है। प्राइवेट स्कूलों की चाहे फीस हो या पढ़ाई का कोर्स इनका रेट हर साल बढ़ना तय रहता है।
प्रमोद चौधरी, अभिभावक
पिछले साल मैंने अपने दो बच्चों को पांच-पांच हजार रुपये में कोर्स दिलवाया था। आज उसी क्लास के बच्चों के पढ़ाई का कोर्स आठ हजार रुपये में मिल रहा है। पुस्तकों की कीमत हर साल बढ़ जाती है। इतना ही नहीं पिछले साल बच्चे का बैग तीन-तीन सौ रुपये में मिला था। इस बार पांच-पांच सौ रुपये में मिला।
यश वर्धन गौड़, अभिभावक